चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएक ही कड़बकको दो पृष्ठोंपर दो शीषोंसे दिया है और कहीं दो कड़बकोंकी पंक्तियोंको मिलाकर एक कड़बकके रूपमें लिखा है । इस प्रतिकी विशेषता यह है कि प्रत्येक पृष्ठके हाशियेपर कुतबनकृत मिरगावती के कड़बक अंकित हैं । दूसरी बात यह है कि कुछ पत्रोंके बायें पृष्ठके बायें हाशियेमें ऊपर पृष्ठ संख्या अंकित है । ये पृष्ठ संख्या १४८ १४९ १५२ १५७; १५९ १६१ १६३, १७ हैं । शेष पृष्ठोंपर कोई पृष्ठ संख्या नहीं है । ऐसे पृष्ठोंपर असफ़रीने अपने अनुमानके आधारपर कहीं अँगरेजी और कहीं फारसी अंकोंमें पृष्ठ संख्या डाल दी है । यद्यपि उनकी दी हुई पृष्ठ संख्याएँ त्रुटिपूर्ण हैं तथापि पृष्ठ निर्देशनके निमित्त उन्हें इस ग्रन्थमें स्वीकार कर लिया गया है । पंजाब प्रति—भारत-पाकिस्तानके विभाजनसे पूर्व यह प्रति लाहौरके सेन्ट्रल संग्रहालयमें थी और उक्त संग्रहालयकी चित्र-सूचीके अनुसार वहाँ कुल २४ पृष्ठ थे । देशके विभाजनके साथ-साथ जब उक्त संग्रहालयकी वस्तुओंका भी बँटवारा हुआ तो ये पृष्ठ भी बँट गये । कहा जाता है कि भारतको १० और पाकिस्तानको १४ पृष्ठ मिले । भारतको प्राप्त दस पृष्ठ तो पंजाब राजकीय संग्रहालय, पटियालामें सुरक्षित हैं किन्तु पाकिस्तानको मिले चौदह पृष्ठोंमेंसे केवल दसके ही फोटो हमें लाहोर संग्रहालयसे उपलब्ध हो सके । शेष चार पृष्ठोंके सम्बन्धमें कोई जानकारी प्राप्त न हो सकी । इस प्रतिके प्रत्येक पत्रपर एक ओर चित्र और दूसरी ओर काव्यका फारसी लिपिमें आलेखन है । ये सभी पृष्ठ अति जीर्ण अवस्थामें हैं । वे कटे-फटे तो हैं ही साथ ही लाल स्याहीसे घिरे अक्षर भी फीके पड़ गये हैं । इस कारण इन पृष्ठोंका पाठोद्धार सुगम्य नहीं है । उनसे केवल लुप्त पृष्ठोंका अनुमानमात्र हो सकता है । इस प्रतिमें प्रत्येक पृष्ठमें ९ पंक्तियाँ हैं । आरम्भकी दो पंक्तियोंमें फारसी भाषामें शीर्षक और शेषमें एक कड़बक है । तीसरा यमक दो पंक्तियोंमें विभाजित करके लिखा गया है । इस प्रतिके पटियाला और लाहोर संग्रहालय स्थित पृष्ठोंका यहाँ क्रमशः ‘प’ और ‘ल’ द्वारा निर्देशन किया गया है । काशी प्रति—इस प्रतिके केवल ६ पृष्ठ उपलब्ध हैं जो काशी विश्वविद्यालयके कला संग्रहालय भारत कला भवन में हैं । ये पृष्ठ भी सचित्र हैं अर्थात् इनके एक ओर चित्र और दूसरी ओर काव्यका आलेखन है । प्रत्येक पृष्ठ पर फारसी लिपिमें दस पंक्तियाँ हैं जिनमें ऊपर दो पंक्तियोंमें फारसी भाषामें शीर्षक है । इन प्रतियोंमेंसे किसीमें भी लिपिकाल सम्बन्धी उल्लेख प्राप्त न होनेसे उनके काल निर्णयकी समस्या जटिल बन पडती है । किन्तु कतिपय बाह्य प्रमाणोंसे उनके लिपि कालके सम्बन्धमें बहुत कुछ अनुमान किया जा सकता है । ये सभी प्रतियाँ फारसी लिपिकी नस्त शैलीमें लिखी गयी हैं । इस शैलीके लेखनका प्रचलन भारतमें मुगल सम्राट अकबरके शासनकालके आरम्भ होते-होते अर्थात् सोलहवीं शताब्दीके मध्यतक समाप्त हो गया था । इस कारण लिपिके आधारपर निःसंकोच कहा जा सकता है कि ये सभी प्रतियाँ किसी भी अवस्थामें सोलहवीं शताब्दीके तृतीय चरणके