चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६२ नैन कषोरा दूधैं भरे। बनु छितिया तिहुँ भीतर पर ॥४ कनक बरन झरकत है देहा। मदन मूरत भन लाग न खेहा ॥५ तानी रात पिछौरी, हस्ति घड़ा दिखाठ ।६ कस सर पाग सलोने, विरिछ कटार सुहाठ ॥७ पाठान्तर—काणी प्रति— शीर्षक—नमूदने विरम्फ्त लोरक रा बर चाँदा (चाँदशे किरफ्ता लोरक की प्रशंसा करना)। १—उलट। २—लोपा कम ०ठह (?) अहराईं। रुक छीन हर (?) करी न जाईं ॥ ३—कपैं। ४—छबिया (?)। ५—बरे। ६—कर हर पाय। ८—भाऊत (?)। टिप्पणी—(६) रात पिछौरी—देखिये १४४।४। १४७ ( रीसिएंस १५ ) दीदने चाँदा कसाने रुआफ लोरक व बेहोश शुदने ऊ ( लोरकका सौन्दर्य देखकर चाँदाका मूर्च्छित हो जाना ) चाँदहि लोरक निरख [नि*] द्वारा। देखि विमोही गयी बेकरारा ॥१ नैन झरहिं मुख गा कुँपलाई। अन न रुच औ पानि न सुहाई ॥२ सुरुज सनेह चाँद कुँमलानी। दाइ बिरस्पत छिरकइ पानी ॥३ घर आँगन सुख सेज न भावइ । चाँदा माहे सुरुज बुलावइ ॥४ पूनितैं चँदर जैस मुख आहा। गइ सो जोत छीन होइ रहा ॥५ सहसकराँ सुरुज कै, रहे चाँद चित्त छाइ ।६ सोरहकराँ चाँद कै, भयी अमावस आइ ॥७ टिप्पणी—(६) सहसकराँ—हजार किरण अथवा हजार कलाएँ। (७) सोरहकराँ—सोलह कलाएँ। चन्द्रमागे सोलह कलाएँ मानी जाती हैं। पूर्णिमाके चन्द्रमें पन्द्रह कलाएँ होती हैं। अमावासमें पीछे हुए नक्षत्र किनारे अल्प चन्द्रमा सुशोभित रहता है उसकी सोरहवीं कला कही जाती है।