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चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

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१६ (९) हरबर—(सं रम) उत्सुकता या भावावेश हर्ज चिन्तित रहती है। बेरीह—दुखती है काँपती रहती है। ४६ (रौकन्दस ५१) गिरिया व जारी कर्दन् चाँदा अज दूर मानदने साजन व शुनीन्दने ननद चाँदाका विरह-विलाप, ननद का सुनना) बरस दिवस भा चाँदु बिपाँहै। घर न देखी आछी छाँईं ॥१ पतियाैंती निसि सेज हुड़ेली। सो धनि कैसे जिये अकेली ॥२ भावन फाठ पूछि नहिं माता। हाँ रे न सीयउँ फार फराता ॥३ एको साध न हियें पुजानी। मुयो पियासन नॉकलहि पानी ॥४ यहि घिरहँ उठि जैकें जाऊँ। जैसों राँड़ सुहागिन नाऊँ ॥५ ननद मात सब सुन के, कही महरि सो जाइ। ६ दीदी जाय मनावहु, चाँदा [रजलस*] खाइ ॥७ टिप्पणी—(२) हुड़ेली—होके हाय। (७) दीदी—माँ। यह प्रयोग असाधारण है। पिताके लिए दादा सम्बो- धन लोकमें प्रचलित है। सम्भव है उसीके अनुकरणपर माँको दीदी कहा जाता रहा हो। पर अब इसका प्रयोग बड़ी बहनके लिए होता है। दाउदने अन्यत्र (१९९।१) सासके लिए भी बहुसे यही सम्बोधन कराया है। ४७ (रौकन्दस २) आम्दने महूम व तफ़हीम कर्दन् चाँदा रा (सासका आकर चाँदाको समझाना) सुनिके महरि चाँद पहँ आयी। काहे बहु रजलस खायी ॥१ दूध दाँत तू बिटिया बारी। तूँ का जानसि पुरुख बड़ोरी ॥२ तूँ अचत पुरुख का जानसि। बिन पानी सातू कस सानसि ॥३

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