चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
पृष्ठ 180, कुल 520 में से
संदर्भ में पढ़ेंसिरफ लोह जनु अदनल भानूँ । डरहँ दूसर स्रसि न आनूँ ॥३ देखि पीठ राजा पहँ भाषा । चाँद कहा सूरज चलि आवा ॥४ उठै झार डर रहँ न जाइ । हाथि घोर सब चला पराइ ॥५ भूनहु पीठ सैं जीतब, आइ लोर छँदलाइ ।६ सर तीर सैं मारष, तिहँ मँह एक न जाइ ॥७ टिप्पणी-(१) एकर-शाहेक सूफ़स सुसज्जित । १२८ ( रीसन्दूम ७३ ) सिरते मुम्नीदिये फौज लोरक ( लोरककी सेनाकी तत्परता ) निसरत लोर सैन नीसरी । एक एक जन परफहिं अगरी ॥१ तउफहिं खड़ग दाँत सैं धरि । बाँधे पाट बिच गधिर घरे ॥२ झलकहिं ओहन तानें तरे । घाँघे पबर्र लोहें जरे ॥३ पटोर तारसार कें पहने । भये अतें पजर कें घने ॥४ सींह सिंदूर दरेरैं घरे । माजहिं देऊ घोर पाखरे ॥५ नियरैं नियरा पायक, चढ़ा सहस धर राठ ।६ अचल चलायें न चलैं, रहे रोप धर पाउ ॥७ टिप्पणी-(५) सींह-सिंदूर-इसका उल्लेख दो अन्य स्थानों पर भी हुआ है (१ १५३ २ ५/६) । रूपम तीन य, मून हे और तीन गून दाल बाच र बहुत स्पष्ट रूपम लिखे गये हैं। पहले शब्दक सींद पाठम कोई सन्देह नहीं हो सकता । दूसर शब्दका सन्दूर, संदूर, सिन्दूर सिंदूर कुछ भी पढ़ा जा सकता है । पदमावतमें भी यह शब्द युग्म दो बार आया है (१४४/६; १३६। ) । बहां माताप्रसाद गुप्तका पाठ है-सिंध संदूरा सिर सेंदूरहि । मधुमालतीमें उन्होंने सींह संदूर ( १ १०; १८१।२ ) पाठ दिया है। बासुदेवशरण अग्रवालने इनका तात्पर्य सिंह आर शार्दूल बतलाया है। और यही अथ माताप्रसादगुप्तने मधुमालतीमें स्वीकार किया है। सन्दूर अथवा संदूर हमारी दृष्टिमे मुक़्लोक अनामध्य अरघट है। बास्तविक पाठ सिन्दूर सिन्दूर अथवा सेंदूर है। और यह अनने रूपम्पमें