चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९२ दीन्हि मढ़ि देउर ऊँपराई । पैसय नारा पोखर पाई ॥४ काटे बारी महर के लाई । नरियर गोवा और फुलवाई ॥५ महर मंदिर चढ़ देखा, बहुत हुत असवार ।६ ओठन फिरै न असैं, साँडहि होइ झनकार ॥७ मूल पाठ—पंक्ति ४ के दोनों पदोंके अन्तिम शब्द क्रमशः उपरायउँ और पावउँ पढ़े जाते हैं। पर साथ ही पहले पदका अन्तिम शब्द बइँ के ऊपर हैं भी लिखा है। वस्तुतः उँपराई पाठ ही संगत है। उसी के अनुसार उत्तर पदके अन्तिम शब्द का पाठ पाई लिया गया है। टिप्पणी—(१) छेड़ा—घेरा। गाढ़—कठिन । फिरावा—फैलाया। (२) तुरिह—तोड़ डाला। पनवारी—पानके खेत। केतिह—कितन ही। रूँध—रुद्ध। (३) अंबराउँ—आम्राराम आम के बगीचे। तार—ताड़। बास—जासु जामुन। कवराउँ—(रुच्याराम>रुच्याराम>कहराउँ) एक खास वृत्तोत्थ बगीचा। (४) मढ़ि—मठ। देउर—(सं देवकुल>प्रा देउल>देउर) देवका मन्दिर। नारा—नाला। पोखर—पुष्कर, तालाब। (५) बारी—बगीचा। नरियर—नारियल। गोवा—सुपारी। फुलवाई— फुल्ल्वाटारी। (७) ओठन—टांक। साँड़—लम्बी सीधी तलवार जिसे सैनिक हाथमें लेकर चलते हैं। १०३ (रीडेण्ड्स ६१) हैवत उसतावन वर शहर व गिरिफ़्तबने महर रसूलान रा बर सर महर ( नगरमें आतंक—राय रूपचन्दके पास दूतका जाना) बाँधे पर्बर भई अहताग । बापहि पूत न कोउ सँभारा ॥१ महर लोग सब झार हँकारे। भासे चेव शनैं बिसारे ॥२ गाय भैंस दौघे रिरियाई । राँधा मात न कोऊ खाई ॥३ रोयहिं हीं करव [अन] काहा। फबहुँ काँप सरापत आहा ॥४ छेंक गाठें अँबरॉउँ कटाहिं । पठिये पसीठ उत्तर क्य पावाहिं ॥५