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चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

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२८४ अनघट बिछवइ पांवर, लौर चाँद फर लीन्हि ।६ अरथ दरप औ खरग कटारा, मान गुनी कहँ दीन्हि ॥७ टिप्पणी— (१) हिया—हृदय । सिराने—शीतल हुआ । बरत—जल रहा । कहा—था। (२) तरकन—तरौना कानका आभूष जिसे तरकी कहते हैं। यह फूलके आकारका गोल और रवेदार होता है । हाँस—हँसली (सं०— अंसाह्निका)- गलेका एक आभूषण जो चन्द्राकार होता है और गलेसे चिपटा रहता है। चूरा—चूड़ी । 'जोरा'(जोड़ा) पाठ भी सम्भव है। (४) हस्तुर—(सं हस्तपूरक) हाथका कड़ा। जोर—सामने मस्तक पर लगाया जाने वाला आभूषण । पूरी—पूरी फूलके आकारकी कील। मूंड मंग—सम्भवतः यह मौली माँगका अशुद्ध रूप है। मागमें भरी जानेवाली मोतियों की लड़ी। करें—कर (हाथ) का। (५) बाधी—जब भागमें पहननेका आभूषण । काँढी—कण्ठी कण्ठ में पहनने का आभूषण। (६) अनघट—पैरके अँगूठामें पहना जाने वाला आभूषण । (७) बिछवई—बिछुआ विछिया । पैरकी उँगलियोंमें पहना जानेवाला आभूषण जिसे विवाहिता स्त्रियाँ ही पहनती हैं । १६० (रौडैण्डथ ५ ३ मनेर १ ३अ ) आखिर बिसहर सबद कत्थ गुफ़्तन फ़रमूढने मौलाना नषन ( मौलाना नषनक बिसहर पर कुछ कहना ) मौलाना दाउद यह गित गाई । जें रें सुनौ सो गा मुरझाई ॥१ धनि ते सबद धनि लेखनहारा । धनि ते बोल' धनि अरथ बिचारा ॥२ हरषी आठ सो चाँदा रानी। नाग डसी हुत सो महि रखानी' ॥३ तोर कहा मैं यह खड गानतें । कया कबित' के लोग सुनावउँ ॥४ नषन मलिक दुख बात उमारी । सुनहु फान दइ यह गुनियारी ॥५ और कबित मैं फरउँ बनाई, सीस नाइ कर जोर ।६ एक एक जा तुम्ह पूछउ बिभार कहहुतौ सिंह सोर ॥७