चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
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(६) बर—बड़ । पीपरा—पीपल । मंदिकी—इसकी । सेवार—अधिक । (७) बारी—बगीचा । २० ( रीकैण्ड्स २ ) सिफते बुतखानः बर हौज व मानदन जोगियान मकान व अस्नान हरु (सरोवरके ऊपर स्थित मन्दिरका वर्णन जहाँ चौ-पुदथ जोगी रहते हैं।) नारा पोखर कुण्ठ बनाये । मढ़ि देव जेहि पास उठाये ॥१ अनफाट नितइ आवहिं तहाँ । औ मगवन्त रहें तिह महाँ ॥२ निष [अ - - - ] छाये । पुरुख नाँउँ तिह ठौर न जाये ॥३ भेरा डँवरू ढाक बजाये । समद सुहाष इँदर मन माये ॥४ जोगी सहस पाँच एक गावहिं । सींगी पूरहिं भसम चढावहिं ॥५ सिद्ध पुरुख गुन आगर, देखि लुभाने ठाउँ ॥६ कहत सुनत अस आनै, दूनि चलि देखें जाउँ ॥७ टिप्पणी—(१) मढ़ि-मण्डप, देवस्थान । (४) भेरा-मुँहसे फूँककर बजानेवाला बड़ा बाजा । डँवरू—डमरू । ढाक-टंकार। (५) सींगी-(सं श्रृंग) सींगका बना फूकनेका बाजा । २१ ( रीकैण्ड्स ३ : पंजाब [१] ) सिफते शेज व स्तायशे आबे उ गोयद (सरोवर और उसके निर्मल जल का वर्णन) सरवर एक सफरि भरि रहा । झरनों सहस पाँच तिह पहा ॥१ अति अवगाह न पायइ थाहा । बातैं चूक सराहउँ काहा ॥२ [बास केमूरैं कह नित आवई] । देखत मोतीधूर सुहावई ॥३ [हुँवर लाख दोइ पानी चाहैं] । तीर पैठि ते लेहिं भर आवैं ॥४ [ठाँठ ठाँउ बैठे रखपारा] । पोर नहाइ न कोऊ पारा ॥५ [आप होइ महरहिं कै, - सों कह ] नी पाट ।६ [पाप रूप सरवर कै, रोवत माँ]घी घाट ॥७