भारतकोश
चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

DevanagariAwadhipublished520 पृष्ठ

पृष्ठ 131, कुल 520 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 131

१४ दिया सहस चहुँ दिसि धारा। घर बाहर सब भा उजियारा ॥३ भयी जेवनार फिर आये पानों। बेद भनहिं भौमन परभानों ॥४ मानुस बहुत सो देखत रहा। कोउ कहे रात देबस कोइ कहा ॥५ लाये धरन्हि पावन कँह, चाँदा आरति दीन्ह उतार। ६ आत सराफत देखेउ नाहीं, बेटवा भाँमर भार ॥७ टिप्पणी—(१) छाँपर—छया हुआ। नेत (सं० नेत्र)—इसका उल्लेख बाणभट्ट और उसके पश्चात् के प्राचीन और मध्यकालीन साहित्य में प्रायः मिलता है। क्षीरस्वामी के कथनानुसार यह व्यंगदुक था। अन्यत्र उसे सूक्ष्म रेशमीवस्त्र (सूक्ष्मपट्टसूत्रवारचना) बताया गया है। नेत्र का अर्थ मटा हुआ भी होता है। यह इस बात का संकेत करता है कि यह बंटे सूत का बनता रहा होगा। ऐसा जान पड़ता है कि यह वस्त्र पहनने के काम में कम बाहरी काम के लिए ही अधिक प्रयुक्त होता था यहाँ इसके फर्श पर बिछाने जाने का उल्लेख है। धनपाल (१०१९ ई०) ने अपनी तिलकमंजरी में इसके बने वितान का उल्लेख किया है (पृ० ९१)। किन्तु उत्तम कोटि नेत्र का उपयोग परिधान में भी होता था ऐसा नल-चम्पू (आरम्भिक ९ वीं शती) से ज्ञान पड़ता है (पृ० २१८)। पछोर—देखिने पीछे १२।७। (७) भाँमर—फाना शोरयुक्त नेत। बार—बाल अस्तव्यस्त। ४५ (रीडिंग्स १७) निरत दहेज चाँदा सोयर (दहेज का बयान) गाँव बीस भठ सामंजि पाये। फीनस एक हरष भरि आये ॥१ घोर पचास आन कै ठाढ़े। टंकण लाख दूज ते बाँधे ॥२ घरी चंर सहस एक पावा। गाइ मस नहिं गिनत बतावा ॥३ कापर सात पवन सों फाहा। हीरा मोति लागि सिंह आहा ॥४ सज मार कर नाँउ न जानीं। फर्सों सेज अस फह फरानीं ॥५ पाडर, कनक, खाँड घिउ, लान, तेल बिस्तार। ६ लाद टाँड़ सुरुतापा, बरद भये असँभार ॥७