चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९६ पाटमहादेवि फुलारानी । स्यँ अचेत पह अह सयानी ॥३ अगर चँदन फूल औ पानूँ । कुँकूँ सेंदुर परसेंहि आनूँ ॥४ रचैं हिंडोला झूल नारी । गावहिं अपुरुप जोबनबारी ॥५ अरथ दरब पोर औ हति, गिनत न आवइ काउ ।६ अन धन पाट-पटोर भल, कातुक भूला राउ ॥७ टिप्पणी-(१) तर-नीच आधीन । चेरि-दासी । अपछरी-अप्सरा । (६) बेञ्ज बेञ्ज-अलग अलग, तरह-तरहक । जेउनवार-(प्रा जेमणवार) भोजन रसाद् । (५) जोबनबारी-यौवनवाला युवती । (६) दरब-द्रव्य हति-हाथी । (७) पाट-हमें इस शब्दका प्रयोग किसी पूर्ववर्ती साहित्यमें नहीं मिला। समवर्ती साहित्यमें भी केवल नरपति नाल्ह कृत बीसलदेव रासामें इसका उल्लेख 'पाट पटम्बर'के रूपमें है। परवर्ती साहित्यमें पदमा वतमें एक स्थानपर इसका उल्लेख है (२६२।६) । सम्भवतः यह शब्द संस्कृत पट या पट्टने निकला है । ग्यारहवीं शतीक वैजयन्ती कोष (१६८।२११) और बारहवीं शतीक अभिधान चिन्तामणि कोष (३।५६६-६७) क अनुसार पट वस्त्रकी सामान्य संज्ञा थान पड़ती है । अभिधानमें पुराने कपड़ेके लिए पटच्चर शब्द है ( ३। ६७८) । दसवीं शतीक प्रारम्भमें लिखे गये क्षितिसंग्रह कृत नलचम्पूमें दमयन्तीकी माताको सम्बोधित करते हुए कहलावा गया है कि-इन चीनांशुक पट्टोंको स्वीकार करें जो अगणनीयदम् (अग्नि द्वारा स्वच्छ किये जानेवाले) हैं। स्पष्टतः यहाँ चीनके बने अशनके वस्त्रोंसे तात्पर्य है। इससे भी यही लगता है कि पट सामान्य रूपसे वस्त्रको कहते थे । इसके विपरीत अनेक ऐसे भी उल्लेख प्राप्त होते हैं जिनसे ज्ञात पड़ता है कि पट किसी विशेष प्रकार, सम्भवतः रेशमी वस्त्रको कहते थे । पश्चिमी चालुक्य नरेश सोमेश्वर (११२४- ११३८ ई ) ने अपने मानसोल्लासमें विभिन्न वस्त्रोंक विविध सूत्रोंका उल्लेख किया है उसमें कपास (कर्पास, तूर्ल) कीम (कृन पाट आदि कीड़ोंसे निकाले जानेवाले सूत) रोम (ऊन) के साथ साथ पट्टसूत्रका भी उल्लेख किया है जो प्रसंगके अनुसार रेशमी सूत अनुमान किया जा सकता है। कल्हणके राजतरंगिणीमें एक स्थानपर इस बातका उल्लेख है कि श्रीनगरसे कराढमूल (शरामूल) जानेवाले मार्गमें स्थित पट्टन (आधुनिक पटन) पट्टनानाम् (पट्टकी