भारतकोश
संग्रह पर लौटें

चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

DevanagariAwadhipublished520 पृष्ठ

ध्यान वासुदेवशरण अग्रवाल का गया। उन दिनों वे मलिक मुहम्मद जायसी के पदमावत की संजीवनी व्याख्या प्रस्तुत करने में लगे थे। रामपुर के रजा पुस्तकालय में फारसी लिपि में अंकित पद्मावत की जो प्रति है, उसके प्रथम पृष्ठ पर उन्हें चन्दायण शीर्षक के साथ उक्त ग्रन्थ की चार पंक्तियाँ अंकित मिलीं। इन पंक्तियों को उन्होंने पहले एक लेख में फिर अपनी पदमावत की भूमिका में उद्धृत किया।¹ उन दिनों मैं वासुदेवशरण अग्रवाल के निकट सम्पर्क में था तथा काशी विश्वविद्यालय के भारत कला भवन में सहायक संग्रहाध्यक्ष के पद पर काम कर रहा था। अतः चन्दायण का इस प्रकार परिचय मिलने पर मेरा ध्यान तत्काल भारत कला भवन में संग्रहीत अपभ्रंश शैली के उन ६ चित्रों की ओर गया जिनकी पीठ पर फारसी लिपि में आलेख हैं। ये चित्र बीस-पचीस वर्ष पूर्व राय कृष्णदास को काशी के गुदड़ी बाजार में मिले थे। उनकी कलापारखी दृष्टि से उसका महत्व छिपा न रह सका और वे उन्हें कदाचित दो-दो आने में खरीद लाये थे। कला के इतिहास की दृष्टि से इन चित्रों का अत्यधिक महत्व है। ये भारतीय कला से सम्बन्ध रखने वाले अनेक ग्रन्थों में प्रकाशित हो चुके हैं और उनकी अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति है। राय कृष्णदास ने पृष्ठांकित आलेखों को पढ़कर इतना तो अनुमान कर लिया था कि ये किसी अवधी काव्य के पृष्ठ हैं पर किस काव्य के पृष्ठ हैं इसका उन्हें कोई अनुमान न हो सका था। फलतः कला-पुस्तकों में सर्वत्र इन चित्रों की चर्चा अज्ञात अवधी काव्य के पृष्ठों के रूप में ही हुई है। मैंने इन चित्रों के आलेखों की परीक्षा की और उन आलेखों में जहाँ-तहाँ लोरक (काव्य के नायक) और चन्दा (काव्य की नायिका) का नाम पाकर मुझे इस बात में तनिक भी सन्देह न रहा कि ये पृष्ठ चन्दायण के ही हैं। मेरे इस खोज के परिणाम स्वरूप कला-क्षेत्र में यह बात स्वीकार कर ली गयी कि ये चित्र लोरक-चन्दा की कथा के हैं।² कला के क्षेत्र में चन्दायण की जानकारी इससे भी पहले थी। पंजाब संग्रहालय में २४ चित्रों की एक माला थी जो अब पाकिस्तान और भारत के बीच बँट गयी है। (१४ चित्र लाहौर संग्रहालय में रह गये और १० चित्र भारत को मिले जो अब पटियाला स्थित पंजाब राजकीय संग्रहालय में हैं।) इन चित्रों के पीछे भी फारसी लिपि में आलेख हैं। उन आलेखों से उस संग्रहालय के संग्रहाध्यक्ष ने यह जान लिया था कि ये लौर और चन्दा नामक प्रेमी-प्रेमिका से सम्बन्ध रखने वाले किसी काव्य ग्रन्थ के पृष्ठ हैं। उन्होंने लाहौर संग्रहालय के चित्रों की सूची प्रकाशित की उसमें इन चित्रों का परिचय इसी रूप में दिया है। इन चित्रों की विस्तृत विवेचना कार्ल खण्डालावाला ने बम्बई की सुप्रसिद्ध कला पत्रिका मार्ग में की है। वहाँ उन्होंने इन चित्रों को लौर-चन्दा


१. भारतीय साहित्य (आगरा) वर्ष २ अंक १ पृ. १३४ पदमावत संजीवनी व्याख्या द्वितीय (झाँसी) १९५६ ई. पृ. ११। २. रूपिन कला, दिल्ली अंक १, पृ. ७० पा. टि. ३। ४. डेकन आर्ट एण्ड पेन्टिंग्स इन द सेन्ट्रल म्यूजियम लाहौर, चित्र सं. ०-३ ।

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لوح اول (بالائی جدول / Top Chart)

قضاء لوزدان ارضا سرابراز برورده آلتنجى كوز بر دنده بات محمد البصره نك يرى محمد ابراهیم اوغلى احمد اوغلى احمد بك احمد اریلو اویس ایلیك طام سعاری دائرنده كنج اوغزى دائرى كرويارك دائرى يداورنجى طامصار يوسفان كولی يكلجه سينانك كوزی اكمكهم جهاد ليقنده در


لوح ثانی (زیریں جدول / Bottom Chart)

در بیان سرحدات بككمز محله اسمعيلك كولى جبراك ولد بكيك طامساری مولود سونحات قارا حمزه نك يرنده ابو بكر بنك محلى مومن بن سلمان او در سطير وكيل يا ريمجه كولجه نور بر حاجي صالحك يرنده و آلبك ولدنك حصه سي

था और उसमें किन छन्दोंका प्रयोग हुआ था।१ मुन्तखब के ग्रन्थके प्रकाश- में आ जानेके बाद दाऊदके समयके सम्बन्धमें जो मिथ्या धारणाएँ फैली थीं उनका निराकरण हो जाना चाहिए था। पर परशुराम चतुर्वेदीने उसका विचित्र अर्थ लगा कर एक नया भ्रम प्रस्तुत कर दिया। कदाचित् उन्होंने मिश्रबन्धु और रामकुमार वर्माके कथनके साथ मुन्तखबके कथनका सम्बन्ध करनेका प्रयत्न किया। १९५१ ई. में कमल कुलश्रेष्ठका शोध निबन्ध हिन्दी प्रेमाख्यानक काव्य प्रकाशित हुआ। इस ग्रन्थमें उन्होंने पूर्व ज्ञात उपर्युक्त अधिकांश सूचनाओं को जो उन्हें उपलब्ध हो सकीं एकत्र कर बदायूनीके कथनपर बल देते हुए मत प्रकट किया कि चन्दायत का रचनाकाल वि० सं० १४७७ के निकट था। किन्तु इस ग्रन्थमें दी गयी महत्वकी सूचना यह है कि चन्दायत की कोई प्रामाणिक प्रति अभी- तक नहीं मिल सकी। एक अप्रमाणित-सी प्रति डा० धीरेन्द्र वर्मा ने अवश्य देखी है। परन्तु उसे वे कुछ कारणोंसे विशेष ध्यानपूर्वक नहीं देख सके और इस काव्यके सम्बन्धमें कुछ निश्चयपूर्वक बतलानेमें असमर्थ हैं।२ पाद टिप्पणीमें इस सम्बन्धमें कुछ अतिरिक्त सूचना भी है जो इस प्रकार है—बीकानेरके श्री पुरुषोत्तम शर्माके पास इस ग्रन्थकी एक प्रति है। शर्माजीने यह पोथी एक सज्जन द्वारा प्रयाग भेजी थी, परन्तु उन्होंने पोथीकी परीक्षा अच्छी तरह धीरेन्द्र वर्माको नहीं करने दी।३ कुलश्रेष्ठकी इस पादटिप्पणीके अतिरिक्त अन्य सूत्रसे भी इस प्रतिके सम्बन्धमें हमें जो जानकारी प्राप्त हुई है उससे भी ज्ञात होता है कि धीरेन्द्र वर्मा ने उसकी प्रामाणिकतामें सन्देह प्रकट किया था। धीरेन्द्र वर्मा ने इस प्रतिको चाहे जिस भी दृष्टिसे देखा हो चन्दायतकी किसी प्रकारकी प्रतिके अस्तित्वका ज्ञान भी अपने आपमें महत्वका था। परवर्ती अनुसन्धित्सुओंका ध्यान इस ओर जाना चाहिए था। खेद है किसीने इस ओर ध्यान नहीं दिया। १९५५ ई. में प्रेमाख्यानक काव्य और हिन्दी सूफी साहित्यसे सम्बन्ध रखनेवाले तीन ग्रन्थ प्रायः एक साथ ही प्रकाशित हुए। ये तीनों ही ग्रन्थ शोध-निबन्ध हैं जो विभिन्न विश्वविद्यालयोंके समक्ष पी एच०डी की उपाधिके निमित्त प्रस्तुत किये गये थे। ये हैं—हरिकान्त श्रीवास्तव कृत भारतीय प्रेमाख्यानक काव्य विमलकुमार जैन कृत सूफी मत और हिन्दी साहित्य और सरला शुक्ल कृत जायसीके परवर्ती हिन्दी सूफी कवि। विषयकी दृष्टिसे श्रीवास्तवके ग्रन्थका विस्तार सबसे अधिक है। उसमें दाऊदके ग्रन्थके सम्बन्धमें विशेष रूपसे और विस्तृत जानकारी की अपेक्षा की जाती है; किन्तु श्रीवास्तवकी जानकारी इस बाततक ही सीमित है कि सर्व प्रथम मुल्ला दाऊदकी नूरक चन्दा कहाणीके बाद कुतबनकी मृगावती मिली।४ १. वही काव्य संग्रह, प्रयाग, (द्वितीय संस्करण) सं. न. १३ पृ. ६१-६३। २. हिन्दी प्रेमाख्यानक काव्य, आग्रा, १९५१ ई. पृ. ८। ३. वही, पृ. ८, पा० टि. १। ४. भारतीय प्रेमाख्यानक काव्य, काशी, १९५५ ई. पृ. २२।

सरला शुक्लके शोध-निबन्धकी परिधिमें दाऊद नहीं आते। यदि उन्होंने उनके सम्बन्धमें एक शब्द भी न लिखा होता तो कोई आश्चर्यकी बात न होती, पर आश्चर्य तो यह देखकर होता है कि दाऊदके लिए उन्होंने एक लम्बा पैराग्राफ व्यय किया है।¹ फिर भी उसमें पूर्वके शोधोंसे ज्ञात तथ्योंकी कोई चर्चा नहीं है। उनकी दृष्टिमें रामकुमार वर्माका कथन बदायूनीके कथनसे अधिक महत्त्व रखता है। शुक्लजीके कथनका उद्धृत करना उनको अनावश्यक महत्त्व देना होगा। विमल- कुमार जैनने अपने निबन्धमें सरला शुक्लकी तरह विस्तारमें न जाकर, दाऊदके लिए दो-तीन पंक्तियाँ पर्याप्त माना है और उनमें उन्होंने रामकुमार वर्माके कथनको दुहरा भर दिया है।² इन शोध-निबंधोंके प्रकाशनसे अनेक वर्ष पूर्व वि. सं. २ ० ० ६ (१९५०-५१) में अगरचंद नाहटाने नागरी प्रचारिणी पत्रिका में 'मिश्रबन्धु-विनोदकी भूलें' शीर्षक एक लेख प्रकाशित किया था जिसमें मिश्रबन्धु के दाऊद सम्बन्धी कथन की ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए उन्होंने सूचना दी थी कि रावतमल सारस्वत को मूरक-चन्दाकी प्रेम कहानीकी एक प्रति मिली है और उस प्रतिके एक कड़वकके अनुसार चन्तायनकी रचना ७८१ हिजरीमें हुई थी।³ इस प्रकार १९५५ ई. से बहुत पूर्व, जब कि ये सभी निबन्ध शोधकी स्थितिमें भी न आये थे, बदायूनीका प्रामाणिक कथन एवं चन्तायनकी एक प्रतिका अस्तित्व प्रकाशमें आ चुका था। पर खेदजनक आश्चर्य है कि इन अनुसन्धित्सुओंमेंसे किसीने भी उनपर ध्यान देनेकी आवश्यकता अनुभव नहीं किया। १९५६ ई. में परशुराम चतुर्वेदीने जब अपनी दूसरी पुस्तक 'भारतीय प्रेमाख्यानकी परम्परा' प्रकाशित की तब उन्होंने संदिग्ध भावसे कहा कि राजस्थानमें एक उपलब्ध अधूरी प्रतिके अनुसार चन्तायनका रचना-काल सं० १४३६ होना चाहिये। इस प्रकार १९२८ ई. से लेकर १९५६ ई. तक सूफी साहित्य और प्रेमा- ख्यानक काव्योंको लेकर शोधका डिंडोरा तो खूब पिटा, पर हिन्दी साहित्यके विद्वानों और अनुसन्धित्सुओंकी जानकारी इस बाततक ही सीमित रही कि दाऊदन चन्तायन नामक कोई प्रेमाख्यानक काव्य लिखा था। उसकी एक प्रति उन्हें ज्ञात भी हुई तो उसकी ओर समुचित ध्यान ही नहीं दिया गया। लोग रामकुमार वर्माकी धुरी पर चक्कर काटते रहे। चन्तायनकी प्रतियोंकी खोजका वास्तविक काम ऐसे लोगोंने आरम्भ किया जिनका सम्बन्ध हिन्दी साहित्यसे कम पुरातत्त्व और इतिहास से अधिक है। यह कार्य उन्होंने १९५१-५३ ई. में ही आरम्भ कर दिया था। चन्तायनकी ओर सर्वप्रथम १. जायसीके परवर्ती हिन्दी सूफी कवि और काव्य, लखनऊ, सं० २०११ पृ. ११८। २. सूफीमत और हिन्दी साहित्य, दिल्ली, १९५५ ई., पृ. ११२। ३. नागरी प्रचारिणी पत्रिका, वर्ष ५४, सं. २, ३, पृ. ४२। ४. भारतीय प्रेमाख्यान की परम्परा, प्रयाग, १९५६ ई., पृ. ८८।

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लार्ड ब्रह्मा लार्ड सरस्वती / लार्ड रुद्र पड़-पड़ कपूर सोहाथा | होरा बारल खाता होरा बारल भरी | पड़-पड़ कपूर बांह हलाई आठ अर्ड ओर तेरी जामा चहार याद आरी गहरा वीर्य मार पूरी | करोड़ कला बलपूरी द्वारों के पाठार | भेद आनंद कला विकला बिया सतीन्द्रा राज तिजोरी ताले बच्चा राज राज तिजोरी थोर


स्वा दर सर मुसहफ़ दोम सुख रखिये | आन सिखा दिया सब्र याद आये | यक यक मुद्रा मौत सोधा | फ़ारज़ख़ी मर्ग दायर कढ़ छुरा दो बेला दिखला आरमुरजा अज़लानी ७ कुरान अक्ब्रिया मोरिया

फ़ारसी प्रति कड़वक ४०

मनाज़रीफ़ प्रति पद ३१६

पचास प्रति कड़वक २५७

सीरीज़का नाम दिया है।१ फलतः कला भवनवाले चित्र भी लौर चन्दा सीरीज़के दूसरे नमूनेके रूपमें स्वीकार किये गये। रामपुर, काशी और पंजाबकी इन तीन प्रतियोंके अतिरिक्त एक चौथी प्रति की जानकारी १९५३-५४ ई. में हुई। पटना कालेजके इतिहासके प्राध्यापक सैयद् हसन असकरी इतिहासके विद्वान होनेके अतिरिक्त उर्दू-हिन्दी साहित्यके प्रति भी रुचि रखते हैं और प्राचीन हस्तलिखित ग्रन्थोंकी खोज उनका व्यसन है। अपने इस व्यसनके परिणाम स्वरूप उन्हें अनेक महत्वपूर्ण ग्रन्थोंको प्रकाशमें लानेका श्रेय प्राप्त है। उस वर्ष मनेरशरीफके खानकाहके सज्जादनशीन और उनके भाई मौलवी मुरादुल्लम्के पुराने बस्तोंके बस्तोंको टटोलते हुए उन्हें चन्दायनके ६४ पृष्ठोंकी एक खण्डित प्रति मिली। वे उस समय केवल इतना ही जान सके कि वह हिन्दीका कोई अज्ञात ग्रन्थ है। संयोगसे वासुदेवशरण अग्रवाल उन्हीं दिनों पटना गये। असकरीने उन्हें वह ग्रन्थ दिखाया। तब सूक्ष्मरीक्षण करनेपर ज्ञात हुआ कि वे चन्दायके ही पृष्ठ हैं। तदनन्तर असकरीने इस प्रतिके सम्बन्धमें अंग्रेजी और उर्दूके पत्रोंमें कई लेख प्रकाशित किये।२ इस प्रतिके ज्ञात होनेके कारण ही चन्दायनकी एक अन्य प्रतिका पता चला। यह प्रति भी खण्डित है। इसमें भी ६४ पृष्ठ हैं; किन्तु इस प्रतिकी विशेषता यह है कि उसके पृष्ठ चित्रित हैं। काशी और पंजाबवाली प्रतियोंकी तरह ही इनके एक ओर चित्र और दूसरी ओर फारसी लिपिमें आलेख हैं। यह प्रति भोपालके एक मुस्लिम परिवारमें थी। उसके स्वामी चित्रोंके कारण उसे मूल्यवान तो समझते थे पर वे चित्र वस्तुतः क्या हैं, इसका उन्हें कुछ पता न था। १९५४ ई. में जब भारतीय पुरातत्त्व विभागके अरबी फारसी अभिलेखोंके विशेषज्ञ जियाउद्दीन अहमद देसाई भोपाल गये तो उन्हें यह चित्राधार दिखाया गया। देसाई उन्हीं दिनों पटना होकर आये थे और असकरीने उन्हें अपनी चन्दायनकी प्रति दिखायी थी। अतः उन्हें भोपालवाली प्रतिको उलटते-पुलटते हुए यह समझनेमें देर न लगी कि वह भी चन्दायनकी ही प्रति है। तब चन्दायनकी सचित्र प्रतिके रूपमें उसका महत्त्व बढ़ गया और उसे १९५५ ई. में बम्बईके प्रिंस आफ वेल्स म्यूजियमने क्रय कर लिया। काशीवाले पृष्ठ मेरे शोधसे प्रकाशमें आये यह ऊपर कहा जा चुका है। भोपालवाली प्रति उस संग्रहालयमें है, जहाँ मैं काम करता हूँ। अतः इन दोनों ही प्रतियोंपर काम करनेका अधिकार मेरा था ही। मनेरशरीफ वाली प्रतिका विवरण असकरी पहले ही प्रकाशित कर चुके थे। उनकी प्रतिके उपयोग करनेमें कोई बाधा थी ही नहीं। फलतः इन प्रतियोंके आधारपर चन्दायनको प्रस्तुत करनेका कार्य मैंने आरम्भ किया। १. मार्ग बम्बई, भाग ४ अंक १ पृ. २४। २. करेंट स्टडीज पटना कालेज १९५५ ई. पृ. ९-१६ पटना युनवर्सिटी जर्नल १९५ ई. पृ. १६०। प्रवाहित पटना अप्रैल १९५ ई. अंक ११ पृ. ५४-५४।

१ बम्बई (भोपाल) वाले चन्दायण के पृष्ठों के पाठोद्धार (फारसी लिपि से नागरी लिपि में रूपान्तरित करने) का काम समाप्त कर उसके पाठ के स्वरूप का अन्तिम निश्चय कर ही रहा था कि माताप्रसाद गुप्त ने प्रयाग विश्वविद्यालय के माध्यम से और विश्वनाथ प्रसाद ने आगरा विश्वविद्यालय के हिन्दी विद्यापीठ के माध्यम से बम्बई वाली प्रति के फोटो-प्रिंट की माँग की। तब ज्ञात हुआ कि वे दोनों विद्वान भी संयुक्त रूप से अन्य दो प्रतियों के सहारे चन्दायण पर काम कर रहे हैं। चूँकि मैं बम्बई वाली प्रति पर काम कर रहा था नियमान्तः संग्रहालय से उन्हें उसके फोटो प्रिंट आदि नहीं दिये जा सकते थे। किन्तु यह मानकर कि वे लोग हिन्दी साहित्य के जाने माने विद्वान हैं मेरी अपेक्षा वे इस ग्रन्थ के साथ अधिक न्याय कर सकेंगे मैंने आगे कार्य करना स्थगित कर दिया और उनकी माँगों के अनुसार प्रयाग विश्वविद्यालय को चन्दायण के पृष्ठों के फोटो नेगेटिव और आगरा हिन्दी विद्यापीठ को फोटो प्रिंट भिजवा दिये गये। कुछ काल पश्चात् माताप्रसाद गुप्त ने संग्रहालय के डायरेक्टर मोतीचन्द्र को लिखा कि बम्बई वाली प्रति का मेरा तैयार किया हुआ पाठ भी उन्हें भेज दिया जाय। मैंने उसका कार्य स्थगित कर दिया था इस कारण उसके प्रति मेरा कोई मोह न था। मैंने अपने पाठ की एक टाइप की हुई प्रति उन्हें भेज दी। कुछ दिन पश्चात् असकरी का एक लेख देखने में आया जिसमें उन्होंने बम्बई वाली प्रति (जिसकी चर्चा उन्होंने भोपाल प्रति के रूप में किया है) की एक टाइप की हुई कापी उदयशंकर शास्त्री (आगरा हिन्दी विद्यापीठ के एक अधिकारी) द्वारा प्राप्त होने की बात कही थी और उसके कुछ उद्धरण भी दिये थे। १ असकरी ने जिस टाइप की हुई प्रति से देखा वह प्रति मेरी वाली प्रति थी अथवा विश्वनाथ प्रसाद और माताप्रसाद गुप्त की अपनी तैयार की हुई कोई स्वतन्त्र प्रति इसके निर्णय और विचार में जाने की आवश्यकता नहीं। कहना केवल इतना ही है कि संग्रहालय से किसी को जब किसी वस्तु की प्रतिलिपि या फोटो आदि दी जाती है तो उस व्यक्ति से यह अपेक्षा की जाती है कि वह उसपर स्वयं काम करेगा और उस सामग्री को अपने तक ही सीमित रखेगा और प्रकाशन से पूर्व संग्रहालय के अधिकारियों से समुचित अनुमति ले लेगा। पर यह सौजन्य वे लोग निभा न सके। इसी बीच ग्वालियर के हरिहर निवास द्विवेदी बम्बई आये। वे उन दिनों चन्दायण की कथा से सम्बन्ध रखने वाले एक अन्य काव्य ग्रन्थ मैंगासत पर काम कर रहे थे। दुराग्रह करके वे भी मेरे वाचन की एक प्रति ले गये। ले जाते समय उन्होंने बार-बार आश्वासन दिया था कि वे मेरे वाचन को अपने तक ही सीमित रखेंगे और उसे प्रकाशित न करेंगे और मेरी प्रति मुझे शीघ्र ही लौटा देंगे; किन्तु ग्वालियर जाते ही वे अपना वचन भूल गये! अपनी पुस्तक में उन्होंने मेरे वाचन को अनुचित ढंग से उद्धृत तो किया ही बार-बार तकाजा करने पर भी मेरी प्रति लौटाना तो दूर पत्रोत्तर देने का सौजन्य भी उनसे न हो सका। १. पटना यूनिवर्सिटी जर्नल, १९६१ पृ. ६१।

चन्दायतकी इन प्रतियोंके मिलनेकी बात ज्ञात होनेपर राघव सारस्वतका ध्यान अपनी उस प्रतिकी ओर गया जो उनके पास बीसो बरससे पड़ी थी और जिसे धीरेन्द्र वर्माने अप्रमाणित घोषित कर दिया था। उन्होंने तत्काल अपने उस ग्रन्थका परिचय सरसम प्रकाशित कराया और उसका एक प्रति-मुद्रण मुझे भेजा। चन्दायतके सम्पादनकी इच्छा प्रकट करते हुए उन्होंने यह भी सूचित किया कि बम्बईवाली प्रतिका मेरा पाठ उन्हें कहींसे प्राप्त हो गया है और वे मुझसे तत्सम्बन्धी अन्य आव- श्यक जानकारी चाहते हैं। शालीनताकी इस प्रकार उपेक्षा देखकर मेरा चौंक उठना स्वाभाविक था। मैं क्षुब्ध हो गया। मोतीचंदजीको भी ये बातें अच्छी न लगीं। उन्होंने भी सलाह दी कि मैं अपना पाठ शीघ्रतिशीघ्र प्रकाशित कर दूँ। फलतः मैंने पुनः चन्दायतके सम्पादनमे हाथ लगाया। उसके लिए सामग्री जुटाते समय जब कमल कुलश्रेष्ठके शोध निबंध हिन्दी प्रेमाख्यानक काव्यको उलट रहा था, उस समय मेरा ध्यान उनके इस कथनकी ओर गया कि गार्सा द तासीने अपनी पुस्तक हिस्तोरे द ला लितरेत्योर हिन्दुई पत हिन्दुस्तानीमें लौरक चन्दाकी कुछ अप्राप्य प्रतियोंका उल्लेख किया है। यह कथन मुझे कुछ आश्चर्यजनक साथ ही महत्वपूर्ण जान पड़ा। मैंने तत्काल उक्त ग्रन्थका लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय द्वारा प्रस्तुत अनुवाद हिन्दुई साहित्यका इतिहास देखा पर उसमें ऐसी कोई बात मुझे न मिल सकी जिससे कमल कुलश्रेष्ठके कथनका समर्थन हो सके। यह बात नहीं कि कुलश्रेष्ठने गलत सूचना प्रस्तुत की है वरन् वार्ष्णेयने अनुवाद करनेमे स्वेच्छा-नीति बरती है। जो अंश उन्हें अनावश्यक जान पड़े उन्हें उन्होंने छोड़ दिया है। ऐसे आकर ग्रन्थोंके अनुवादमें, जो मूलमें दुष्प्राप्य हों स्वेच्छाका प्रयोग किस प्रकार घातक सिद्ध हो सकता है, यह स्पष्ट सामने आया। मेरे लिए आवश्यक हो गया कि मूल ग्रन्थ देखूँ। तासीके उक्त ग्रन्थके दो संस्करण प्रकाशित हुए थे। एक तो १८४० और १८४७ के बीच और दूसरा १८७०-७१ ई० में। दूसरे संस्करणमे लेखकने काफी परिवर्तन किया है। पहले संस्करणको उलटनेपर जो कुछ मिला उसका अंग्रेजी रूप इस प्रकार है:-- रोमान्स-(दि) आव लौरक एण्ड चुरक आर द फेरी टेल्स आव द सेक- ल कार्डो-चारल्ड मैनुस्क्रिप्ट बिच मेनी कलर्ड डेकोरेझन्स। दिस मैनुस्क्रिप्ट इस रिटेन इन पिक्युलियर पर्शीयन कैरेक्टर्स। इट बिलाग्ज टु द रिच कलेक्शन आव द क्युक आव सस्पेक्ट अफिस आफ हर मजेस्टी द क्वीन आव ग्रेट ब्रिटेन।१ अर्थात्—लौरक और चुरककी प्रेम कथा अथवा फेरिन स्पिरिट परीमहल—एक चीथड़ा हस्तलिखित ग्रन्थ, जिसमें अनेक रंगीन अलंकरण हैं। यह हस्तलिखित ग्रन्थ विचित्र ढंगके पारसी लिपिमें लिखा हुआ है। यह ब्रिटेनकी महारानीके चचा क्युक आव ससेक्सके मूल्यवान संग्रहमें है। १ ग्रन्थ १ पृ ५२६

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क्रय किया था। पश्चात् उक्त पुस्तक विक्रेताने उस संग्रहके हस्तलिखित ग्रन्थोंको फारसीके सुप्रसिद्ध विद्वान् नथेनियल ब्लान्दके हाथ बेचा। आगे खोज करनेपर ज्ञात हुआ कि नथेनियल ब्लान्दने जो हस्तलिखित ग्रन्थ संग्रह किये थे, उन्हें १८६६ ई. में लार्ड आग क्राफर्डने क्रय किया था और वे उनके बिब्लियोथेका लिण्डेसियाना नामक निजी पुस्तकालयमें रखे गये थे। आगे खोज करनेपर पता चला कि १९०१ ई. में क्राफर्ड संग्रहको मैनचेस्टरके जान रीलेण्ड्स पुस्तकालयने क्रय किया था। जब मैंने रीलेण्ड्स पुस्तकालयसे पूछताछ की तो उन्होंने क्राफर्ड संग्रह क्रय करनेकी बात स्वीकार करते हुए सूचना दी कि उपयुक्त ग्रन्थ उनके संग्रहमें मौजूद है। तत्काल मैंने उनसे उक्त ग्रन्थका माइक्रोफिल्म देनेका अनुरोध किया। माइक्रोफिल्म आनेपर ज्ञात हुआ कि मेरा अनुमान सर्वथा सत्य था। उक्त ग्रन्थ वस्तुतः चन्दायना ही है। इस प्रकार मेरे हाथ चन्दायना की एक बहुत बड़ी प्रति आयी और मैं उस प्रतिके पाठोद्धारमें जुट गया। इस नयी प्रतिकार पाठोद्धार चल ही रहा था कि डब्लू० वी० आर्चर द्वारा सम्पादित इण्डियन मिनियेचर नामक भारतीय चित्रोंका विद्याभार प्रकाशमें आया। उसमें उन्होंने मैसाचुसेट्स (अमेरिका) निवासी फ्रैंसिस होफरके संग्रहसे एक चित्र प्रकाशित किया है।१ उसे उन्होंने बम्बई प्रतिके चित्रोंकी शैलीका बताया था। इस सूत्रसे चन्दायनाके कुछ और पृष्ठ प्राप्त होनेकी सम्भावना सामने आयी और मैं उन्हें भी प्राप्त करनेकी ओर प्रयत्नशील हुआ फलतः उक्त संग्रहसे इस काव्यके दो पृष्ठ हाथ आये। इस प्रकार कुछ बरसों पूर्वतक जो चन्दायना हिन्दी साहित्यके इतिहासमें केवल नाम रूपमें जीवित था, उसके सम्बन्धकी पर्याप्त सामग्री एकत्र हो गयी। मैंने उसके सम्पादनका कार्य नये सिरेसे आरम्भ किया और परिणाम-स्वरूप यह ग्रन्थ अब आपके सामने है। उपलब्ध सामग्रीके आधारपर चन्दायनाको अपने पूर्णरूपमें प्रस्तुत करना तो सम्भव नहीं हो सका फिर भी उसका एक बहुत बड़ा अंश सामने आ गया। अभी उसके आदि और अन्तके कुछ अंश अनुपलब्ध हैं और बीचमें यत्रतत्र कुछ पृष्ठोंका अभाव है। यदि रावत सारस्वतवाली प्रतिकतक मेरी पहुँच हो सकती तो सम्भवतः आदि और मध्यके अंशोंकी पूर्ति कर पाता यद्यपि उसका पाठ अत्यन्त विकृत है। सुनता हूँ वे उस प्रकाशित कर रहे हैं। यदि वह प्रति कभी प्रकाशमें आ सकी तो यह कमी पूरी हो जायगी; पर अन्तिम अंशकी पूर्ति तभी सम्भव है जब कोई नयी प्रति उपलब्ध हो। प्रस्तुत प्रबन्ध ग्रन्थकी उपलब्ध सामग्रीको फारसी लिपिसे नागरीअक्षरोंमें प्रस्तुत कर उन्हें क्रमबद्ध कर देने तक ही सीमित है। किन्तु अकेला यह काम भी कितना कठिन है इसका अनुभव वही कर सकते हैं जिन्हें इस कार्यका व्यावहारिक अनुभव है। १ इंडियन मिनियेचर्स ऑन्थोलोजी ...

१४ पद्मावत मधुमालती आदि ग्रन्थोंके सम्पादकोंको यह सुविधा रही है कि उनके सम्मुख फारसी लिपिमें अंकित प्रतियोंके साथ-साथ नागरीक्षर अथवा कैथी लिपिमें अंकित प्रतियाँ भी रही हैं और इस प्रकार उनके सम्मुख ग्रन्थका एक ढाँचा खड़ा था। उन्हें केवल शब्दोंके पाठ रूपका निर्धारण करना था। मेरे सम्मुख न तो कोई नागरी क्षर प्रति थी और न कथाका रूप ही ज्ञात था। कविकी वर्णन शैलीकी भी कोई जानकारी न थी। ऐसी स्थितिमे फारसी लिपिमें अंकित हिन्दी भाषाके इस ग्रन्थके पाठोद्धारका कार्य पत्थरसे सर टकराने जैसा था। कोई ग्रन्थ यदि नस्तालीक लिपि (आधुनिक फारसी लिपि) में हो और उसमें जेर, जबर, पेश और नुक्ते भी अपने स्थान पर लगे हों तो भी सरलतासे किसी हिन्दी शब्दके वास्तविक रूपका अनुमान नहीं किया जा सकता। यहाँ तो जो प्रतियाँ मेरे सामने हैं वे रस्मी नस्ख (अरबी लिपि शैली) में हैं और उनमें जेर, जबर, पेश तो हैं ही नहीं नुक्त्तोंका भी अभाव है; और यदि कहीं नुक्ते हैं भी तो यह निर्णय करना कठिन है कि वे अपने ठीक स्थान पर ही लगे हुए हैं। इस लिपिमें नुक्ते कहीं भी रखे जा सकते हैं। ऐसी स्थितिमे यह कहना कि मैंने पूर्णतः शुद्ध पाठोद्धार किया है प्रवंचना मात्र होगी। यही कह सकता हूँ कि मूल शब्द तक पहुचनेकी यथासाध्य चेष्टा मैंने की है। फिर भी अनेक शब्द ऐसे हैं जहाँ पाठके शुद्ध होनेमें मुझे स्वयं सन्देह है। उपलब्ध सामग्रीको क्रम बद्ध रूप देनेका पूर्ण प्रयत्न किया गया है, फिर भी कुछ ऐसे अंश हैं जिनका पर्याप्त स्रोतके अभावमे उचित स्थान निश्चित करना सम्भव नहीं हो सका है। ऐसे स्थलोंपर अनुमानका सहारा लिया गया है। प्रस्तुत ग्रन्थका कार्य आरम्भ करते हुए मैंने शुद्ध पाठ (क्रिटिकल टेक्स्ट) वासुदेवशरण अग्रवालकृत पद्मावतकी सञ्जीवनी व्याख्याके अनुकरण पर व्याख्या और आवश्यक शब्दोंके अर्थ और उनके स्पष्टीकरण के लिए टिप्पणी देनेकी कल्पना की थी। पर पाठोद्धारका काम समाप्त होनेके पश्चात् जब इस ओर अग्रसर हुआ तो ज्ञात हुआ कि उपलब्ध सामग्रीके आधारपर परिशुद्ध सम्पादन (क्रिटिकल एडिटिंग) सम्भव नहीं है। उपलब्ध प्रतियाँ अधिकांशतः काव्यके विभिन्न अंगोंके रूपमें प्राप्त हैं। ऐसे खण्ड थोड़े ही हैं जो एकसे अधिक प्रतिमें प्राप्त हैं। परिशुद्ध सम्पादनका कार्य तभी सम्भव है जब दो से अधिक प्रतियाँ यदि पूर्णतः नहीं तो अधिकांश अंशोंमें उपलब्ध हों। अशुद्ध पाठके आधारपर ग्रन्थकी व्याख्याका कार्य भी कुछ महत्त्व नहीं रखता। जब तक पाठके शुद्ध और स्पष्ट होनेका विश्वास न हो समुचित व्याख्या उपस्थित नहीं की जा सकती। अतः यह कार्य भी हाथमें न लिया जा सका। ग्रन्थमें आये महत्त्वपूर्ण शब्दोंका अर्थ और उनके स्पष्टीकरणका कार्य किया जा सकता था; पर यह काम मेरी अपनी दृष्टिमें उतना सरल नहीं है जितना कि इस दिशामें काम करनेवाले अनेक विद्वान समझते हैं। खींचतान पर शब्दोंका मनमाना प्रस्तुत करनेमें मेरा विश्वास नहीं। किसी शब्दके भावको समझनेके लिए उसके

१५ मूलतक जाना आवश्यक है। इस ग्रन्थमें आये हुए शब्दोंके मूलमें एक ओर संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश है तो दूसरी ओर अरबी और फारसी। अतः यह कार्य इन भाषाओंके कोशोंके बीच बैठकर ही किया जा सकता है। इस प्रकारके कार्यकी प्रगति सदैव मन्द ही होगी। दुर्भाग्यसे इन दिनों इस कार्यको हाथमें लेनेके निमित्त मेरे पास समयका अभाव है और मेरे मित्रों और हितैषियोंको इतना धैर्य नहीं है कि वे कुछ समय तक इसके लिए रुक सकें। उनका निरन्तर तकावा है कि मूल ग्रन्थ शीघ्रसे शीघ्र प्रकाशमें आना ही चाहिये। अतः इस कामको भी अगले संस्करण तकके लिए स्थगित कर देना पड़ रहा है। जिन शब्दोंके टीप मैंने ले लिये हैं, उन्हें ही देकर सन्तोष मानता हूँ। अन्तमें यह भी निसंकोच कह देना चाहता हूँ कि हिन्दी साहित्य मेरा अपना विषय नहीं है। मध्यकालीन हिन्दी कवियों और उनके काव्योंसे मेरा परिचय नहींके बराबर है। साहित्यके क्षेत्र में प्रवेश करनेका दुस्साहस सदैव मैंने अपने पुरातत्व और इतिहास प्रेम के माध्यमसे ही किया है। पुरातत्त्वकी शोध-बुद्धि ही मुझे चन्दायानके निकट खींच लायी है और यह ग्रन्थ आपके सम्मुख उपस्थित करनेकी धृष्टता कर रहा हूँ। यदि इसमें कहीं कोई कमी और त्रुटि जान पड़ तो उसे मेरी असमर्थता समझकर पाठकवृन्द क्षमा करें। इस दुर्बलताके बावजूद, ग्रन्थको प्रस्तुत करते हुए मैं गौरवका अनुभव करता हूँ। हिन्दी साहित्यके इतिहासकी दृष्टिसे चन्दायानका अपना मूल्य और महत्व है; उसका प्रकाशमें आना हिन्दी साहित्यके इतिहासमें एक बहुत बड़ी घटना है। प्रिंस आव वेल्स म्यूजियम बम्बई। गणतन्त्र दिवस १९५२। परमेश्वरी लाल गुप्त

इस चित्र में कोई पाठ (टेक्स्ट) उपलब्ध नहीं है, यह पृष्ठ पूरी तरह से रिक्त (blank) है।

कृतज्ञता ज्ञापन सर्वप्रथम मैं प्रिन्स आव वेल्स म्यूजियम, मुम्बई के डायरेक्टर डाक्टर मोतीचन्द्र, जान रीलैण्ड्स पुस्तकालय, मैनचेस्टर (इङ्गलैण्ड) के डायरेक्टर डाक्टर इ. राबर्टसन तथा उसके हस्तलिखित ग्रन्थ विभागके अध्यक्ष डाक्टर एफ. टेलर, भारत कला भवन, काशी के उपहाध्यक्ष राय कृष्णदास, पंजाब राजकीय संग्रहालय के अध्यक्ष श्री विद्यासागर सूरि, पटना के सैयद हसन असकरी, मैसाचुसेट्स (अमेरिका) के श्री फ़्रैन्सिस हॉफ़र, रज़ा पुस्तकालय रामपुर के पुस्तकाध्यक्ष श्री अर्शी का आभार मानता हूँ, जिन्होंने अपने संग्रह की चन्दायन सम्बन्धी सामग्री प्रसन्नतापूर्वक मुझे सुलभ कर दी और उन्हें प्रकाशित करनेकी अनुमति प्रदान की। जान रीलैण्ड्स पुस्तकालय के अधिकारियों का इसलिए भी अत्यन्त अनुगृहीत हूँ कि उन्होंने न केवल मुझे अपनी प्रतिके उपयोग और प्रकाशित करने की अनुमति दी वरन् उसे ढूंढ निकालने के कारण उन्होंने उसपर मेरा अधिकार स्वीकार किया और स्वेच्छया अपना यह कर्तव्य भी माना कि जबतक मेरा ग्रन्थ तैयार न हो जाय तबतक वे उस प्रतिके सम्बन्ध में किसी प्रकार की सूचना किसी अन्य व्यक्तिको न देंगे और तत्सम्बन्धी जानकारी अपने तक ही सीमित रखेंगे। और इसका निर्वाह उन्होंने पूर्णतः किया। रीलेण्ड्स वाली प्रति ढूँढ़ निकालने में ब्रिटिश म्यूजियमके प्राच्य पुस्तक विभागके श्री बी. एम. मैरेडिथ ओवेन्स और इण्डिया आफिस पुस्तकालयकी सहायक कीपर मिस ई. एम. डाइमने मेरी बहुत बड़ी सहायता की। भारतीय कलाके अमेरिकी कला मर्मज्ञ श्री कैरी वेल्चने होपर संग्रहके पृष्ठोंके ट्रान्सपेरेन्सी तैयार कर भेजनेकी कृपा की। लाहौर संग्रहालय की प्रतिके फोटोकी प्राप्ति सुविख्यात चित्रकार श्री अब्दुर्रहमान चुग़ताई और ढाका संग्रहालयके अध्यक्ष डाक्टर अहमद हसन दानीकी सहायताके बिना सम्भव न था। इन सबके प्रति भी मैं अत्यन्त कृतज्ञ हूँ। डाक्टर मोतीचन्द्र के प्रति किन शब्दों में अपनी कृतज्ञता प्रकट करूँ। उनका तो चिरऋणी रहूँगा। उन्होंने मेरे इस कार्य में आरम्भ से रुचि ली और मुझे सतत प्रोत्साहित करते रहे। यही नहीं कोषाकार कार्य में भी मेरा निरन्तर निर्देशन करते रहे, कठिन स्थलोंके पाठोद्धार में स्वयं माथापच्ची की और उपयुक्त पाठ सुझाये। उनके सहयोग के बिना कदाचित मैं इस कार्य को ठीक और सुगमतासे न कर पाता। उर्दू रिसर्च इन्स्टीच्यूट बम्बई के डायरेक्टर श्री नईम अहमद नदवी और उनके सहायक

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श्री अब्दुर्रज्जाक कुरैशीने काव्यके फारसी शीर्षकोंके पाठ और उनके अनुवाद प्रस्तुत करनेमें मेरी पूरी सहायता तो की ही साथ ही उर्दू-फारसी ग्रन्थोंके आवश्यक सन्दर्भों को प्राप्त करनेमें भी योग दिया। सैयद् हसन अस्करी भी, अपनी प्रति देनेके अतिरिक्त मेरे इस काममें निरन्तर रुचि लेते रहे और जब कभी उन्हें मेरे कामकी कोई चीज नजर आयी उन्होंने तत्काल उससे अवगत किया। उनकी इस कृपाके कारण मुझे बहुत-सी महत्त्वपूर्ण सामग्रीकी जानकारी हो सकी। इन सबका ऋण मेरे ऊपर कम नहीं है। इन सम्बन्धोंके अतिरिक्त सर्व श्री भगवान दास (शास्त्री) किशोरी लाल गुप्त (आजमगढ़) शान्ति स्वरूप (आजमगढ़) गणेश चौबे (मोतिहारी) नर्मदेश्वर चतुर्वेदी (प्रयाग), त्रिलोकी नाथ दीक्षित (लखनऊ) कयुमुद्दीन अहमद (पटना) वेद प्रकाश गुप्त (सहारनपुर), प्रभाकर डांडे (बम्बई) शिवसहाय पाठक (बम्बई) जगदीश चन्द्र जैन (बम्बई) हरिवल्लभ भयाणी (बम्बई) नरेन्द्र शर्मा (बम्बई) व्रजकिशोर (दरभंगा) छगन मेहता (बम्बई) आदि महानुभावोंने इस ग्रन्थकी सामग्री जुटानेमें तरह-तरहकी सहायता दी है। इन सबके प्रति भी मैं अपनी कृतज्ञता प्रकट करता हूँ। पुस्तक की पाण्डुलिपि तैयार हो जाने पर भाई श्रीकृष्णदत्त भट्ट ने उसे आद्योपान्त देखने की कृपा की और महत्त्वपूर्ण सुझाव दिये। इसके लिए मैं उनका अत्यन्त आभारी हूँ। प्रकाशकके रूपमें श्री यशोधर जी मोदीने इसके प्रकाशित करनेमें जो रुचि प्रकट की और उसको शीघ्रातिशीघ्र प्रकाशित करनेकी जो व्यवस्थाकी, उसे मैं भूल नहीं सकता। उसी तत्परतासे ज्ञानमण्डल मुद्रणालयके व्यवस्थापक श्री ओमप्रकाश कपूर ने भी इसके मुद्रणमें योग दिया। इन दोनोंके प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए प्रसन्नताका अनुभव करता हूँ। परमेश्वरी लाल गुप्त

परिचय कवि दाऊदके जीवन-वृत्तपर प्रकाश डालने वाले तथ्योंकी जानकारीके साधन अभी उपलब्ध नहीं हैं। उन्होंने चन्दायणके आरम्भमें जो आत्म-परिचय दिया है, वह हमें उपलब्ध किसी प्रतिमें प्राप्त नहीं है। बीकानेरवाली प्रतिमें सम्भवतः यह अंश अक्षुण्ण है; किन्तु उस प्रतिकी जानकारी अभी तक रावतसारस्वत तक ही सीमित है। उन्होंने उसका जो संक्षिप्त विवरण वरदा में प्रकाशित किया है उससे दाऊद के सम्बन्धमें कुछ ही बातोंकी जानकारी हो सकी है। बीकानेरवाली प्रतिके आदि-शीर्षकमें दाऊदको डलमई कहा गया है। इससे ज्ञात होता है कि वे या तो डलमऊके निवासी थे अथवा डलमऊ उनका निवास- स्थान था। दाऊदने डलमऊका वर्णन अपने ग्रन्थमें किया है और उसे गंगा-तटपर बसा बताया है। गंगा-तटपर बसा हुआ डलमऊ आज भी उत्तर प्रदेशके रायबरेली जिलेका एक प्रसिद्ध कस्बा है जो रायबरेलीसे ४४ मील और कानपुरसे ६१ मीलपर स्थित रेलवे जंकशन है। अवधके प्रादेशिक तथा रायबरेलीके जिला गजेटियरमें कहा गया है कि दिल्लीके सुल्तान इल्तुतमिश (अल्तमश) के शासन कालमें इस नगरने समृद्धि प्राप्त की थी। उस समयमें वहाँ मखदूम बद्रुद्दीन रहा करते थे। फीरोजशाह तुगलकके शासनकालमें वहाँ इस्लाम धर्म और विद्याके अध्ययनके लिए एक विद्यालयकी स्थापना हुई थी। इधर उपलब्ध एक पृष्ठसे अनुमान होता है कि दाऊदके पिताका नाम मलिक मुबारिक और पितामहका नाम मलिक बर्पा था। मलिक मुबारिक डलमऊके मीर (न्यायाधीश) थे और उनपर दिल्ली सुल्तान फीरोजशाह तुगलकके मन्त्री खान-ए जहाँकी कृपा थी।१ मुगलकालीन सुप्रसिद्ध इतिहासकार अब्दुलकादिर बदायूनीके कथनानुसार दाऊदको खान-ए-जहाँके पुत्र मौना शाहका आश्रय प्राप्त था। जान पड़ता है अपने पिताके सम्पर्कसे दाऊद भी खान-ए-जहाँके और उसकी मृत्युके पश्चात् उसके पुत्र मौना शाहके कृपापात्र बन गये थे। दाऊदने अपने ग्रन्थमें खान ए-जहाँकी भूरि भूरि प्रशंसा की है। यदि दाऊदके पिता और पितामहकी उपाधि मलिक थी तो यह अनुमान कर लेना सहज है कि वे स्वयं भी मलिक दाऊद कहे जाते रहे होंगे। मिश्रबन्धुने उन्हें १ ये मलिक मुबारिक शेख हुसेनके१ सर्वथा भिन्न थे जिन्हें तारीख ए हुसैनीके रचयिताने मसनद- महालीकी निजी खोजोंका मूल स्रोत (मौलानाजादा) करार दिया है।