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चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

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१४ पद्मावत मधुमालती आदि ग्रन्थोंके सम्पादकोंको यह सुविधा रही है कि उनके सम्मुख फारसी लिपिमें अंकित प्रतियोंके साथ-साथ नागरीक्षर अथवा कैथी लिपिमें अंकित प्रतियाँ भी रही हैं और इस प्रकार उनके सम्मुख ग्रन्थका एक ढाँचा खड़ा था। उन्हें केवल शब्दोंके पाठ रूपका निर्धारण करना था। मेरे सम्मुख न तो कोई नागरी क्षर प्रति थी और न कथाका रूप ही ज्ञात था। कविकी वर्णन शैलीकी भी कोई जानकारी न थी। ऐसी स्थितिमे फारसी लिपिमें अंकित हिन्दी भाषाके इस ग्रन्थके पाठोद्धारका कार्य पत्थरसे सर टकराने जैसा था। कोई ग्रन्थ यदि नस्तालीक लिपि (आधुनिक फारसी लिपि) में हो और उसमें जेर, जबर, पेश और नुक्ते भी अपने स्थान पर लगे हों तो भी सरलतासे किसी हिन्दी शब्दके वास्तविक रूपका अनुमान नहीं किया जा सकता। यहाँ तो जो प्रतियाँ मेरे सामने हैं वे रस्मी नस्ख (अरबी लिपि शैली) में हैं और उनमें जेर, जबर, पेश तो हैं ही नहीं नुक्त्तोंका भी अभाव है; और यदि कहीं नुक्ते हैं भी तो यह निर्णय करना कठिन है कि वे अपने ठीक स्थान पर ही लगे हुए हैं। इस लिपिमें नुक्ते कहीं भी रखे जा सकते हैं। ऐसी स्थितिमे यह कहना कि मैंने पूर्णतः शुद्ध पाठोद्धार किया है प्रवंचना मात्र होगी। यही कह सकता हूँ कि मूल शब्द तक पहुचनेकी यथासाध्य चेष्टा मैंने की है। फिर भी अनेक शब्द ऐसे हैं जहाँ पाठके शुद्ध होनेमें मुझे स्वयं सन्देह है। उपलब्ध सामग्रीको क्रम बद्ध रूप देनेका पूर्ण प्रयत्न किया गया है, फिर भी कुछ ऐसे अंश हैं जिनका पर्याप्त स्रोतके अभावमे उचित स्थान निश्चित करना सम्भव नहीं हो सका है। ऐसे स्थलोंपर अनुमानका सहारा लिया गया है। प्रस्तुत ग्रन्थका कार्य आरम्भ करते हुए मैंने शुद्ध पाठ (क्रिटिकल टेक्स्ट) वासुदेवशरण अग्रवालकृत पद्मावतकी सञ्जीवनी व्याख्याके अनुकरण पर व्याख्या और आवश्यक शब्दोंके अर्थ और उनके स्पष्टीकरण के लिए टिप्पणी देनेकी कल्पना की थी। पर पाठोद्धारका काम समाप्त होनेके पश्चात् जब इस ओर अग्रसर हुआ तो ज्ञात हुआ कि उपलब्ध सामग्रीके आधारपर परिशुद्ध सम्पादन (क्रिटिकल एडिटिंग) सम्भव नहीं है। उपलब्ध प्रतियाँ अधिकांशतः काव्यके विभिन्न अंगोंके रूपमें प्राप्त हैं। ऐसे खण्ड थोड़े ही हैं जो एकसे अधिक प्रतिमें प्राप्त हैं। परिशुद्ध सम्पादनका कार्य तभी सम्भव है जब दो से अधिक प्रतियाँ यदि पूर्णतः नहीं तो अधिकांश अंशोंमें उपलब्ध हों। अशुद्ध पाठके आधारपर ग्रन्थकी व्याख्याका कार्य भी कुछ महत्त्व नहीं रखता। जब तक पाठके शुद्ध और स्पष्ट होनेका विश्वास न हो समुचित व्याख्या उपस्थित नहीं की जा सकती। अतः यह कार्य भी हाथमें न लिया जा सका। ग्रन्थमें आये महत्त्वपूर्ण शब्दोंका अर्थ और उनके स्पष्टीकरणका कार्य किया जा सकता था; पर यह काम मेरी अपनी दृष्टिमें उतना सरल नहीं है जितना कि इस दिशामें काम करनेवाले अनेक विद्वान समझते हैं। खींचतान पर शब्दोंका मनमाना प्रस्तुत करनेमें मेरा विश्वास नहीं। किसी शब्दके भावको समझनेके लिए उसके