चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
पृष्ठ 204, कुल 520 में से
संदर्भ में पढ़ें१७७
गिन चौरासी सै हाँड़ी, धामनँ परसि सँमार ।६ परे बहुत खमहर्वा, होइ लाख जेउनार ॥७
पाठान्तर—रीट्स प्रति— शीर्षक—त आम खुरानीदने महर मर खल्क रा बज अक्सामे नेहमत हा (महरका लोगोंको नाना प्रकारके उत्तम भोजन खिलाना) १—बैठे पारी पसरि सबारा । २—होइ जेउनार । ३—कइ भाना । ४—कटीसो (!) । ५—भाव मसोया कटवाँ भरे । ६—हुत । ७—गिन चौयसी हाँड़ी नाँऊ । ८—परे गजबजा बहुतर । ९—लाग । टिप्पणी—(७) खमहवा—(सं गान्धाद्य>प्रा गंधअज>गमहव्वा>गमहवा) खाने योग्य उत्तम फल मेवा ।
१६३ ( रीट्स १२१ ) आमदने चाँदा बर कसर व दीदने लोरक व बेहोश शुदन लोरक ( चाँदाको छतपर चढ़ी देखकर लोरकका मूर्छित हो जाना )
पहिरि चाँद खिरोदक सारी । सोरह करों सिंगार सिंगारी ॥१ चढ़ धौराहर किहसि पिकासू । देखि लोर कहँ विसरि गरासू ॥२ लोर जानि अछरहि दिखरावा । इँह कबिलास अउर को आवा ॥३ अमरित जेवँत माहुर भयो । डीठ सो हर चाँदें लियो ॥४ मुखँ न जोवि कन्या अति रूखी । चाँद मनहु सुरज गा सोखी ॥५ खइम माँझ अमरित कै, झार उठी जेउनार ।६ लोर लीन्ह कें डाँडी, बिसँभर कछु न सँभार ॥७
टिप्पणी—(१) खिरोदक (सं क्षीरोदक)—सातवीं शताब्दीसे इस वस्त्रका उल्लेख भारतीय साहित्यमें मिलता है। इसका उल्लेख बाणने हर्षचरितमें किया है। परिशिष्ट पर्वण और मञ्चकथा में इसका जो उल्लेख है उससे यह प्रकट होता है कि यह अत्यन्त हल्का सफेद रंगका वस्त्र था जिसमें समुद्रकी लहरोंकी सी आभा झलकती थी (क्षीरतरङ्गरी भूत क्षीरोदोमिस्यानिव) । (२) गरासू—ग्रास कौर । (३) अछरहि—अप्सरा । (४) माहुर—विष ।