चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९५१ टिप्पणी—(१) सँरगा—नाव । (७) ओऊहि—जब तक । ३०६ ( रीडेण्ड्स २१७प ) सबारी खुदने लोरक व चाँदा बर कश्ती ( लोरक व चाँदा नावमें बैठना ) माँझ गाँग हुत खेवट कहा । कउन नारि घर कइवाँ अहा ॥१ रैन कहाँ तुम्ह कीन्हि बसेरा । नदि नियर न देखेउँ गाँउ न खेरा ॥२ परहुँस मया चलेउँ रिसाई । भर एक रात गाँग हँ आई ॥३ मूँ महरी के जाति अकेली । साथ न कोऊ सखी सहेली ॥४ काह न कोउ मनावन आवा । जिंह घर आइ सो आठ न पावा ॥५ सास ननद मोर माखउँ, दीख न कुँबइँ पतार । ६ पिया सन मोर साइ बिरोधा, यहिं छाड़ेउँ घर पार ॥७ ३०७ ( रीडेन्ट्स २३४; मनेर १५२व ) गुजार खुदने लोरक व चाँदा अज आबे गाँग ( लोरक-चाँदाका गंगा पार करना ) चाँदहि खवट सों अस कहा । अभरन मोर बहि पारहिं अहा ॥१ मवर मँरगा साँध लै आवा । घालंतहिं लोरक माथ उचाया ॥२ दीन्हि तराइ खेवट बहे । दाइ जन चले न तीमर अहा ॥३ सार चाँद दाइ मँरगा चढ़े । एक फाठ के दोउ गढ़े' ॥४ गवर ठाइ अरवारहिं रहा' । फरिया लार आपु कइ गहा ॥५ अगों चाँद मयानी, पाछ लोरक पीर । ६ दपी मंयाग गाँग हर आयि, पूइत पारा तीर ॥७ पाठान्तर—मनेर प्रतिमें केवल अन्तिम चार पंक्तियाँ हैं । इनके साथ आरम्भकी तीन पंक्तियाँ कड़कक ३०७ की हैं।