चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५६ पाप पाप के आप उबारसि । मिल माइ कै पैं जिउ हारसि ॥५ कहसि घेर तोर हा, होइ हीँ अगसर के मुँह लाग ।६ कहा छोर सेटौं सेवक, गँगोट अइस बोल कहि भाग ॥७ टिप्पणी—(१) घर भाषा—'गुहरावा अथवा फिरावा पाठ भी सम्भव है। इस प्रसंग स्पष्ट न होनेसे पाठका निश्चय करना सम्भव नहीं है। ३२० (रीडिंग्स २४८ : बम्बई २७ ) तंग करने लोरक का कोतवाल व विद्यारानी ( लोरकका कोतवाल और विद्यारानीसे युद्ध ) तीनहुँ हाँक फिरा कोतवारा । पोलत बोलि माँछ सँदि मारा ॥१ देखि मकेरी' चितैहि न लागहिं । दुँहु मेह अनै लै चाहहिं ॥२ देहि दान औ बिनति कराहीं । कहा चलहु राजा पहँ वाहीं ॥३ कहा न सुनैं औ दान न लीन्हें । बात कहत अनउत्तर दीन्हें ॥४ लोरक चाँदहि अस मत कहई' । अस मनुखै कै बैरी मई' ॥५ लोरक खड़ग हथवासा, चाँदे धनुख चढ़ाइ ।१० छोट जन सबही मारे, जान न कोऊ पाइ' ॥७ पाठान्तर—बम्बई प्रति— शी र्तक—नशिश्तने जकबारियान दरमियाने राह अज्याने चाँदा व लोरक (चाँदा और लोरकके मध्यमें दानियोंका बैठना ) ! १—बैठ दानी औ कतवारा । २—मजु । ३—अकेल । ४—जावा । —दानु मह एक पै रह धावा । ६—दान देहि औ बिनय कराहीं । ७—कह । ८—छोहन । ९—अल वाहत । १०—लोर चाँदा दुहुन कहि मई । ११—अस बिनती कहि औ इट गई । १२—लोर बीर हथवासा काढ़न चाँदा धनुख चढ़ाउ । १३—छोर जन सबै सँहारे, जान न कोऊ पाउ ॥ ३२१ (अनुपलब्ध)