चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
पृष्ठ 326, कुल 520 में से
संदर्भ में पढ़ें२११ टूंटै कहूँ लोर मैंगरावा। सिध बचन हुत मन महँ आवा ॥३ सिध आइ लोरक पैंथ ठाढ़ा। लोरहि टूंटहि बोल जो पाढ़ा ॥४ दूनौ कहहिं चाँद सुर जोई। औ तिह माँझ मुकाउब होई ॥५ बाँदा ठाढ़ी कौतुक देखइ, मुँह मँह बकत न आठ ॥६ बन खेल औ गीत भुलानें, रावल सीस डोलाठ ॥७ ३७८ (मनेर १०२ब) दरमियाने खोगी व लोरक गुफ्तगू शुदन (जोगी और लोरकमें बातचीत) सिध कहैइ तुम्ह काहे जूझहु। करहु गियान मन मँह सूझहु ॥१ सभा करहु अउ करहु बिचारा। दुँहु को जीती को दुँहु हारा ॥२ जूझइ चाहु जो पूछा भला। बाहाँ जोरे लोरक चला ॥३ चाँद साथ भइ औ सिध भवा। पुँनि नगर-सभा महँ गवा ॥४ नगर उहाँ पै भइठ जो दीठी। इँदर सभा बरु सभा पईठी ॥५ सभा सँवारि जो राउत, भइठ उहाँ पै बाइ। ६ चारि खण्ड का नियाउ नियारहि, एकउ फरह न जाइ ॥७ टिप्पणी-(१) गियान-ज्ञान। (७) नियाउ-न्याय। नियारहि-निर्णय करते हैं। एकउ-एक भी। फरह-यह शब्द भोजपुरीमें बहुत प्रचलित है और कायदेके वाक्य अदालतके प्रयोगमें प्रयुक्त होता है। यहाँ तात्पर्य 'वराके बाहर से है। ३७९ (मनेर १०७अ) हर चहार कस सलाम रसीदन (चारों जनोंका प्रणाम करना) आइ चहूँ मिलि कीन्हि जुहारू। जुझ मरत इहिं करहु विचारू ॥१ बारा सभा कहँहु दुहु आई। कहि लागि तुम्ह जूझहु भाई ॥२