चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२१ राहु केतु थर उठे, दसा सूर भा आइ ॥६ सूंक सींह उतरा पँथ, जोगिनि बाहर सब लै जाइ ॥७ टिप्पणी—(१) तबल—नक्कारा जैसा स्तानगाइसके फारसी कोषके अनुसार तबल ढोलकी संज्ञा है जो घोड़े या ऊँटपर रख कर बजाया जाता था। (२) कँटकाहा—सैनिक। (३) घोर—घोड़ा। पाखरे—पख्तरयुक्त, कवचधारी। (४) वहा—(स हद्द, मा वर) तूरही। सींगा—सींग का बना हुआ बिगुल। ९८ (रीफैन्स ५१) तिनके अछवाने अरबी ताजी राव रूपचन्द (राव रूपचन्द्रके अरबी अश्व) आनों भाँत दीख कैकानों। अँगुरो दोइ-दोइ तिहँ कै फानों ॥१ सेत कियाह फार मनु रीठा। हरीयाँव मुख झमकस दीठा ॥२ फाब संकोसी लोहू समाहें। समुँद लाँघि जनु लघन चाहें ॥३ नैन निरष जनु पाइ पखारी। पवन पंख देखत हरियारी ॥४ मात चढ़े मुख घायी दीजा। तंग पिसार बैत धर लीजा ॥५ फेर समुँद हुत काढे, कै यह पापि पयान ।६ सोन पाखर खाल के, आनें पिये पठान ॥७ टिप्पणी—(१) भाँत-भाँति प्रकार। कैकानों—घोड़े। कैकान वस्तुतः बोलन दर्रेके दक्षिण बलूचिस्तानके उत्तर-पूर्व, मस्तुंग और कलातके आस-पास क क्षेत्रका नाम है। यह अति प्राचीन कालमे घोड़ोंकी अच्छी नस्लके लिए प्रसिद्ध है। वहाँके घोड़ोंका उल्लेख भोज कृत युक्ति कल्पतरु (अश्व परीक्षा श्लोक २६) मानसोल्लास (४।६६) नकुल कृत अश्व चिकित्सा (१।८) और शालिभद्र सूरि कृत बाहुबलिरास (बारहवीं शतीमें रचित) में हुआ है। कालान्तरमें कैकान घोड़ोंका पर्यायवाची बन गया। अंगुरो—अंगुष्ठ। (२) सेत—सफ़ेद घोड़े। कियाह—कृष्णोदर एक लाल व एक चमका रंग। फार—फान। रीठा—एक फल जिसका छिल्का काला