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चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

DevanagariAwadhipublished520 पृष्ठ

१९२ दीन्हि मढ़ि देउर ऊँपराई । पैसय नारा पोखर पाई ॥४ काटे बारी महर के लाई । नरियर गोवा और फुलवाई ॥५ महर मंदिर चढ़ देखा, बहुत हुत असवार ।६ ओठन फिरै न असैं, साँडहि होइ झनकार ॥७ मूल पाठ—पंक्ति ४ के दोनों पदोंके अन्तिम शब्द क्रमशः उपरायउँ और पावउँ पढ़े जाते हैं। पर साथ ही पहले पदका अन्तिम शब्द बइँ के ऊपर हैं भी लिखा है। वस्तुतः उँपराई पाठ ही संगत है। उसी के अनुसार उत्तर पदके अन्तिम शब्द का पाठ पाई लिया गया है। टिप्पणी—(१) छेड़ा—घेरा। गाढ़—कठिन । फिरावा—फैलाया। (२) तुरिह—तोड़ डाला। पनवारी—पानके खेत। केतिह—कितन ही। रूँध—रुद्ध। (३) अंबराउँ—आम्राराम आम के बगीचे। तार—ताड़। बास—जासु जामुन। कवराउँ—(रुच्याराम>रुच्याराम>कहराउँ) एक खास वृत्तोत्थ बगीचा। (४) मढ़ि—मठ। देउर—(सं देवकुल>प्रा देउल>देउर) देवका मन्दिर। नारा—नाला। पोखर—पुष्कर, तालाब। (५) बारी—बगीचा। नरियर—नारियल। गोवा—सुपारी। फुलवाई— फुल्ल्वाटारी। (७) ओठन—टांक। साँड़—लम्बी सीधी तलवार जिसे सैनिक हाथमें लेकर चलते हैं। १०३ (रीडेण्ड्स ६१) हैवत उसतावन वर शहर व गिरिफ़्तबने महर रसूलान रा बर सर महर ( नगरमें आतंक—राय रूपचन्दके पास दूतका जाना) बाँधे पर्बर भई अहताग । बापहि पूत न कोउ सँभारा ॥१ महर लोग सब झार हँकारे। भासे चेव शनैं बिसारे ॥२ गाय भैंस दौघे रिरियाई । राँधा मात न कोऊ खाई ॥३ रोयहिं हीं करव [अन] काहा। फबहुँ काँप सरापत आहा ॥४ छेंक गाठें अँबरॉउँ कटाहिं । पठिये पसीठ उत्तर क्य पावाहिं ॥५

पठये बसीठ तुरी दै, राजा कह धुन काह ।६ किहँ औगुन हम छेंके, कौन रजायसु आह ॥७ टिप्पणी—(१) पैंवर—प्रवेश द्वार। तहवारा—ठहरका। (२) झार—एक-एक करक। (३) मैइस—भैंस। रिरियानी—निस्सहाय की भाँति घिसियाना। राँधा— पकाया हुआ। भात—जावक। (४) करब—करूँगा। काहा—क्या। सरापत—कोसते हैं। (५) पठिये—भेजिये। बसीठ—(सं०-अवसृष्ट > प्रा अवसिट्ठ > वसिठ्ठ

बसीठ > बसीट), ऐसा दूत जिसे सन्देशका पूरा उत्तरदायित्व सौंप दिया जाय। (६) पठये—भेजे। तुरी—घोड़ा। धुन—विचार। काह—क्या। (७) औगुन—अवगुण अपराध। रजायसु—राज्यादेश। आह—है। १०४ (रीफेन्स २१) रफ़्तने रसूलान पेशे राज रूपचन्द ब बाज नमूदने सुखनी राव गहर (दूतोंका महरका सन्देश राव रूपचन्द्रको देना) बसिठ आइ कटक नियरावा। राँइ फर बाँठा आगँ आवा ॥१ रा[इँ] कै बायन बसिठ लइ लाये। तुरी भेंट आगें लै आये ॥२ पुनि बसिठहि सर गुइँ लै आधा। कौन रीस राजा छल आधा ॥३ जो मन होइ सो उत्तर दीजा। जो तुम्ह चाहिथ अभीं लीजा ॥४ दरब कहुउ सौ मीस मराबहुँ। घोड़ कहो अभीं लँ आनहुँ ॥५ राजा देहु रजायसु, माथे पर घड लेहुँ ।६ ईह महँ जो तुम चाहउ, आज फाल के देहुँ ॥७ टिप्पणी—(१) कटक—सेना। (२) बायन—उपहार। (३) रीस—क्रोध कोप। (४) दरब—द्रव्य धन।

११८ १०५ (रीडॅण्ड्स ६३) जबान बाबल राज भर रसुकान (दूतोँ को राव का उत्तर) सुन परधान बोल तूँ मोरा । कइस तू छाड़ साउँ गड़ तोरा ॥१ दण्ड तोर हौं लेहीं नाहीं । घोड़ लाख दोइ मोहि तलआहीं ॥२ आइ कहु तुम अरथ दिसाऊँ । तीरथ गोभर आज बसाऊँ ॥३ हम तुम सरम करहिं अगराजू । चाँद बिवाह देहु महिं आजू ॥४ जो सुख देहु तो पाट पठाऊँ । बरफे लेउँ तिहि बानि मराऊँ ॥५ जो तुम आवहु डर राख, चाँद पियाही देहु ।६ जो रुचि आवे माँग, सो तुम अबहीं लेहु ॥७ १०६ (रीडॅण्ड्स ६४) जबान बाबन रसुकान भर राउ रूपचन्द रा (राव रूपचन्दके दूताका कथन) हूँ नरिन्द देस कर राजा । अस बोल तिहि कहत न छाजा ॥१ जिन धी होइ सो नाँठ न लिये । बरबतरह अस गारि न दिये ॥२ सो घर पुतर्हिस माइ भुलावा । सो राजा गारी कस पावा ॥३ जा रे महर गारी सुन पावइ । आग छोड़ पानी कइँ धावइ ॥४ चाँद और कइँ (दीन) बियाही । कौन उत्तर अब दीजै साही ॥५ बरु हम मार पियारह, फुनि उठ बारहु गाँउँ ।६ बाँदहि ढवां मिलि भागी, अह्म पार कइ नाउँ ॥७ मूलपाठ—५-४०।

१११ १०७ (रौन्दुम १५) दर गुस्सा शुदन राव रूपचन्द बर रसूलान व खामोश मानदन इशा ( राव रूपचन्दका दूतोंपर क्रोध ) अमहिं डीठ विह मार पियारू । खिन एक भीतर गोवर जारूँ ॥१ मूँद फाट के गयँड फिराऊँ । गाल फाड़ कें रूँरा टँगाऊँ ॥२ चीन्ह सून माँसु लै जोँहूँ । पुदुरहिं सून रक्त सब गोँहूँ ॥३ तिह फा यूक्त फरत ढिठाइ । जस माँ कहउँ तइस कहु जाइ ॥४ नाह वेग घाँदा लै आवहु । मुख दुपार टूट लै पावहु ॥५ करवों तम जम चोलेउँ, नाँउँ पसिठ कर आहु ।६ पग फाँद लै आवहु, तूँ इहवाँ दूत नाहु ॥७ टिप्पणी—(२) गवैँडू—गाँव । काइ—निघारु कर । (३) चीन्ह—पी पहि । मूँदुर—गुस्ता । (५) मुख दुपार—मुख्य द्वार । (६) करवों—करूँगा । (७) इहवाँ—यहाँ । १०८ ( रौन्दुम ७४ ) रज हम पैदन शुमुरान कराय बाज गुफ्तन गुर भज गव ( दूतोंको जानेका आदेश ) गजा (बोलिक) दीन्हि रजायसु । सुनहुँ (शमिट कीन्हि) पदायसु॥१ जग मूँ राजा कीन बुराइ । घाँद सबद सुनि गोबर धाइ ॥२ गावर समूँद अन अरगाहा । पूड़हि गइ न पायइ थाहा ॥३ गजा (जा) मरग पड़ पावहु । माँ न पूर घाँदा कँ पारहु ॥४ गजा नगत जा मरग भू आई । घाँद निहारे मूखें निमि पाहूँ ॥५ गगन पह् जा दग, जान इदरों आद ।६ पाट न पैर गजा, यह मणियाहु शाद ॥७ मूलपाठ—१—...

१४ १०९ (रीडिङ्ग्स ७५; काची) नाठम्मोद शुख्ने राब अज शुखने रसूलान व बाज गदानीदने ईशान रा (दूतोंकी बात सुनकर रावका बिराध होना और उन्हें लौटाना) बात सजोग बसिठ जो कहा । नाइ मूँड सुन राजा रहा ॥१ बसिठ बचन बिस भरे सुनाये¹ । रावै ठग गै ठाहू खाये² ॥२ गा असरो मनहुत जो सँजोवा । भा निरास चित भीतर रोवा ॥३ सरग चाँद मैं³ पाई नाहीं । बसिठों⁴ उत्तर देउँ उठ बाहीं ॥४ आज साँझ जो चाँद न पाऊँ । पहर रात तुम्ह सरग पठाऊँ ॥५ जीउ दान जो चाहु, पठउँ⁵ चाँद दिवाइ ।६ नतउ धर उवत गढ़ तोरों, कहु⁶ महर सों⁷ जाइ ॥७ पाठान्तर—काची प्रति : शीर्षक—जवाब दादने राव रूपचन्द रसूलान रा (दूतोंको राव रूपचन्द का उत्तर) १—सुनावा २—रावै गै ठग ठाहू खाया ३—महुं; ४—बसिठसों; ५—पठवहु; ६—कहहु ७—सो । टिप्पणी—(१) नाइ—झुका कर । मूँड—शिर । (३) गा—गया । असरा—आसरा आशा । (७) नतउ—नही तो । ११० (रीडिङ्ग्स ७६) बाज़ आमदने रसूलान बर महर व हाय नमूदने कर्ने राव रूपचन्द (दूतोंका वापस आकर राव रूपचन्दकी माँग कहना) बसिठ बहुरि गावर महँ आये । महर देखि जिन आगैं धाये ॥१ पूछा महर कुमर सों आयहु । का कहु कम उत्तर पायहु ॥२ अस पूछ वस बसिटीं कहा । सुनै नहिं राजा कोह कै रहा ॥३ हस्ति पाइ धन दरब न मानै । चाँद माँगि बिन घर न जानै ॥४ जो जिउ चाँदा पीछहि दीन्हाँ । सो तू राउ चाहु जिउ छीन्हा ॥५

१४१ कै मन्त जस तुम्ह उपजे, राजा कीजइ सोइ । ६ उबत बर गइ तोरै, पुनि तजियावा होइ ॥ ७ १११ ( रीकेण्ड्स ६९ ) मुखबिरत करदे महर बालश्कर्याने मुकरिबे खुद (महरका अपने सेनानायकोंसे परामर्श) महरै मुख कँवरहिं फर चाहा । सेतस ढुरे इहँ बोले काहा ॥ १ बहुतहि कहा चाँद जो दीजै । एक मुख होइ राज पुनि कीजै ॥ २ और कहा बर निकर पराइ । दिवस चार पाहर कै आइ ॥ ३ कँवरू सँवरू दीने गारी । जे न जरमहिं सो माइ भथारी ॥ ४ मूँसहि पैठे पाटन गाँऊँ । अब बिठ देहुँ चाँद के ठाऊँ ॥ ५ जोलहि साँस पेट महँ, तौलहि करिहौं मारि । ६ पुनि सूरूज पह मरिहहिं, अइस होइ ठवियारि ॥ ७ ११२ ( रीकेण्ड्स ७० ) सिफत अस्पान राव महर (राव महरके अश्वोंका वर्णन) महरै काढ़ि तुखार फुलाने । इन्द दस घरे पौर मँह आने ॥ १ हंस हँसोली मँघर सुहाये । दिना यक सिंगारे बहु आये ॥ २ उदिर सँमुद सुइँ पाठन धरहिं । माघ गरभ ते नाचत रहैं ॥ ३ यह तुरंग तीन पा ठाढ़े । नीर दरियाइ पखरिन्द गाढ़े ॥ ४ पौर गरया अठरो अहा । इन्ह अस रूप जो जुत ते रहा ॥ ५ पाँन पाइ परत सम देंहीं, देखत रास उड़ाइ । ६ बहुरु धाव धरि धावहिं, धापै थिर न रहाहिं ॥ ७ टिप्पणी-(१) तुखार-घोड़ा । मूलतः यह मध्य एशिया संस्थित तुर्कोंक एक कबील

१४२ और उत्तर मूल निवास स्थान का नाम था। वहाँसे आने वाले घोड़ों को तुगार कहते थे। पीछे यह अश्वरका पर्याय बन गया। (२) हंस—यह नाम हमें अश्वों की सूची में अन्यत्र कहीं देखने को नहीं मिला। हो सकता है हंस के समान सफेद घोड़े को कहते रहे हों। हंसोली—सम्भवतः इसे ही जायसी ने हाँसुल कहा है (पदुमावत ४७।२)। ऐसा घोड़ा जिसका शरीर महुये के रंग का और चारों पैर कुछ कालापन लिये हों; कुम्मैत हिनाई। भैंवर—भौंरे के रंगका घोड़ा; मुश्की। हिना—सम्भवतः मेहदीके रंगका अश्व। हिंगारे—इसे ही सम्भवतः जायसीने राय कहा है (पदुमावत, ४ ६।१)। फरहंग इसहानाव (पृ १८) के अनुसार कबूतरी रखा के समान सफेद रंगके घोड़ेको हिंगा कहते थे। नकुल कृत शालिहोत्र (पृ १७) में हिंगाका वर्णन इस प्रकार है : बिन सेनी तन पांडुरो होइ एक सम अंग । जूल्हे रंग न देखिये तासु कहिने हिंग ॥ (३) उंदिर—(सं —उन्दौर) बंगाली चूहे और नेवलेके रंगसे मिलता हुआ घोड़ा। सम्भवतः इसे ही संजाब या सिजाब भी कहते थे। संधूर—सम्भव बादामी रंगका घोड़ा। (४) नीर—नील नीले रंगका घोड़ा। हरिवाह—सम्भवतः अन्यत्र उल्लिखित हरितोंत (४।२) और हरिवाह एक ही प्रकारके घोड़ेके लिए प्रयुक्त हुआ है। हरे रंगका घोड़ा, सब्जा। इस रंगका घोड़ा अत्यन्त दुर्लभ है। ( ) बोर—रहाटनगासके फारसी कोष (पृ २ ६) के अनुसार लहरके रंगका घोड़ा। फरहंगनामा हाशिमीका कहना है कि हिम्बक लोग बोरको घोज़ बच कहते थे (पृ १७)। गर्रया—(गर्र गर्रा) श्वेत और लाल रंगकी खिचड़ी बालोंवाला घोड़ा। (६) पौव—पवन। बा—बापु। रास—बागडोर। (७) बारू—सोलहे कोस किन्तु मीलसे बड़ा दूरी नापनेकी इकाई। धावै—धाव्यानयेवै। ११३ ( रौलैन्छंद ) सिवते रुपादाने जयौ ( अस्वारोहियोंका वर्णन ) कसि कसि पड़े सम असवारा। जियत न देखेउँ जिंहि कर मारा॥१

१४१ बिमहिं बुझाये सांने घर । धलग माँ सो तरुफम भर ॥२ गग्गहिं मर्म पीजु कें कया । रकन पियामी फरहिं [नँ] मया ॥३ धीर अम नर परुगहिं घद् । ताल सरवा लोई जड़े ॥४ सातव भुंजवर आगे कमे । झरफे टाकै मोर्न रमे ॥५ जिहर्क डाक परहिं नर, आँ गज कीन्ह तराम । ६ मरन सनह हिये डर, इनके रह न पास ॥७ टिप्पणी-(८) बेख्या-(पारसी शब्द) लोहे अथवा बज्रके आकारकी बनी का तीर। इस पाठ बेबक-दा ताकौ बान तीर बुरकी तीर। सम्भवतः यह शब्द फारनके लिए प्रयोग होता था। (३) कया-शरीर। (६) जिहके-जिस भार। डाक परहि-पुल पड़ते हैं। ११४ (संङ्ग्रह ८२) चित्ररेखाजन्म खण्ड (पद्मावत-वर्णन) जिहि पुरि पग गय धनुसग । तिहि पथ परान मुईं अभाग ॥१ माज वेश आलिम क गद् । दन न फाड़ा पाइहिं गद् ॥२ अशो नर निंट गँकते मूँसहि । पनिज घर गतुगहिं पूसहि ॥३ बानमार क ओंग उपाय । पाँगि गल्त काउ रवि राय ॥४ दइ पोंगर घर मूँट भँपारहूँ । पागन पान माँह भेंट पारहिं ॥५ छत्र लगारी खद् दुग दीव हंकार । ६ परि-परि फींग बाँध लिटें पद करौं उबार ॥७ टिप्पणी-(१) जयो- १ व ।

१४४ छूटहिं। बाजहि जहाँ पाँक लगि फूटहिं ॥ (पद्मावत ५२४।१) में पाँककी व्युत्पत्ति पुन्तसे मान कर वासुदेवशरण अग्रवालने अथ में इसे पंख किया है। वृहद हिन्दी कोषमें इसे तीरके पीछेकी ओर का सिरा बताया गया है। ये दोनों अर्थ भी संगत नहीं हैं। अंजुमन- इस्लाम उर्दू रिसर्च इन्स्टीट्यूट (बम्बई) में एक समकालीन हिन्दी- अरबी-फारसी कोष की हस्तलिखित प्रति है। उसमें इस शब्दका अर्थ मुकीश बताया गया है। यही अर्थ ठीक भी है।

११५ (रीडींग्स ४३) सिफते रथे अनी गोबद (रथ-वर्णन) साजे रथ बितानहि कद्दे । सौ-सौ धानुक एक-एक चढ़े ॥१ हुके आय इनैं तहँ धनैं । तीन चार सै बभै गुनें ॥२ जोयन बीस गरथइ चलावहिं । खिन एक माँझ बहुरि तिहँ आवहिं ॥३ ठौर ठौर ले रन महँ घरे । जनु बोहित सागर महँ तिरे ॥४ रथ क अरथ ग्रह किन्हें कीन्हा । कर हर मुख जे सँहा दीन्हा ॥५ देख झझार राइ कै, गरबर रहे तँधाइ ।६ बहुत चले राइ औ राउत, पीइ छोक मो भाइ ॥७ टिप्पणी—(३) जोयन—योजन । (४) बोहित—जहाज । सावर—सागर ।

११६ (रीडींग्स ४४) सिफते पैकान महर (हथि वर्णन) गज गवनें डर साँसों मयउ । बासुकि (नाग) पतारहिं गयउ ॥१ झिंकत इंदरासन डर होई । कापहिं पाठ न अँगबइ कोई ॥२ घड़े महावत कसैं उपनारे । दाँत पतर मह छैंड़ सिंगारे ॥३

१४५ घोटहिं महावत आँकुस गहैं। पन कुंजरैं डर राख न रहैं ॥४ सावन मेघ ओनइ जनु रहे। पखरे कीनर परिखहिं पड़े ॥५ बीजु माँव घन परे, परे छाएँ रन आइ ।६ उठे खेह दर पौदर, सूरज गयउ सुझाइ ॥७ मूलपाठ—१—नाच । टिप्पणी—(१) औनइ—घिर । ११७ ( बम्बई ३६; रीफेण्ड्स * ) रूजे दुवम राय रूपचन्द कसदे हिसार करदन व बीरून आमदने महरा बग कदन उफ्तादन ( दूसरे दिन राव रूपचन्दका कुरांकी ओर आना और महरका युद्ध के लिए बाहर निकलना ) राउं रूपचन्द गढ़ होइ पावा¹ । राहैं महर दर आपुन सावा ॥१ फिर संजो भाँठहिं² हथबासा । फेंवरू धँवरू³ पाउ हुलासा ॥२ पाँठ कहा अर सोंको आही । मिया मरसि उठु घर बाही ॥३ फेंवरू तदपि सांड कें⁵ फाढ़ी । झेसस करी सम⁶ देखें ठाढ़ी ॥४ पाँठ वाफ खड़[ग*] गहि मारा। फिरें मामद⁷ धढ़ गयउ उपारा॥५ दीठि भुलान खड़ग वो चमका, हाथ फिरें हथ जोत ⁹ ।६ लाग गाँठ पाँटा कर, कँवरू गा भुइ लोट¹¹ ॥७ पाठान्तर—रीगेण्ट्स प्रति— शीर्षक—नमूदार शुदने हरदू फौज्हा ब हम कदंने कँवरू बा बाँटा व कुश्ता शुदने ऊ (दोनों सेनाओ का सामने सामने आना और कँवरू-बाँठा का युद्ध; कँवरूका मारा जाना) । १—रहा । २—यह शब्द छूटा है। ३—गाउ। ४—मंजोर। ५— ढाँड । ६—भागी। ७—ती। ८—मद । —को । ९—मग। ११—फिरे हाथ हथ जूट । १२—सुन । १

१४६ ११८ ( रीडीण्ड्स ७१ ) आगे कथने भैंबरू का चाँद व गुफ्तः शुदने भैंबरू ( भैंबरू-चाँद युद्ध ) भैंवरू देखा कँवरू परा। रोहतास जैसे परबरा ॥१ हाथ साँग मारसि तस आई। फिरें लाग धड़ गयठ जुझाई ॥२ फुनि झाड़सि बिजुरी तरबारा। ढाफ दइ कें हनसि कपारा ॥३ टूटि खाँड तातर सभ धावा। पीठि कहा हौं इहँ पै पावा ॥४ फुनि लेँहति काड़सि सरबानी। तँहुत माँठा चला परानी ॥५ खेदत उड़झा भैंबरू, परा दाव सँहराइ ।६ पलटि भाँठ जो देखा, तो बहुरि मारसि आइ॥७ , टिप्पणी—(१) साँग—एक प्रकारका भाला जो बहेंस्ते डोय अर्थात् ७-८ फुट लम्बा होता है और उसका सिरा ढाई फुट लम्बा और पतला होता है। उसका दण्ड भी बांसेका होता है। (अर्विन आमीं आफ द इण्डियन मुगल्स) (२) खेदत—पीछा करते हुए। उड़झा—ठोकर खाकर गिरा। ११९ ( रीडीण्ड्स ८ ) धादिदाना रखन दर लश्करे राव रूपचन्द अज हिरसते फौम ( राव रूपचन्दकी सेनामें विजयोल्लास ) साखी तार दीठ बन मार। और हँवर महरें के द्वार ॥१ दीठ आनें बांधि खपाई। पाँयक मठ फरहिं नवाई ॥२ रकत लहू है सरपर भग। एकौ कुँवर न आगे सरा ॥३ जिन्द देखा तिन्द गयठ परानों। डर सहँ फोट न करें पधानों ॥४ वे महर जेठनाग जिवाये। सगरैं पीर न काऊँ आये ॥५ मार कहा महर सों, शापैं ना यह बीर ।६ बग हँकार पठावहु, लोरक बावनबीर ॥७

१४० १२० ( रोकीण्ड्स ८१ ) आमदन भाट बर लोरक अज फिरस्तादन महर (महरके भेजे भाटका लोरकके पास आना) भाट गुसाँई तुम्ह गइ धावसि । आगैं दइ लोरक लै आवसि ॥१ चढ़ तुरग भाट दौरावा । लोरक साझ जो आभर पावा ॥२ कहवाँ भाट घोड़ दौरायहू । काकर पठये कसा तुम्ह आयहु ॥३ लोर महर तुम्ह बेग हँकारी । कँधरू धँधरू चाँठे मारी ॥४ जारब गोवर लाग गोहारी । लइ अध चाँठ होइ अँधियारी ॥५ उठा लोर सुन माँग हमारी, महर भया अवसान ।६ आज चाँठ रन मारौं, देउउँ राइ परान ॥७ टिप्पणी—(५) जारब—जला दूँगा । (६) अवसान—हताश परेशान । १२१ ( रोकीण्ड्स ९० ; बम्बई १३ ) गुने राजा रफ्तने लोरक व मुस्तइद शुदन बर जंग ( लोरकका युद्धके लिए सुसज्जित होना ) घर गा लोरक ढाँकि सँभारी । ओडन खाँड लीन्ह तसवारी ॥१ बाँध रक्तावल खसि' सर पागा' । पहिरसि तारमार कर अँगा ॥२ घनमहरी कर खींच पछावा । पीत' काट मनाइ मढ़ावा ॥३ सावर जिह्वन लीन्ह टपाइ । लोरक मुँह दीन्हि औंधाइ ॥४ सारग एक जुगत कर घड़ा । जनु अर्जुन कहूँ रावन कड़ा ॥५ फिर मँजाइ कतार' लीन्ह, बाँध चला तरवारि ।६ रक्त पियास खाँड लोर कर, दाँग जीभ पसारि ॥७ पाठान्तर—बम्बई प्रति— शीर्षक—आमदने लोरक दर खाना व साख्ताशुदन बराय जंग व दर तन आमदा व बस्तने अस्लहा (घर आकर युद्धकी तैयारी करना और सशास्त सुसज्जित होना)

१४८ १-कसि । १-ख०-पौगा (पे के नीचे गुच्छे का अभाव है जिससे खेंया पढ़ा जाता है) । ३-पीहर । ४-कौरव कहें । ५-सँजोरि कराई । ६-बींग ।

१२२ ( रौदीन्हस ६८ ) आमदने मैना पेशि लोरक व गिरिया कर्दैन घ ( लोरकके सामने जाकर मैनाका विलाप ) आगे आइ ठाढ़ि धनि मैनाँ । नीर समुँद जस उलटै नैनाँ ॥१ चुइ-चुइ बूँद परहिं घनहारा । खनु टूटहिं गज मोतिहूँ हारा ॥२ जो तुम्ह है जूझे कै साधा । महिं सू मारि करहु दुइ आधा ॥३ तौ पीछे उठ सूझे आयहू । मोर असीस जीत घर जायहू ॥४ बाफर नारि सो झूझि न बाई । बाबन सिखण्डि रहा लुकाई ॥५ देहु असीस रोषन, मारि भाँठ घर आवहूँ । ६ सोने बेड़ि गड़ाइ, मोतिहूँ माँग भरावहूँ ॥७ टिप्पणी-(१) धनि-स्त्री पत्नी । मैना-लोरक्की पत्नी । (२) घनहारा-ठान । (५) सिखण्डि-शिखण्डी, महाभारत का एक पात्र जो नपुंसक था । (६) रोचन-टीका । (७) बेड़ि-पैर का एक आभूषण ।

१२३ ( अप्राप्य )

१२४ ( रौदीन्हस ८५ ; बम्बई ७ ) रफतन लोरक दर खानये अजबी व खदाना-ये मर्थ कर्दैन ङ ( लोरकका अजबीके घर जाना ) जैस अमीम दत गम पायहु । लारक राठ' जीति घर आयहु ॥१ लारक गा अजबी के धारा । भीतर हुवै सो आइ हँकारा ॥२

१४९

पहिलहिं अजयी दोख अनावाँ । मिस कै बरफा दाँत कँपावा ॥३ घात काट कहसि केर ओ फेरी । घिरै लै गोड़ी तर घेरी ॥४ अग मूँह अस करे पुकारा । कौन मीचु दीन्हें कन्तारा ॥५ लाज लाग महरैं मुँह, अमहीं राउ कह आठ ।६ खाँड मीचु बनायउँ, दइ भल पछतात ॥७

पाठान्तर—बम्बई प्रति— शीर्षक—राजी शुदने लेकिन व इजाजत दादने मैना, विरभ कर्दने लोरक बतानये राब रफतन (मोकिन का राजी होना मैना का अनुमति देना और लोरक का राव के यहाँ जाना) १—रइ । २—अजयी । ३—अपावा । ४—अमवइ । टिप्पणी—(२) अजयी—लोक-कथाओं के अनुसार अजयी लोरक का गुरु था । यहाँ उसके सम्बन्ध में स्पष्ट कुछ नहीं कहा गया है, परन्तु प्रसंग से लोक-कथाओं की बात ठीक जान पड़ती है ।

१२५ ( रीसण्ड्स ८९; बम्बई ८ ) नमून्दने लोरक रा अजयी तरीकए जंग (अजयी का युद्ध कौशल बताना)

अजयी कर बरकै असलाओँ । यहँ बहुत तुम्ह हुत' सिधि पाऔँ ॥१ में लोरक सहियों सिधि दीन्हेँ । हाथ भिरेँ तुम्ह नहियाँ लीन्हेँ ॥२ अब पुषि देतौं सुनहु दूँ मोरी । ओडन देह न देखें चोरी ॥३ फिरें रोग सुरैं पाठ उठावहु । भाँइ तुकाइ खड्ग चमकयहु ॥४ पात गहत जिन भूलै दीठी । पाउ न देसँ अखरहिं पीठी ॥५ खाल उघारैं खदहुँ, सीस भरे जिउ जाइ ।६ खड़ग भरहरे मारहु, अइसें पन्ह अरराइ ॥७

पाठान्तर—बम्बई प्रति । शीर्षक—विदआ करने लोरक बर अजयी रा ब हुनरहाय जंग आमोखने अजयी बर लोरक रा (लोरक का अजयी से विदा माँगना और अजयी का उसका युद्ध कौशल बताना)

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१—पकरहिं मलगकतैं । २—छेदैं । ३—पावठैं । ४—रते । ५—बैठे । ६—सुनहु तुम । ७—पाट परै । ८—डगायहु । —धस्कावहु । ९ —उभारत रोवहि । ११—बइ मयाहर । टिप्पणी—(२) तदिया—उस दिन । जदिया—जिस दिन । (३) ओडम—डाल । (६) संदेशु—संदेशो । (७) अराव—पेड़के गिरनेकी क्रिया । १२६ ( रफ्तींग्स ०१ ) रफ़्तने लौरक बर महर ब बग दहानीदने महर लोरक रा ( लोरकका महरके पास आना । महरका लोरकको पान देना ) पहिले जाइ महर (अरगायहु)¹ । तौ पाछै तुम्ह इसँ जाबहु ॥१ लोरक जाइ महर अरगावा । पेग बीस चल आगैं आवा ॥२ अवनिहि लोरहिं भये परजाई । सगरैं होइ मैं देखेतैं आई ॥३ लोरक सूर बिहसि तूँ मारा । मार पीठ मुख देखउँ तोरा ॥४ हौं तुम्ह यें धीर जो पाऊँ । आधे गोवर राज फराऊँ ॥५ तीन पान कर बीरा, महरैं लोरहि दीन्हि हँकार ।६ घोर देउँ सो आउर पाखर, जो आयहु रन मार ॥७ मूलपाठ—१—अरगावा । टिप्पणी—(१) तौ—उसके । (३) तइस—उसके अनुसार । १२७ ( रफ्तींग्स ०२ ) रवाँ कर्दने लोरक बा याराने खुद दर मिदानजंग ( लोरकका अपने साथियोके साथ युद्धके मैदानमे जाना ) चला खाग ले आपुन साथी । अइबाँ पखरे मँमंत हाथी ॥१ लोहू नदी जनु दह पुचकाइ । तारूँ तरणों सै जनबाइ ॥२

सिरफ लोह जनु अदनल भानूँ । डरहँ दूसर स्रसि न आनूँ ॥३ देखि पीठ राजा पहँ भाषा । चाँद कहा सूरज चलि आवा ॥४ उठै झार डर रहँ न जाइ । हाथि घोर सब चला पराइ ॥५ भूनहु पीठ सैं जीतब, आइ लोर छँदलाइ ।६ सर तीर सैं मारष, तिहँ मँह एक न जाइ ॥७ टिप्पणी-(१) एकर-शाहेक सूफ़स सुसज्जित । १२८ ( रीसन्दूम ७३ ) सिरते मुम्नीदिये फौज लोरक ( लोरककी सेनाकी तत्परता ) निसरत लोर सैन नीसरी । एक एक जन परफहिं अगरी ॥१ तउफहिं खड़ग दाँत सैं धरि । बाँधे पाट बिच गधिर घरे ॥२ झलकहिं ओहन तानें तरे । घाँघे पबर्र लोहें जरे ॥३ पटोर तारसार कें पहने । भये अतें पजर कें घने ॥४ सींह सिंदूर दरेरैं घरे । माजहिं देऊ घोर पाखरे ॥५ नियरैं नियरा पायक, चढ़ा सहस धर राठ ।६ अचल चलायें न चलैं, रहे रोप धर पाउ ॥७ टिप्पणी-(५) सींह-सिंदूर-इसका उल्लेख दो अन्य स्थानों पर भी हुआ है (१ १५३ २ ५/६) । रूपम तीन य, मून हे और तीन गून दाल बाच र बहुत स्पष्ट रूपम लिखे गये हैं। पहले शब्दक सींद पाठम कोई सन्देह नहीं हो सकता । दूसर शब्दका सन्दूर, संदूर, सिन्दूर सिंदूर कुछ भी पढ़ा जा सकता है । पदमावतमें भी यह शब्द युग्म दो बार आया है (१४४/६; १३६। ) । बहां माताप्रसाद गुप्तका पाठ है-सिंध संदूरा सिर सेंदूरहि । मधुमालतीमें उन्होंने सींह संदूर ( १ १०; १८१।२ ) पाठ दिया है। बासुदेवशरण अग्रवालने इनका तात्पर्य सिंह आर शार्दूल बतलाया है। और यही अथ माताप्रसादगुप्तने मधुमालतीमें स्वीकार किया है। सन्दूर अथवा संदूर हमारी दृष्टिमे मुक़्लोक अनामध्य अरघट है। बास्तविक पाठ सिन्दूर सिन्दूर अथवा सेंदूर है। और यह अनने रूपम्पमें

१५२ सिन्दुर है, जिसका अर्थ होता है हाथी। मध्यकालीन कलामें सिंह हस्ति एक अति प्रचलित 'मोटिफ' रहा है। (७) रोप—(धा०-रोपना) गाड़ना, दृढ करना। (४) सारमार—लोहेके तार का बना हुआ (सार—लोहा (सुने नागकी साँस चा सार भसम होइ जाय)। १२९ ( रौ०सूहस ८८ ) दैवत तुरने रूपवन्त व फिरिआदन भट ( रुक्मङ्गद भयभीत होअर दूत भेजना ) चहुँ दिसि दंस राठ डरि आधा। रहा अचल होइ चल न चलावा॥१ बीर चिलापहिं जाइ कहाँ। कौन उत्तर अस दीजै वहाँ ॥२ ओछे दर हम पावैं आय। अनैं पौर अब लाइ न जाय ॥३ देख मंदिर महँ ठागी लाजा। पौर राज ओ जिहैं सइँ माजा ॥४ काहू सा मन्त कर बिचारे। जे रहे मौन सो आगैं झारे ॥५ राइ भाट कह पठयं, महर गइ अब गाठ ।६ एक एक सइँ इसै, दूसर नर नहिं जाउ ॥७ १३० ( रौ०सूहस ८९ ) बाव गछन भट व मग रूंदने सींह व जुझना सुदन क ( दूतका लौटना युद्धमें सींहका मारा जाना ) बहुरे भाट दिवाई पानौं। महर बोल राजा कर मानौं ॥१ बाँठ असार फुरै लै आवा। पाछै सरे नहिं जिह कर पावा ॥२ सींह सिंगार धीर दुइ आये। राइ मथा कर पान दिखाये ॥३ जोउन सींह अकेले उतरा। हाथ खड़ग खसि धरती परा ॥४ अइ दूत अनै कुसगुन अस भयऊ। सींह सिंगार छोट रन गभऊ॥५

१५१ साँइ लाग रन रीसे, झाँप उठी नपार ।६ नहाँ भयउ जर फैंवरू, फाटसि खेद सिमार ॥७ टिप्पणी—(१) फुरै—तत्काल । १३१ ( रौलेन्दूस ९ ) जंग करने सिंगार का बाँगा व पुनः कूदने सिंगार ( सिंगार-बाँगा युद्ध : सिंगारकी मृत्यु ) देख सिंगार कोह चर चढ़ा । बाँध फरहरा आगे सरा ॥१ दाँव गहसि सर खाँड़इ घाऊ । तातर टूट काढ़ि गा पाऊ ॥२ दूसर खाँड लिहसि तरवारी । भिरे माट घर गीउ उपारी ॥३ दाब सिंगार चीर तम मारा । पिछला खाँड टूट गइ धारा ॥४ पुनि जमधर साँचे कर गहे । बजर चोट सर घेरेँ सहे ॥५ बिनु हथियार भया राउत, परिगा थाक सिंगार ।६ एक चोट दाइ फीतस, धर सों फाट कपार ॥७ टिप्पणी—फारसी शीर्षक असंगत जान पड़ता है। इस कड़बकमें बाँगाका कोई उल्लेख नहीं है। इसमें केवल सिंगार के युद्धकी बात जान पड़ती है। (१) फरहरा—फहराता झंडा । (३) गीउ—गरदन । (५) जमधर—छुरी नोकवाली कटार । १३२ ( रौलेन्दूस ११ ) भागने ब्रजराम व धरमूँ भज हरने राव रूपचन्द व पुनः कूदने ब्रजराम ( राव रूपचन्दकी ओरसे ब्रजराम और धरमूँका भागना और ब्रजरामका मारा जाना ) ब्रजदास धरमू दुइ आप । राइ भया कर पान दिवाय ॥१ आज मुदिन जाइहूँ पन्तार । गाँउ टाँउ कापर मैं सार ॥२

ओडन धँवर लाग घूँघरा। धरमदास सो आगें धरा ॥३ छाँड़ फिरे धानुष फर गहा। पानि धूलि धरि धीर रहा ॥४ धरमदास तुम नेर न आवहु। फौन ठाम फिइँ जीठ गँवावहु ॥५ धरमदास मन कोपा, काट मूँड लूँ आउँ ।६ भुझवा थान निफर गा, धरमदास परा ठाँउ ॥७

१३३ ( रीकेण्डस ९१ ) जंग करदन धरमूँ ब कुश्तह शुदन धरमूँ ( धरमूँका युद्ध करना और मारा जाना ) पुनि धरमूँ गुन मेलस सानी । पाँच टूट औ पंच गँवानी ॥१ धता बजाइ मेरि ओँ (तूरा) । साँरुहि धरमूँ चाँपइ पाछा ॥२ धरमूँ कोप पीठ तइ भिरे । चीरै गर धरमूँ कँ घरे ॥३ गये परान धरमूँ धर मारसि । काइ फनार दिये महँ सारसि ॥४ देइ पाठ तोरसि भूदण्डा । काटसि चीर सीस नौखण्डा ॥५ रनमल पैठ खड़ग लै मारसि, फैंबरू कइ पूछ ।६ रहे न तेगा नर पै, जूझ राह मजबूत ॥७ मूलपाठ-ठप । टिप्पणी-(२) इसका पूर्वपद और अगले कड़बककी पंक्ति २ का पूर्व पद एक ही है।

१३४ ( रीकेण्डस ९३ ) जंगिकर्दे जंग रनपति गोबद ( रनपतिक युद्ध ) रनपत दीन्हि महर अगसारी । बाहु बियाहि अनँ हँबारी ॥१ धता बजाइ मरि ओँ (तूरा) । खड़ग मूँठ भरलिहासिसिझोग॥२ दौर खाँड रनमल सर दीन्हाँ । रक्त धार सब सेंदुर कीन्हाँ ॥३

१९५ रनमल मरत सिरीचंद आवा । रनपत पाखर खाल खिंचावा ॥४ अजैराज सेंगर कर गहे । मारसि मेलक पाखर रहे ॥५ छाइ सिरीचंद पाखर भागा, झिठ लै गयउ पराइ ।६ राइ देखि चौंठा, तुम कस झूज न जाइ ॥७ टिप्पणी—(२) 'जम्भ बजाइ पेरि उतरा' पाठ भी सम्भव है । १३५ (रैकिड्स ९४) आल्हने चौंठा का फौज जुड़ कर मैदान भगा ( युद्धक्षेत्रमें ससैन्य चौंठाका आगमन ) धीरपाल करपत लै आवैं । मजवीर हमीर सनेफन पुलावैं ॥१ करमदास मतिराज देवानन्द । बिजैसेन औ महरास बिर्जचन्द ॥२ पिस्तनगर ष देखें ताको । इग्दीन खीस मरदेठ जाको ॥३ देपगढ हरराम सरूपा । अजयसिंह हरपार निरूपा ॥४ धीरू हरशु गनपत आनौ । सिउराज मदनूँ भल जानौ ॥५ तीस पखरिया आनौ, सब दर मारौ आज ।६ हाथिपाइ धन चौंदा लीजइ, गोवर कीजइ राज ॥७ १३६ (रैकिड्स ९५) बिरथानने महर लरक का मुकाबिले भोंगा ( महरका चौंठाका सामना करनेके लिए कौरवका भजना ) आनं पीर चौंठा लइ आवा । महर टेरि औ लार पुलावा ॥१ रास्क बीर पगरिया पारहु । पठै डाकनइ सीम हैंकारहु ॥२ पाँच दंम पाँच पाँझानौं । गतरी पाँच दम जिटिं जानौं ॥३ नाऊ एक तीन भाइनैं । पागर एक सगद फँ गिन ॥४ गहरवार औ शाद दम आनी । पागर कृष्ठ तुलानेउ जानी ॥५