भारतकोश
चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

DevanagariAwadhipublished520 पृष्ठ

पृष्ठ 15, कुल 520 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 15

ध्यान वासुदेवशरण अग्रवाल का गया। उन दिनों वे मलिक मुहम्मद जायसी के पदमावत की संजीवनी व्याख्या प्रस्तुत करने में लगे थे। रामपुर के रजा पुस्तकालय में फारसी लिपि में अंकित पद्मावत की जो प्रति है, उसके प्रथम पृष्ठ पर उन्हें चन्दायण शीर्षक के साथ उक्त ग्रन्थ की चार पंक्तियाँ अंकित मिलीं। इन पंक्तियों को उन्होंने पहले एक लेख में फिर अपनी पदमावत की भूमिका में उद्धृत किया।¹ उन दिनों मैं वासुदेवशरण अग्रवाल के निकट सम्पर्क में था तथा काशी विश्वविद्यालय के भारत कला भवन में सहायक संग्रहाध्यक्ष के पद पर काम कर रहा था। अतः चन्दायण का इस प्रकार परिचय मिलने पर मेरा ध्यान तत्काल भारत कला भवन में संग्रहीत अपभ्रंश शैली के उन ६ चित्रों की ओर गया जिनकी पीठ पर फारसी लिपि में आलेख हैं। ये चित्र बीस-पचीस वर्ष पूर्व राय कृष्णदास को काशी के गुदड़ी बाजार में मिले थे। उनकी कलापारखी दृष्टि से उसका महत्व छिपा न रह सका और वे उन्हें कदाचित दो-दो आने में खरीद लाये थे। कला के इतिहास की दृष्टि से इन चित्रों का अत्यधिक महत्व है। ये भारतीय कला से सम्बन्ध रखने वाले अनेक ग्रन्थों में प्रकाशित हो चुके हैं और उनकी अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति है। राय कृष्णदास ने पृष्ठांकित आलेखों को पढ़कर इतना तो अनुमान कर लिया था कि ये किसी अवधी काव्य के पृष्ठ हैं पर किस काव्य के पृष्ठ हैं इसका उन्हें कोई अनुमान न हो सका था। फलतः कला-पुस्तकों में सर्वत्र इन चित्रों की चर्चा अज्ञात अवधी काव्य के पृष्ठों के रूप में ही हुई है। मैंने इन चित्रों के आलेखों की परीक्षा की और उन आलेखों में जहाँ-तहाँ लोरक (काव्य के नायक) और चन्दा (काव्य की नायिका) का नाम पाकर मुझे इस बात में तनिक भी सन्देह न रहा कि ये पृष्ठ चन्दायण के ही हैं। मेरे इस खोज के परिणाम स्वरूप कला-क्षेत्र में यह बात स्वीकार कर ली गयी कि ये चित्र लोरक-चन्दा की कथा के हैं।² कला के क्षेत्र में चन्दायण की जानकारी इससे भी पहले थी। पंजाब संग्रहालय में २४ चित्रों की एक माला थी जो अब पाकिस्तान और भारत के बीच बँट गयी है। (१४ चित्र लाहौर संग्रहालय में रह गये और १० चित्र भारत को मिले जो अब पटियाला स्थित पंजाब राजकीय संग्रहालय में हैं।) इन चित्रों के पीछे भी फारसी लिपि में आलेख हैं। उन आलेखों से उस संग्रहालय के संग्रहाध्यक्ष ने यह जान लिया था कि ये लौर और चन्दा नामक प्रेमी-प्रेमिका से सम्बन्ध रखने वाले किसी काव्य ग्रन्थ के पृष्ठ हैं। उन्होंने लाहौर संग्रहालय के चित्रों की सूची प्रकाशित की उसमें इन चित्रों का परिचय इसी रूप में दिया है। इन चित्रों की विस्तृत विवेचना कार्ल खण्डालावाला ने बम्बई की सुप्रसिद्ध कला पत्रिका मार्ग में की है। वहाँ उन्होंने इन चित्रों को लौर-चन्दा


१. भारतीय साहित्य (आगरा) वर्ष २ अंक १ पृ. १३४ पदमावत संजीवनी व्याख्या द्वितीय (झाँसी) १९५६ ई. पृ. ११। २. रूपिन कला, दिल्ली अंक १, पृ. ७० पा. टि. ३। ४. डेकन आर्ट एण्ड पेन्टिंग्स इन द सेन्ट्रल म्यूजियम लाहौर, चित्र सं. ०-३ ।