चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९५ ३१ (रॉइण्ड्स १२) सिफत करूसहाय राय महर गोयद (राय महरके महलोंका वर्णन) पुनि हौं कहौं धौराहर पाता । इंगुर पानि ढार कइ राता ॥१ सतखंड पाटा आनों भाँती । सात चौखण्डी मयी जिह पाँती ॥२ चौरासी [ ] बसे उछाई । छत्री दररें अती सुहाई ॥३ अस रचना कै कीन बनाई । सातौँ कलस धरै सुनपानी ॥४ कनक खम्भ जड़ मानिक परे । जगमगाहिं जनु सरउँ भरे ॥५ अगर चंदन अन्तो लै, अछर सुहावन बास ।६ देख लोग अस भाखहिं, महुँ आइ कबिलास ॥७ टिप्पणी-(१) धौराहर-ध वलहगृह राजमहलके भीतर रनिवास धौराहर कहलाता था । इसे अन्तःपुर भी कहते थे । (२) सतखंड-सप्तभूमिक प्रासाद सप्तमंजिला महल । इस प्रकारके राजप्रासादोंकी कल्पना गुप्तकालसे ही इस देशम प्रचलित थी । दतियामे सतखण्डी दतीका बीरसिंह देवका महल सतखण्डा है । आनों-अन्यान्य अनेक प्रकारके भाँति-भाँतिके तरह-तरहक । लोकमें बहु प्रचलित इस सीधे सादे शब्दसे परिचित न होनेके कारण माताप्रसाद गुप्तने पद्मावत और मधुमालतीमे सर्वत्र फारसी लिपिमें लिखे 'अलिफ़', 'नून' 'वाव' 'नून'को अनबन' पढा है और उसके अनकन <अन्यवर्णके विकृत पाठ होनेकी क्लिष्ट कल्पना की है । चौखण्डी-चार खण्डकी चौकियाँ अथवा बुर्ज । (४) कलस-कलश गुम्बद । सुनपानी-सोनेके पानीवाला, सुनहरा । (७) महुँ-मानों। कबिलास-स्वर्ग। ३२ (रॉइण्ड्स १३) सिफत हरमाँ राय महर हफ्ताद व चहार बूदन्द (राय महरकी चौरासी रानियोंका उल्लेख) राय महर रानी चौरासी । एक एक के तर चरि अकासी ॥१ जेकर जेकर होइ ओठनारा । जेकर मंदिर सेज सँभारा ॥२