भारतकोश
संग्रह पर लौटें

चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

DevanagariAwadhipublished520 पृष्ठ

एक ही कड़बकको दो पृष्ठोंपर दो शीषोंसे दिया है और कहीं दो कड़बकोंकी पंक्तियोंको मिलाकर एक कड़बकके रूपमें लिखा है । इस प्रतिकी विशेषता यह है कि प्रत्येक पृष्ठके हाशियेपर कुतबनकृत मिरगावती के कड़बक अंकित हैं । दूसरी बात यह है कि कुछ पत्रोंके बायें पृष्ठके बायें हाशियेमें ऊपर पृष्ठ संख्या अंकित है । ये पृष्ठ संख्या १४८ १४९ १५२ १५७; १५९ १६१ १६३, १७ हैं । शेष पृष्ठोंपर कोई पृष्ठ संख्या नहीं है । ऐसे पृष्ठोंपर असफ़रीने अपने अनुमानके आधारपर कहीं अँगरेजी और कहीं फारसी अंकोंमें पृष्ठ संख्या डाल दी है । यद्यपि उनकी दी हुई पृष्ठ संख्याएँ त्रुटिपूर्ण हैं तथापि पृष्ठ निर्देशनके निमित्त उन्हें इस ग्रन्थमें स्वीकार कर लिया गया है । पंजाब प्रति—भारत-पाकिस्तानके विभाजनसे पूर्व यह प्रति लाहौरके सेन्ट्रल संग्रहालयमें थी और उक्त संग्रहालयकी चित्र-सूचीके अनुसार वहाँ कुल २४ पृष्ठ थे । देशके विभाजनके साथ-साथ जब उक्त संग्रहालयकी वस्तुओंका भी बँटवारा हुआ तो ये पृष्ठ भी बँट गये । कहा जाता है कि भारतको १० और पाकिस्तानको १४ पृष्ठ मिले । भारतको प्राप्त दस पृष्ठ तो पंजाब राजकीय संग्रहालय, पटियालामें सुरक्षित हैं किन्तु पाकिस्तानको मिले चौदह पृष्ठोंमेंसे केवल दसके ही फोटो हमें लाहोर संग्रहालयसे उपलब्ध हो सके । शेष चार पृष्ठोंके सम्बन्धमें कोई जानकारी प्राप्त न हो सकी । इस प्रतिके प्रत्येक पत्रपर एक ओर चित्र और दूसरी ओर काव्यका फारसी लिपिमें आलेखन है । ये सभी पृष्ठ अति जीर्ण अवस्थामें हैं । वे कटे-फटे तो हैं ही साथ ही लाल स्याहीसे घिरे अक्षर भी फीके पड़ गये हैं । इस कारण इन पृष्ठोंका पाठोद्धार सुगम्य नहीं है । उनसे केवल लुप्त पृष्ठोंका अनुमानमात्र हो सकता है । इस प्रतिमें प्रत्येक पृष्ठमें ९ पंक्तियाँ हैं । आरम्भकी दो पंक्तियोंमें फारसी भाषामें शीर्षक और शेषमें एक कड़बक है । तीसरा यमक दो पंक्तियोंमें विभाजित करके लिखा गया है । इस प्रतिके पटियाला और लाहोर संग्रहालय स्थित पृष्ठोंका यहाँ क्रमशः ‘प’ और ‘ल’ द्वारा निर्देशन किया गया है । काशी प्रति—इस प्रतिके केवल ६ पृष्ठ उपलब्ध हैं जो काशी विश्वविद्यालयके कला संग्रहालय भारत कला भवन में हैं । ये पृष्ठ भी सचित्र हैं अर्थात् इनके एक ओर चित्र और दूसरी ओर काव्यका आलेखन है । प्रत्येक पृष्ठ पर फारसी लिपिमें दस पंक्तियाँ हैं जिनमें ऊपर दो पंक्तियोंमें फारसी भाषामें शीर्षक है । इन प्रतियोंमेंसे किसीमें भी लिपिकाल सम्बन्धी उल्लेख प्राप्त न होनेसे उनके काल निर्णयकी समस्या जटिल बन पडती है । किन्तु कतिपय बाह्य प्रमाणोंसे उनके लिपि कालके सम्बन्धमें बहुत कुछ अनुमान किया जा सकता है । ये सभी प्रतियाँ फारसी लिपिकी नस्त शैलीमें लिखी गयी हैं । इस शैलीके लेखनका प्रचलन भारतमें मुगल सम्राट अकबरके शासनकालके आरम्भ होते-होते अर्थात् सोलहवीं शताब्दीके मध्यतक समाप्त हो गया था । इस कारण लिपिके आधारपर निःसंकोच कहा जा सकता है कि ये सभी प्रतियाँ किसी भी अवस्थामें सोलहवीं शताब्दीके तृतीय चरणके

७७९ और ७८१ में से कौन-सी चन्दायनकी रचनाकी वास्तविक तिथि है अभी कहना कठिन है। फारसी लिपिमें उन्नासीका एकासी अथवा एकासीका उन्नासी पढ़ा जाना सामान्य-सी बात है। उपलब्ध प्रतियाँ चन्दायनकी अब तक निम्नलिखित प्रतियाँ प्रकाशमें आयी हैं और वे सभी खण्डित हैं :— रीलेण्ड्स प्रति—यह प्रति मैनचेस्टर (इंगलैंड) के जान रीलेण्ड्स पुस्त- कालयमें सुरक्षित है। इस प्रतिमें आदि और अन्तके कुछ अंश नहीं हैं। बीच-बीचसे भी कुछ पृष्ठ गायब हैं। ग्रन्थके व्यतिव्यस्त होनेके पश्चात् किसीने पृष्ठोंको एकत्र कर पृष्ठांकन किया है, जिससे ग्रन्थके पूर्ण होनेका भ्रम होता है। नये पृष्ठांकनके अनुसार इस ग्रन्थके अन्तिम पत्रकी संख्या १२६ है पर बीचसे ८ पत्र—६७, १११, २६ और १११, ११५ गायब हैं। इस प्रकार इसमें केवल ११८ पत्र अर्थात् २३६ पृष्ठ हैं जिनमें केवल १४९ पृष्ठोंपर ग्रन्थका आलेखन हुआ है। शेष पृष्ठोंपर पूरे आकारके रंगीन चित्र हैं जो भारतीय चित्रकलाके इतिहासकी दृष्टिसे अत्यन्त महत्त्वके हैं। यह प्रति फारसी लिपिमें लिखी गयी है और प्रत्येक पृष्ठमें सात पंक्तियोंमें एक कड़बक और उसके ऊपर दो पंक्तियोंमें फारसी भाषामें उसका शीर्षक अथवा सार है। बम्बई प्रति—इस प्रतिके केवल ६४ पृष्ठ उपलब्ध हैं जो बम्बईके प्रिंस आव वेल्स संग्रहालयमें हैं। ये पृष्ठ भोपालसे प्राप्त हुए हैं इसलिए कुछ लोग इसे भोपाल- प्रतिके नामसे भी अभिहित करते हैं। इस प्रतिके सभी पृष्ठोंके एक ओर चित्र और दूसरी ओर फारसी लिपिमें काव्यका आलेखन है। ये पृष्ठ बिना किसी क्रमके उपलब्ध हुए हैं और उनमें किसी प्रकारका पृष्ठांकन भी नहीं है। अतः इन पृष्ठोंमें कोई ऐसी सामग्री नहीं है जिसके सहारे इन पृष्ठोंको स्वतः क्रमबद्ध किया जा सके। प्रत्येक पृष्ठमें आठ पंक्तियोंमें एक कड़बक और उसके ऊपर दो पंक्तियोंमें फारसी भाषामें उसका शीर्षक अथवा सार है। इस प्रतिमें कड़बकके तीसरे यमकको दो पंक्तियोंमें बाँटकर लिखा गया है। हापर पृष्ठ—मैसाचुसेट्स (संयुक्तराष्ट्र अमेरिका) निवासी भारतीय कलाके संग्राहक शान्तिन होपरके संग्रहमें इस ग्रन्थके दो पृष्ठ हैं। उन्हें देखनेसे जान पड़ता है कि वे मूलतः बम्बई प्रतिके पृष्ठ रहे होंगे जो किसी प्रकार बिखर गये। मनेरशरीफ प्रति—यह प्रति मनेरशरीफ (बिहार) के एक खानकाहसे पटना विश्वविद्यालयके इतिहासके प्राध्यापक सैयद हसन असकरीको प्राप्त हुई है और उन्हींके पास है। इस प्रतिमें २४ पृष्ठ हैं। यह प्रति भी फारसी लिपिमें लिखी गयी है। प्रत्येक पृष्ठमें पंक्तियाँ हैं जिनमें ऊपरकी पंक्तिमें फारसी भाषामें शीर्षक है और शेष ८ पंक्तियोंमें एक कड़बक है। तीसरा यमक दो पंक्तियोंमें बाँटकर लिखा गया है। इस प्रतिका लिपिकार अत्यन्त असावधान जान पड़ता है। उसने कहीं तो

२५ प्रति जोधपुर राज्यके पुस्तकालयसे वासुदेवशरण अग्रवालको प्राप्त हुई है।¹ किन्तु यह सूचना निराधार और नितान्त भ्रामक है। इस प्रकारकी कोई प्रति न तो जोधपुर पुस्तकालयमें है और न कहीं अन्यत्रसे वासुदेवशरण अग्रवालको कोई पूरी प्रति प्राप्त हुई है। इसी प्रकार रावत सारस्वतने पूनाके डेकन कालेज पोस्ट ग्रेज्युएट रिसर्च इन्स्टीट्यूटमें चन्दायणके कुछ पृष्ठ होनेकी बात कही है। उसमें भी कोई तथ्य नहीं है। राय कृष्णदासने लिखा है कि लाहौरके प्रोफेसर शीरानीने चन्दायणकी एक प्रति प्राप्त की थी जिसके २४ सचित्र पृष्ठ तो लाहौर संग्रहालयने ले लिये और शेष पंजाब विश्वविद्यालयमें चले गये।² इस सूचनाका आधार क्या है, कहा नहीं जा सकता; किन्तु पंजाब विश्वविद्यालय (लाहौर) से पूछताछ करनेपर ज्ञात हुआ है कि उनके पुस्तकालयमें इस प्रकारका कोई ग्रन्थ नहीं है। परशुराम चतुर्वेदीने कस्तूरीके एक अंक³के आधारपर यह सूचना दी है कि एक पूर्ण प्रतिका पता हिन्दी विद्यापीठ आगराके उदयशंकर शास्त्रीको लगा है जो नागरी अक्षरोंमें लिखी गयी किन्तु अधिक मूल्य माँगे जानेके कारण क्रय नहीं की जा सकी। उदयशंकर शास्त्रीको जिस प्रतिके अस्तित्वकी जानकारी रही है वह वस्तुतः बीकानेरवाली ही प्रति है जिसका उल्लेख अलग करके चतुर्वेदीने एक अन्य प्रति होनेका भ्रम प्रस्तुत कर दिया है। ग्रन्थका आकार मूल प्रति उपलब्ध न होनेके कारण चन्दायणके आकारके सम्बन्धमें निश्चित रूपसे कुछ भी कहना कठिन है। हाँ बीकानेर प्रतिके आधारपर यह अनुमान किया जा सकता है कि इस काव्यमें कमसे कम ४०३ कड़वक होंगे। इस प्रतिमें आरम्भके ३८८ कड़वक हैं और उसके बाद १३ पृष्ठ छोड़कर पुष्पिका दी गयी है। यह बात इस ओर संकेत करती है कि ग्रन्थका कुछ अंश लिखनेसे रह गया है। उसे लिखनेके लिए ही लिपिकारने पृष्ठ खाली छोड़ दिये थे। अन्तका अंश खण्डित है इसका समर्थन रीठेण्ड्स प्रतिसे भी होता है। रीठेण्ड्स प्रतिमें बीकानेर प्रतिके अन्तिम कड़वकके आगेके पर्याप्त अंश उपलब्ध हैं। अस्तु बीकानेर प्रतिकी पंक्तियोंकी गणनाके आधार पर कहा जा सकता है कि उसके १३ खाली पृष्ठोंपर १५ कड़वक लिखे जाते। इस प्रकार सम्पूर्ण ग्रन्थमें ४०३ कड़वक होनेका अनुमान होता है। इन उपलब्ध प्रतियोंमें रीठेण्ड्स प्रति सबसे बड़ी है। उसमें ३४९ कड़वक हैं। अन्य प्रतियोंमें अधिकांश कड़वक ऐसे हैं जो रीठेण्ड्स प्रतिमें उपलब्ध हैं। इस कारण १. भारतीय साहित्य आगरा वर्ष १ अंक पृ १८९। २. कविताकौमुदी दिल्ली अंक १२ पृ ७१। ३. परम्परा यूनिवर्सिटी सम्वत् १९६ पृ ६९। ४. हिन्दीके सूफी प्रेमाख्यान पृ २९।

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प्रति जोधपुर राज्यके पुस्तकालयसे वासुदेवशरण अग्रवालको प्राप्त हुई है।¹ किन्तु यह सूचना निराधार और नितान्त भ्रामक है। इस प्रकारकी को प्रति न तो जोधपुर पुस्तकालयमें है और न कहीं अन्यत्रसे वासुदेवशरण अग्रवालको कोई पूरी प्रति प्राप्त हुई है। इसी प्रकार रावत सारस्वतने पूनाके डेकन कालेज पोस्ट-ग्रेजुएट रिसर्च इन्स्टीच्यूटमें चन्दायनके कुछ पृष्ठ होनेकी बात कही है। उसमें भी कोई तथ्य नहीं है। राय कृष्णदासने लिखा है कि लाहोरके प्रोफेसर शीरानीने चन्दायनकी एक प्रति प्राप्त की थी, जिसके २४ सचित्र पृष्ठ तो लाहोर संग्रहालयने ले लिये और शेष पंजाब विश्वविद्यालयमें चले गये।² इस सूचनाका आधार क्या है कहा नहीं जा सकता किन्तु पंजाब विश्वविद्यालय (लाहोर) से पूछताछ करनेपर ज्ञात हुआ है कि उनके पुस्तकालयमें इस प्रकारका कोई ग्रन्थ नहीं है। परशुराम चतुर्वेदीने असकरीके एक लेख³के आधारपर यह सूचना दी है कि एक पूर्ण प्रतिका पता हिन्दी विद्यापीठ आगराके उदयशंकर शास्त्रीको लगा है जो नागरी अक्षरोंमें लिखी गयी किन्तु अधिक मूल्य माँगे जानेके कारण क्रय नहीं की जा सकी। उदयशंकर शास्त्रीको जिस प्रतिके अस्तित्वकी जानकारी रही है वह वस्तुतः बीकानेरवाली ही प्रति है जिसका उल्लेख अलग करके चतुर्वेदीने एक अन्य प्रति होनेका भ्रम प्रस्तुत कर दिया है। ग्रन्थका आकार पूर्ण प्रति उपलब्ध न होनेके कारण चन्दायनके आकारके सम्बन्धमें निश्चित रूपसे कुछ भी कहना कठिन है। हाँ बीकानेर प्रतिके आधारपर यह अनुमान किया जा सकता है कि इस काव्यमें कमसे कम ४७१ कड़वक होंगे। इस प्रतिमें आरम्भके ४१८ कड़वक हैं और उसके बाद १३ पृष्ठ छोड़कर पुष्पिका दी गयी है। यह बात इस ओर संकेत करती है कि ग्रन्थका कुछ अंश लिखनेसे रह गया है। उसे लिखनेके लिए ही लिपिकारने पृष्ठ खाली छोड़ दिये थे। अन्तका अंश खण्डित है इसका समर्थन रीट्सबर्ग प्रतिसे भी होता है। रीट्सबर्ग प्रतिमें बीकानेर प्रतिके अन्तिम कड़वकके आगेके पचास अंश उपलब्ध हैं। अस्तु बीकानेर प्रतिकी पंक्तियोंकी गणनाके आधार पर कहा जा सकता है कि उसके १३ खाली पृष्ठोंपर ५५ कड़वक लिखे जाते। इस प्रकार सम्पूर्ण ग्रन्थमें ४७३ कड़वक होनेका अनुमान होता है। इन उपलब्ध प्रतियोंमें रीट्सबर्ग प्रति सबसे बड़ी है। उसमें ३४९ कड़वक हैं। अन्य प्रतियोंमें अधिकांश कड़वक ऐसे हैं जो रीट्सबर्ग प्रतिमें उपलब्ध हैं। इस कारण १ भारतीय साहित्य आगरा वर्ष १ अङ्क १ पृ १८९। २ मरुभारती, पिलानी अङ्क १३ पृ ७१। ३ पटना यूनिर्वसिटी जर्नल १९ पृ ९२। ४ हिन्दीके सूफी प्रेमाख्यान पृ २९।

२६ उन प्रतियोंसे केवल ४३ कड़वक ऐसे प्राप्त हुए हैं जो रीडेण्ड्स प्रतिमें नहीं हैं। ये कड़वक इस प्रकार हैं — मनेरशरीफ प्रतिमें १९ बम्बई प्रतिमें ५, पंजाब प्रतिमें ७ डाक्टर प्रतिमें १ रामपुर प्रतिमें १। इस प्रकार हमें चान्दायणके कुल ३९२ कड़वक उपलब्ध हैं। यदि आकारके सम्बन्धमें हमारा उपर्युक्त अनुमान ठीक है तो अभी ८१ कड़वक अज्ञात हैं। यदि बीकानेर प्रति प्रकाशमें आ जाय तो उससे अनुपलब्ध क- डवकोंमें ६०-६१ कड़वक प्राप्त हो जानेकी सम्भावना है और तब केवल अन्तके २०-२१ कड़वक मिलना शेष रह जायेंगे। उपलब्ध प्रतियोंके खण्डित होनेके कारण काव्यको शृंखलाबद्ध रूप देनेमें पर्याप्त कठिनाइ रही है। उसे शृंखलाबद्ध करनेमें रीडेण्ड्स प्रति अत्यधिक सहायक सिद्ध हुई। यद्यपि वह प्रति आदि अन्तसे खण्डित है और बीच के भी कुछ पृष्ठ गायब हैं, तथापि वह अपने आपमें क्रमबद्ध है। कुछ ही स्थल ऐसे हैं जहाँ किसी प्रकारका व्यतिक्रम है। खण्डित होनेके पश्चात् किसी अन्यकारने उन्हें क्रमबद्ध कर पृष्ठांकित किया है। इन पृष्ठांकोंको आधार मानकर बीकानेर प्रतिके प्रकाशमें आये अंशोंके सहारे हमने ग्रन्थको सूत्रबद्ध करनेका प्रयत्न किया है। बीकानेर प्रतिकी प्रकाशित सामग्रीसे ज्ञात हुआ कि रीडेण्ड्स प्रतिका पाँचवाँ कड़वक काव्यका चौबीसवाँ कड़वक रहा होगा। अतः हमने उसे आरम्भके कड़वकोंकी गणनाका आधार बनाया। इसी प्रकार बीकानेर प्रतिके अन्तिम कड़वककी संख्या ४३८ मानकर हमने आगे पीछेके कड़वकोंकी संख्या निर्धारित की है। ऐसा करनेपर हमें ज्ञात हुआ कि रीडेण्ड्स प्रतिमें ४३८ वें कड़वकके आगेके १४ कड़वक ऐसे हैं जो बीकानेर प्रतिमें नहीं हैं। सूत्रबद्ध करनेमें मनेर शरीफ प्रति भी सहायक सिद्ध हुई है। उसमें लिपिकारने जो पृष्ठ-संख्या दी है उससे हमने रीडेण्ड्स प्रतिके पृष्ठोंका तारतम्य स्थापित किया है रीडेण्ड्स प्रतिके पृष्ठ २२६ और मनेर शरीफ प्रतिके पृष्ठ १४७ख पर अंकित कड़वक एक हैं। अतः हमने उक्त कड़वककी संख्या मनेरशरीफ प्रतिके अनुसार १८९ स्वीकार किया है। इस प्रकार काव्यके आदि अन्त और मध्यके कड़वकोंकी संख्या निर्धारित कर प्रसंगके अनुसार विभिन्न प्रतियोंसे प्राप्त नये कड़वकोंको यथास्थान रखनेकी चेष्टा की गयी है। काव्यका इस प्रकार ग्रथित जो रूप प्रस्तुत किया जा रहा है वह मूल ग्रन्थके कितने निकट है यह तो भविष्य ही बतायेगा जब काव्यकी कोई पूरी प्रति प्रकाशमें आयेगी। अभी तो हम यह आशा ही प्रकट कर सकते हैं कि वह मूलसे बहुत दूर नहीं है। प्रस्तुत रूपके देखनेसे ज्ञात होता है कि इसमें निम्नलिखित कड़वकोंका अभाव है— १-१९ (इनमें दो कड़वक डाक्टर और बम्बई प्रतिमें उपलब्ध हैं पर उनका निश्चित स्थान बताना कठिन है)- २३ ३४; ५४-६५ (इनमेंसे १ कड़वक पंजाब

प्रतिमें प्राप्त हैं पर वे अधूरे हैं)- १२२ १५१; १८ १८४ २८२ २८६ २९८ ९७ १९९ १ २; ३ ३ ११ ३१ ३३०-३४२ (इनमेंसे दो कड़वक बम्बई प्रतिमें प्राप्त हैं पर अन्य कड़वकोंके अभावमें उनका स्थान निश्चित नहीं किया जा सकता) १४५ ३१२ १६३ १७८ १८८ (इनमेंसे चार कड़वक पंजाब प्रतिमें प्राप्त हैं पर वे अधूरे हैं। उनका स्थान निर्धारित नहीं किया जा सकता) ४१ और ४५०-४७३ । लिपि हिन्दीके विद्वानोंकी कुछ ऐसी धारणा बन गयी है कि मुसलमान कवियों द्वारा रचे गये सभी हिन्दी प्रेमाख्यानक काव्योंकी आदि प्रति नागरी लिपिमें लिखी गयी थी। इस कथनके समर्थनमें वे इन काव्योंकी विभिन्न प्रतियोंमें पायी जानेवाली कतिपय ऐसी विकृतियोंकी सूची प्रस्तुत किया करते हैं जो उनकी दृष्टिमें नागरी लिपिसे फारसी लिपिमें परिवर्तनसे ही आ सकती हैं। इन लोगों द्वारा उपस्थितकी जानेवाली पाठ विकृतियोंके विवेचन का यह स्थान नहीं है। यहाँ यह कहना ही पर्याप्त होगा कि यदि उन्हें ध्यानपूर्वक देखा जाय तो यह समझते देर न लगेगी कि वे विकृतियों नागरी लिपिसे फारसी लिपिमें परिवर्तन करने से नहीं आयी हैं, वरन् तत्कालीन अरबी-फारसी लिपि-शैलीकी प्रवृत्तियोंसे अपरिचित लिपिकारों द्वारा लिपिबद्ध होनेके कारण आयी हैं। यह सामान्य सूझ-बूझकी बात है कि नागरी लिपिको मुसलमानी शासनकालमें कभी प्रश्रय प्राप्त नहीं हुआ। परिणामतः सभी पढांत वर्ग पूर्णतया अभिजात कायस्थ परिवारोंका नागरी लिपिके साथ नामका भी सम्बन्ध न था। उनके घरोंमें रामायण ही नहीं दुर्गा-पाठ और भगवद्गीताका भी पाठ उर्दू-फारसीमें लिखी पोथियोंसे होता था और वे शुद्ध उच्चारणके साथ उनका पाठ किया करते थे। इङ्गलैण्ड और फ्रांस के पुस्तकालयोंमें न केवल सूरसागर आदि धार्मिक ग्रन्थों की ही वरन् हिन्दू कवियोंद्वारा रचित अनेक शृंगार काव्यों यथा केशवदासकी रसिक प्रिया बिहारी सतसई आदिकी भी फारसी लिपिमें लिखी काफी प्राचीन प्रतियाँ सुरक्षित हैं। उन्हें देखते हुए यह कल्पना करना कि प्रेमाख्यानक काव्योंके रचयिता मुसलमानों ने अपने काव्यकी आदि प्रति नागरी अक्षरोंमें लिखी होगी नितान्त हास्यास्पद है। ये कवि न केवल स्वयं मुसलमान थे वरन् उनके गुरु भी मुसलमान थे और उनके शिष्य भी मुसलमान ही थे। सूफी मतका हिन्दुओंमें प्रचार हुआ हो इसका कोई भी प्रमाण उपलब्ध नहीं है। अतः उनके ग्रन्थ अरबी-फारसीके अतिरिक्त किसी अन्य लिपिमें कदापि नहीं लिखे गये होंगे। ये काव्य मूलतः अरबी-फारसी लिपिमें ही लिखे गये थे, यह उनकी उपलब्ध प्रतियोंसे भी सिद्ध होता है। वे अधिकांशतः अरबी-फारसी लिपिमें लिखी मिलती हैं और इन लिपियोंमें लिखी प्रतियाँ ही अधिक प्रमाणित हैं। यही नहीं नागरी लिपिमें प्राप्त प्रतियोंके पूर्वज भी अरबी-फारसी प्रतियाँ ही रही हैं यह भी उनके परीक्षणसे स्पष्ट प्रकट

२८ होता है। एक भी ऐसी नागरी प्रति उपलब्ध नहीं है जो सतहवीं शतीके पूर्वकी हो और किसी ग्रन्थकी प्राचीनतम प्रति कही जा सके। चन्दायतके सम्बन्धमें तो हमें यह कहनेमें तनिक भी संकोच नहीं है कि वह मूलतः नस्त' लिपिमें लिखा गया रहा होगा। उसकी सोलहवीं शती वाली प्रतियाँ इसी लिपिमें हैं। उसकी एक मात्र हिन्दी प्रतिके मूलमें कोई अरबी फारसी लिपिकी प्रति थी यह तो उसके प्रथम वाक्य—गुजरा चन्दायन गुफ्तार मौलाना दाऊद डालमई से ही सिद्ध है। सर्वोपरि हमारे सम्मुख नस्त' लिपि लिखित जो प्रतियाँ हैं उनमेंसे किसी भी प्रतिमें ऐसी विकृति नहीं मिलती जिससे उसकी किसी पूर्वज प्रतिके नागरी लिपिमें लिखे जानेकी दुरूह कल्पना भी की जा सके। पाठोद्धार और पाठ-निर्धारण किसी भी भाषाको अरबी-फारसी लिपिमें लिखना उतना कठिन नहीं है जितना कि बिना अभ्यासके उस लिपिमें लिखी भाषाका पढ़ना। इस लिपिमें व्यंजन मुख्यतः नुक्ते (विन्दुओ) पर आश्रित हैं। अतः जबतक कोई वस्तु सावधानीसे न लिखी गयी हो उसे ठीकसे और शुद्ध पढना यदि सर्वथा असम्भव नहीं तो दुरूह अवश्य है। इसी प्रकार स्वर व्यक्त करनेके लिए इस लिपिमें केवल तीन अक्षर अलिफ ये और वाव हैं। अलिफका अ और आ दोनो पढा जा सकता है। कहीं-कहीं आको शुद्ध पढ़नेके निमित्त तशदीदका चिह्न दे दिया करते हैं। येके दो रूप हैं जो छोटी ये और बड़ी य कहकर पुकारे जाते हैं। साधारणतः छोटी ये इ और ईके लिए और बड़ी य ए और ऐके लिए काम आता है। अन्तर व्यक्त करनेके लिए जेर और जबरके चिह्न लगा देते हैं। इसी प्रकार वावका प्रयोग उ, ऊ, और ओके लिए होता है। उ युक्त व्यंजनमें वावका प्रयोग न कर ऊपर केवल पेशका चिह्न लगा देते हैं। किन्तु यह सब सिद्धान्तकी ही बातें हैं। व्यवहारमे लिखते समय जेर, जबर, पेश प्रायः लोग नहीं लगाते। अभ्यासके आधारपर ही अन्दाजसे पाठ स्वरूप समझ लिया जाता है। चन्दायतकी जो प्रतियाँ हमें उपलब्ध हैं वे सभी नस्ख (अरबी लेखन शैली का एक रूप) में हैं। इस लिपिके लेखक लिपिसौन्दर्यपर विशेष बल दिया करते थे। इस कारण वे नुक्तेको अपने स्थानपर न रखकर सौन्दर्यकी दृष्टिसे आगे-पीछे ऊपर नीचे जहाँ चाहे वहाँ रख दिया करते थे। जिसका लोप भी कोई दोष नहीं माना जाता था। इस प्रकार नुक्तेके अभाव अथवा मनमानीके कारण पाठोद्धारमें जो कठिनाई हो सकती है वह तो है ही इसमें अनेक अक्षर ऐसे जिनके उच्चारण बहु हैं। त और टके उच्चारणके लिए आज दो अक्षर ते और टे हैं। पर उस समय इसका काम केवल एक अक्षरसे ही लेते थे। इसी प्रकार क और ग भी एक ही अक्षर काफ़से लिखा जाता था। इस प्रकार कुछ अन्य अक्षर भी हैं। मात्रा-बोधक चिह्नोंका प्रयोग इन प्रतियोंमें नहींके बराबर है। ये के दोनों रूपोंका प्रयोग बिना किसी भेदके इ और ए के लिए किया गया है।

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लिपि स्वरूपकी इन कठिनाइयोंके साथ-साथ सबसे बड़ी कठिनाइ जो हमारे सम्मुख रही है, वह थी चन्द्रायान की पृष्ठभूमिका अभाव । हमारे पास कोई ऐसी वस्तु नहीं थी, जिससे पाठके अनुमानके लिए कोई सहाय मिल सके । एक ही शब्द पुरूस, बिरिस, बरस कुछ भी पढ़ा जा सकता है । यह तो प्रसंग से ही निश्चय किया जा सकता है कि वास्तविक पाठ क्या है । जब प्रसंग ही ज्ञात न हो तो किया क्या जाय ! प्रसंग ज्ञात होनेपर भी कभी कभी यह कठिनाई बनी रहती है । शब्दके पठित दो या अधिक रूपोंमेंसे कोई भी सार्थक हो सकता है । यथा—नत गावईं जहाँ और नित गावईं जहाँ । ऐसे स्थलोंपर दोमेंसे कौन-सा पाठ ठीक है निश्चित करना सहज नहीं होता । चन्द्रायानके पाठोद्धार करनेमें ऐसी ही तथा अन्य अनेक प्रकारकी कठिनाइयाँ हमारे सामने रही हैं । एक-एक शब्दको समझने और उसका रूप निर्धारण करनेमें घण्टों माथापच्ची करनी पड़ी है । कभी कभी तो एक पंक्तिक पढ़नेमें दो-दो तीन तीन दिन लग गये हैं । हमारी कठिनाइयोंका अनुमान वे ही लोग कर सकते हैं जिन्होंने बिना किसी नागरी प्रतिकी सहायताके इस प्रकारका पाठ-सम्पादन किया होगा । अपने सारे श्रमके बावजूद हम दृढता पूर्वक नहीं कह सकते कि हम ग्रन्थका पाठोद्धार करनेमें पूर्ण सफल हुए हैं । कितने ही ऐसे शब्द हैं जिनके शुद्ध पढ़ पानेके सम्बन्धमें स्वयं हमें सन्देह है । उनमेंसे कुछ तो विकृत पाठ हो सकते हैं; जिनका निराकरण तो कुछ और प्रतियोंके प्रकाशमें आनेपर ही सम्भव है । कुछ ऐसे भी हो सकते हैं, जिन्हें हमने पढ़ा तो ठीक हो पर अर्थ ज्ञानके अभावमें हम उन्हें सन्दिग्ध समझते हों । ऐसे शब्दोंकी भी कमी न होगी जिन्हें हम शुद्ध पढ़ ही न सके हों । इस प्रकारके अप-पाठके मूलमें बिन्दुओंका अभाव ही मुख्य होगा । उन्हें मूल शब्दकी कल्पनाके सहारे सुधारा सकता है ।

प्रति-परम्परा, पाठ-सम्बन्ध और संशुद्ध पाठ

प्राचीन ग्रन्थोंके सम्पादनकी आधुनिक प्रणालीके अनुसार विभिन्न प्रतियोंमें जो विभिन्न पाठ मिलते हैं उनमेंसे कौन-सा पाठ गुरु अथवा मूलके निकट है इसे जाननेके निमित्त प्रति-परम्परा और पाठ-सम्बन्धका शोध किया जाता है और तदनन्तर संशुद्ध पाठ (क्रिटिकल टेक्स्ट) प्रस्तुत किया जाता है । प्रस्तुत काव्यका इस प्रकारका कोई संशुद्ध पाठ (क्रिटिकल टेक्स्ट) उपस्थित करनेका प्रयास हमने नहीं किया है । यह बात नहीं कि हम उसके महत्त्वसे परिचित न हों और उसकी आवश्यकता न समझते हों । इस दिशामें हमारी कठिनाई यह है कि काव्यके उपलब्ध ३९२ कड़वकोंमें- से २९२ कड़वक ऐसे हैं जो किसी एक ही प्रतिमें मुख्यतः रीजेण्ड्स प्रतिमें प्राप्त हैं । उनके प्रति-पाठके अभावमें किसी प्रकारके संशुद्ध पाठ उपस्थित करनेका प्रश्न ही नहीं उठता । शेष ? कड़वकोंमेंसे निम्नलिखित ८८ कड़वक ऐसे हैं जो रीजेण्ड्स प्रतिके अतिरिक्त अन्य किसी एक प्रतिमें हैं —

३ बम्बई प्रति—८५ ८६ ११० १२१ १२४, १२५, १३१ १६२, १६६, १७०, १८२, १९५, २६ २६२, २६ २७१, २९६ ३१६, ३२६ ३४३ ३४६ ३६७, ३९९ ४०३ ४ ७ ४ ६ ४१६ ४१७ ४१८ ४२४ ४२५ ४२७ ४२८, ४३ ४३१ ४४१ ४४६ ४४७ ४४८ ४५२ । कुल ४ मनेर शरीफ प्रति—१८१, २१ १९१ २१४, २९७ २९७ १ ४, ३ ५, ३ ७ १ ८ १ ६, ३११ ३१२ ३१३ ३१४, ३१५ ३१६, ३२३ ३२४, ३२५, ३२६, ३३९ ३४८ ३५१ ३५२ ४५१, १५४, १५५ १५६ १५७ १५८ ३६ । कुल ३२ पंजाब प्रति—२१ ८८ ९१ ९४ १५८ २ ५ २ ६, १६७, २६९ २७ । कुल ९ काशी प्रति—१ ६, १४७ २ २ २४, १४९ । कुल ५ होपर पृष्ठ—४४४ । कुल १ इन कड़वकों के सम्बन्ध में भी हमारे सम्मुख कोई वैज्ञानिक माप-दण्ड (क्रिटिकल ऐपरेटस) नहीं है जिससे हम संयुक्त-पाठका निश्चय करें। केवल एक ही बात निश्चित है कि उनके पाठ रीजेण्ड्स प्रतिके पाठसे भिन्न हैं। रीजेण्ड्स और दूसरी प्रतिके पाठों मेंसे कौन सा हम स्वीकार करें यह हमारे विवेकका प्रश्न रहता है। अतः हमें अधिक उचित जान पड़ा कि जब २९२ कड़वकोंके पाठ किसी एक प्रतिके हैं और अधिकांशतः रीजेण्ड्स प्रतिके ही हैं तो इन कड़वकोंके लिए भी रीजेण्ड्स प्रति के ही पाठ स्वीकार किये जायें और दूसरी प्रतियोंके पाठ विकल्प रूपमें दे दिए जाँय; मूल अथवा शुद्ध पाठका निर्णय पाठक पर छोड़ दिया जाय। केवल १२ कड़वक ऐसे हैं, जिनके पाठ तीन प्रतियोंमें अर्थात् रीजेण्ड्स और बम्बई प्रतियोंके अतिरिक्त किसी एक अन्य प्रतिमें हैं। ये कड़वक इस प्रकार हैं:— रीजेण्ड्स बम्बई और पंजाब प्रतियाँ—१५९ १९ । कुल १ रीजेण्ड्स बम्बई और मनेरशरीफ प्रतियाँ—११६ ३२२ ३२८ ३२९ ३४० ३४१ ३५ १५ ३५१ । कुल ९ रीजेण्ड्स बम्बई और काशी प्रतियाँ—४ ७ । कुल १ इन कड़वकोंके परीक्षणसे ज्ञात होता है कि (१) रीजेण्ड्स और पंजाब प्रतियोंमें (२) बम्बई और मनेरशरीफ प्रतियोंमें और (३) बम्बई और काशी प्रतियोंमें परस्पर पाठ साम्यकी बहुलता है। ऐसा जान पड़ता है कि रीजेण्ड्स और पंजाब प्रतियाँ एक प्रति परम्पराकी दो शाखाएं हैं और बम्बई, मनेर शरीफ और काशी प्रतियाँ दूसरी परम्पराकी तीन शाखाएं हैं। इन दोनों परम्पराओंका सम्बन्ध इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है:—

३१

               मूलग्रन्थ
                   |
        +----------+----------+
        |                     |
        X                     X
        |                     |
   +----+----+----+      +----+----+
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 कासी बम्बई  भनेर शरीफ  रीजेन्ट्स  पंजाब

पर इस प्रकारकी प्रति-परम्परा और पाठ-सम्बन्धको व्यक्त करनेवाली यह सामग्री अत्यल्प है। उनके आधारपर केवल १२ कड़बकोंका ही कोई संयुक्त पाठ उपस्थित किया जा सकता है। यह अल्प असंबद्ध सामग्रीके बीच बेमेल जान पड़ेगा। अतः इनके लिए भी रीजेन्ट्सवाले पाठ मूल रूपमें और शेष पाठ विकल्प रूपमें दिये गये हैं। कहीं कहीं जहाँ रीजेन्ट्स प्रतिका पाठ स्पष्ट रूपसे विकृत लगा, वहाँ विवेकके सहारे दूसरी प्रतिका पाठ मूलमें ग्रहण कर लिया गया है। पर ऐसे स्थल कम ही हैं।

भाषा

रामचन्द्र शुक्लने जायसी-ग्रन्थावलीकी भूमिकामें लिखा है :—'ध्यान देनेकी बात है कि ये सब प्रेम-कहानियाँ पूरबी हिन्दी अर्थात् अवधी भाषामें एक नियत क्रमके साथ केवल चौपाई-दोहेमें लिखी गयी हैं।' १ अभीतक जितने भी हिन्दी-सूफी-काव्योंके अध्ययन प्रस्तुत किये गये हैं प्रायः उन सबमें यह तथ्य ज्योंका त्यों स्वीकार कर लिया गया है। फलस्वरूप चन्दायनकी भाषाके सम्बन्धमें भी यही समझा जाता है कि उसकी भाषा अवधी होगी। श्याममनोहर पाण्डेयने मध्य-युगीन प्रेमाख्यानमें अत्यन्त विश्वासके साथ लिखा है—'डालमऊ क्षेत्रमें अवधी बोली जाती थी। अतः जनतामें अपने सन्देश प्रसारित करनेके लिए मुल्ला दाऊदने अवधीका ही चयन करना उपयुक्त समझा होगा। सूफी कवि जिस क्षेत्रमें रहे हैं, वहाँकी भाषामें काव्य लिखते रहे हैं। पंजाबके सूफी कवियोंने पंजाबी में 'ससिवुन्नो' 'हीर राँझा' आदि कथाओंको सूफियाने ढंगसे पंजाबीमें लिखा। इसी प्रकार दौलत काजी, अलाउल आदि कवियोंने जो बंगालके रहनेवाले थे बँगलामें लिखा। अतः डालमऊका कवि अवधी क्षेत्रमें रहकर अवधीमें लिखता है तो आश्चर्य नहीं होना चाहिये। पर हमें आश्चर्य यह देखकर होता है कि हमारे विद्वान इस बातकी तो तर्कपूर्ण कल्पना कर सकते हैं कि दाऊद डालमऊके थे और डालमऊ अवधमें है, अवध की भाषा अवधी कहलायेगी अतः दाऊदकी भाषा अवधी ही होगी पर इस वास्तविक


१. चतुर्थ संस्करण, सं. २०१७ पृ. ४। २. मध्ययुगीन प्रेमाख्यानक काव्य परम्परा, पृ. १७०

३२ सम्मुख नहीं देख सकते कि चन्दायनकी रचना न तो अवधी वातावरणमें हुई थी और न उसका आरम्भिक प्रचार अवधी क्षेत्रके बीच था। अब्दुलकादिर बदायूनीने स्पष्ट शब्दोंमें कहा कि चन्दायन दिल्ली सल्तनतके प्रधान मन्त्री जौनाशाहके सम्मानमें रचा गया था और दिल्लीमें मखदूम शेख तकीउद्दीन रब्बानी जन-समाजके बीच उसका पाठ किया करते थे। यह कथन इस बातकी ओर संकेत करता है कि चन्दायनकी भाषा वह ग्राह्य है जिसे दिल्लीके प्रधान मन्त्री जौनाशाहसे लेकर दिल्लीकी सामान्य जनतातक पढ़ और समझ सकती थी। अब्दुलकादिर बदायूनीने इस भाषाके सम्बन्धमें हमें अपनी कल्पनाका कोई अवसर नहीं दिया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दोंमें बता दिया है कि इस मसनवी (चन्दायन) की भाषा हिन्दवी है। यह हिन्दवी निश्चय ही वही हिन्दवी होगी, जिसका प्रयोग चिश्ती सन्त शेख फरीदुद्दीन गंजशकर और ख्वाजा निजामुद्दीन औलिया अपने मुरीदों- से बातचीत करते समय किया करते थे। उसी हिन्दवी को जो दिल्लीके सूफी सम्प्रदाय के सन्तों द्वारा व्यवहृत होती थी और राजसभासे लेकर जन साधारणमें समझी जाती अथवा कह सकती थी दाऊद ने अपने काव्य चन्दायनके लिए अपनाया होगा और उसीमें उसकी रचना की होगी। अतः चन्दायनकी भाषाको अवधके सीमित प्रदेशमें ही बोली और समझी जानेवाली भाषा अवधीका नाम नहीं दिया जा सकता। चन्दायनमें प्रयुक्त भाषा निस्सन्देह ऐसी भाषाका स्वरूप है जिसका देशमें काफी विस्तार और विकास रहा होगा। किन्तु खेद है कि हमारे सम्मुख तत्कालीन जनजीवनके व्यवहारमें आनेवाली भाषाका कोई स्पष्ट स्वरूप नहीं है जिसके आधारपर अधिक विस्तार और विचारके साथ इस कथनकी समीक्षा की जा सके। बारहवीं शताब्दीमें काशीमें रचा गया उक्ति-व्यक्ति-प्रकरण नामक एक व्याकरण ग्रन्थ प्रकाशमें आया है जिसमें एक प्रादेशिक भाषाके स्वरूपको संस्कृतके माध्यमसे समझानेकी चेष्टा की गयी है। इस भाषाकी पहचान सुनीतिकुमार चाटुर्ज्याने आरम्भिक पूर्वी हिन्दी अर्थात् कोसली (अवधी) के रूपमें की है। यदि चन्दायनकी भाषा वस्तुतः अवधी है, जैसी कि विद्वानोंकी साधारणतया धारणा है, तो उसके शब्दोंकी उक्ति-व्यक्ति-प्रकरणके शब्द-रूपोंके साथ नैकट्य और साम्य होना चाहिये। इस प्रकारकी तुलनात्मक परीक्षाके लिए दोनों ग्रन्थोंके क्रिया रूपोंको देखना उचित होगा। वर्तमानकालिक क्रियाओंमें सामान्य वर्तमानके निम्नलिखित कर्तृवाच्य रूप उक्ति-व्यक्ति-प्रकरणमें मिलते हैं। एकवचन बहुवचन प्रथम पुरुष करउ करहु मध्यम पुरुष करसि करहु उत्तम पुरुष कर, करइ करवि

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चन्दायनमें प्रथम और मध्यम पुरुषकी वर्तमानकालिक क्रियाओंका प्रयोग कम है। उत्तम पुरुषके रूप जो हैं, वे उपर्युक्त रूपोंसे सर्वथा भिन्न हैं। यथा—आवाहौं, चढ़ावहौं, बहिराहौं, लायौं, कहाहौं, करहौं, सुहावइ, आवइ, भावइ आदि। उक्ति-व्यक्ति-प्रकरणके वर्तमानकालिक क्रियाके कर्मवाच्य रूप हैं—पड़िय, जेविअ, होइअ, पाइअ आदि। चन्दायनमें इसका रूप खेतस, चेतस आदि है। उक्ति-व्यक्ति-प्रकरण की वर्तमानकालिक विधि-क्रियाएँ उकारान्त हैं। यथा—करु, करहु। चन्दायनम इस प्रकारकी वर्तमानकालिक विधि-क्रियाओंका सर्वथा अभाव है। भूतकालिक क्रियाएँ उक्ति-व्यक्ति-प्रकरणमें अत्यल्प हैं। जो हैं, उनके आधार पर सुनीतिकुमार चाटुर्ज्याने अकर्मक क्रियाओंके निम्नलिखित रूप स्थिर किये हैं :— \quad\quad एकवचन \quad\quad\quad\quad\quad\quad बहुवचन \quad\quad गा \quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad गये \quad\quad भा, भई \quad\quad\quad\quad\quad\quad भये, भई \quad\quad बाढ़ा \quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad बाढ़े \quad\quad आ \quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad आये चन्दायनमें अकर्मक भूतकालिक क्रियाओंके अनन्त रूप मिलते हैं। यथा— परसि भा, आवा, बुलावा, पड़ावा, कहा, चढ़ा छाझौ, बाज्या, लग्गो, सीन्हो भई, प्रकटी, बानी, बखानी, पठाई, दीन्ह, कीन्ह, लीन्ह, भये, बैठे, बीठे, सुनाये, उठाये, गये भयो। उक्ति-व्यक्ति-प्रकरणमें भूतकालिक सकर्मक क्रियाओंके रूप हैं— कियेसि, दहेसि, पावेसि। चन्दायनमें इसके रूप हैं विवावा भरावा, हँकरावा। यथा— केक दधि दूध परघ विवावा सीप सिधोरा माँग भरावा पाहनराय बोर हँकरावा उक्ति-व्यक्ति-प्रकरणकी भविष्यत्कालिक अकर्मक क्रियाओंक रूप हैं— करिहौं, करिहसि, करिह, करिहति। चन्दायनम हमें निम्नलिखित ढंगके प्रयोग मिलते हैं:—

१. गोवर नगर वर्णन व लोरिक-चन्दा प्रथम दर्शन (कड़वक १-१००)

१८ जे लगि पड़े सो अमरंपरी जायी (जायेगा) परनइँ माँउ मँगर तिहूँ खायी (खायेंगे) जो जन जान कहहु संवारी (कहना) भविष्यत् कालकी सर्वनाम क्रियाका रूप उक्ति-व्यक्ति-प्रकरणमें एइव अथवा 'अवइ' मिलता है। यथा—पइब, करब, करव घरब। चन्दायनेमें इन रूपका प्रयोग हुआ है। यथा— जो तुम पर बहु बनिक चलाउब भैंसा बह मैं गोहन आउब कउव बार हम हारब पुम मैं पठउब भविष्यत् कालकी विधि क्रियाका रूप उक्ति-व्यक्ति-प्रकरणमें करेसु, पढेसु है। चन्दायनेम इस क्रियाका रूप है— पार्ये राग कें सिरजन माँ कैंप आपि सुनायहु होव देव उठान वीर बूझा मिस घर धायहु सिरजब भक हिय समायहु पाटम देस हूँ झोर न जायसि । उपर्युक्त उदाहरणोंसे स्पष्ट है कि चन्दायनेकी भाषा उक्ति-व्यक्ति-प्रकरणकी भाषासे सर्वथा भिन्न है। यदि उक्ति-व्यक्ति-प्रकरणकी भाषा अवधी है तो चन्दायने की भाषा अवधी नहीं है। चन्दायनेकी भाषाके प्रसङ्गमे श्याम मनोहर पाण्डेयने एक अन्य काव्य रोडा कृत राउल वेलकी चर्चा की है। यह खंडित काव्य एक शिलाफलकपर अंकित और प्रिंस आव वेल्स म्यूजियम बम्बईमें सुरक्षित है। इसका एक पाठ माताप्रसाद गुप्तने हिन्दी अनुशीलनमे प्रकाशित किया है और उसे ग्यारहवीं शताब्दीकी रचना बताया है और उसकी भाषाको दक्षिण कोसली कहा है।¹ श्याममनोहर पाण्डेयने इस आधारपर यह मत प्रकट किया है कि 'अब हम सरलतापूर्वक कह सकते हैं कि दक्षिण कोसलीमें जो अवधीका एक रूप है ग्यारहवीं शताब्दीमें काव्य- रचना हो रही थी।' हमें खेदके साथ कहना पडता है कि दोनों ही विद्वानोंके ये मत नितान्त निराधार हैं। राउल वेलको ग्यारहवीं शताब्दीकी रचना माननेका कोई आधार नहीं है। यह तेरहवीं शताब्दीके आसपासकी रचना है। उसकी भाषा दक्षिण कोसली है इसके लिए माताप्रसाद गुप्तने कोई प्रमाण उपस्थित नहीं किये हैं। इस काव्यमें विभिन्न प्रदेशोंकी स्त्रियोंका रूप वर्णन है और जिस प्रदेशकी स्त्रीका जिस रूपमे वर्णन है उसमें १ हिन्दी अनुशीलन वर्ष ११ अंक १-२ १९५ पृ. १२। २ मध्ययुगीन प्रेमाख्यान पृ. २६ ।

उस प्रदेशकी भाषाके कुछ शब्द-रूपों और क्रियाओका प्रयोग कविने किया है। इस प्रकार इस काव्यमं किसी एक भाषाका स्वरूप नहीं है। यदि इसी तथ्यको स्वीकार करें कि काव्यकी भाषा किसी एक प्रदेशकी भाषा है तो भी यह नहीं कहा जा सकता कि उसकी भाषा दक्षिण कोसली है। यह शिलालेख मध्य प्रदेश—धारसे प्राप्त हुआ है दक्षिण कोसलसे उसका किसी प्रकार कोई सम्बन्ध नहीं है। श्याममनोहर पाण्डेयकी यह धारणा कि दक्षिण कोसली अवधीका एक पूर्व रूप है, भाषा विज्ञान और इतिहास दोनों दृष्टिसे अन्धताका परिचायक और हास्या- स्पद है। प्राचीन इतिहासमें दक्षिण कोसल उस प्रदेशका नाम है जो आजकल छत्तीस- गढ़के नामसे अभिहित किया जाता है। छत्तीसगढ़ी भाषाका अवधीके साथ किसी प्रकारका नैकट्य है, यह कहना कठिन है। चन्दायनेकी भाषाको अवधी सिद्ध करनेके लिए राउल वेलकी भाषाको अवधीके पूर्व रूपका नमूना नहीं माना जा सकता। साथ ही यह तथ्य भी भुलाया नहीं जा सकता कि राउल वेलकी भाषाका चन्दायनेकी भाषाके साथ एक दृढ़का सादृश्य है। राउल वेलकी वर्तमान कालिक क्रियाएँ—भावइ, छड़ीवइ आदि चन्दायनेकी वर्तमानकालिक क्रिया आवइ, भावइ, सुहावइक अत्यन्त निकट हैं। यह इस बातका द्योतक है कि राउल वेल और चन्दायनेकी भाषाका निकट सम्बन्ध है और उनकी भाषा प्रादेशिक न होकर देशके विस्तृत भागमें प्रचलित भाषाका रूप है। चन्दायनेकी भाषाके व्याकरणकी गहराईसे अध्ययन किये जानेकी आवश्यकता है। तभी भाषाके सम्बन्धमें कुछ निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है। पर यह कार्य ग्रन्थके शुद्ध पाठ उपस्थित किये जानेपर ही सम्भव है। सामान्य रूपेण जो कुछ हम देख और समझ सके हैं उसके आधारपर हमारी धारणा है कि दाउदने अपने काव्यके लिए ऐसी भाषाको अपनाया था जो अपभ्रंश साहित्यकी शब्द-परम्परासे विकसित होकर व्यापक रूपसे देशके विस्तृत भू-भागम प्रचलित थी। यदि वह काव्य विस्तृत क्षेत्रमें बोली नहीं तो समझी अवश्य जाती थी। चन्दायनेमं संस्कृत शब्दोंका प्रयोग बहुत ही कम है उसमें प्राकृत आर अपभ्रंशसे देशज रूपमे ढले शब्दोंका ही बाहुल्य है। सुम्मरन विचक्खन आदि शब्दोंका प्रयोग इस काव्यमें अपभ्रंश परम्पराके अवशेषाके रूपमें देखा जा सकता है। चन्दायनेके शब्दोंका हिन्दीके अनेक प्राचीन काव्योंके साथ तुलनात्मक अध्ययनसे ऐसा ज्ञात होता है कि इस काव्यका उनके साथ निकट का सम्बन्ध है। इसका अथ यह नहीं कि कवि अरबी फारसीके प्रभावसे अछूता है। उसने इन भाषाओँ से भी शब्द लिये हैं पर वे ऐसे हैं जो सम्भवतः भारत-भूमिकी बोलचालकी भाषामें पूर्णतः खप गये थे। फिर भी कहीं-कहीं इन शब्दोंका प्रयोग विचित्र अथवा बेमेल प्रतीत होता है। यथा— मैना उत्तर सो पीर सुनावा ४१।१ (ब्राह्मणके लिए पीरका प्रयोग)। विहँसे साहम राज बराबर ४२१।१ (तीतरके लिए साहम [शोभन])।

१९ ईश्वर गोविन्द चन्द्रावत (कड़ाके लिये पारसी मिया गोविन्द) छन्द योजना सूफी कवियोंके हिन्दी प्रेमाख्यानक काव्योंके सम्बन्धमें हिन्दीके विद्वानोंका एक मत है कि उनकी रचना दोहे और चौपाइयोंमें हुई है। यही मत वासुदेवशरण अग्रवालने पदमावतके सम्बन्धमें व्यक्त किया है, किन्तु उनका ध्यान इस तथ्यकी ओर भी गया है कि जहाँ पदमावतकी चौपाई-छन्द मात्रा और तुक दोनों दृष्टियोंसे नियमित है, वहीं दोहोंके विषयमें यह बात खरी नहीं उतरती। दोहा एक मात्रिक छन्द है, जिसकी गणना अर्ध-सम जातिके छन्दोंमें की जाती है। इसके पहले और तीसरे चरणोंमें तेरह-तेरह मात्राएँ और दूसरे और चौथे चरणमें ग्यारह-ग्यारह मात्राएँ होती हैं। पहले और तीसरे पादकी तुक नहीं मिलती। दूसरे और चौथे चरणोंकी तुक मिलती है। किन्तु जायसीके सैकड़ों ऐसे दोहे हैं, जिनके पहले और तीसरे चरणोंमें यह नियम खरा नहीं उतरता। उनमें तेरहकी जगह सोलह मात्राएँ पायी जाती हैं। इसका उन्होंने यह कहकर समाधान कर लिया है कि दोहेके अनेक भेदोंमेंसे यह भी एक मान्य भेद हिन्दी काव्यमें उस समय स्वीकृत था जिसकी परम्परा मुल्ला दाऊदके समयसे जायसीके कालतक अवश्य विद्यमान थी।१ वस्तुतः यह बात नहीं है। हमारे साहित्यकारोंका ध्यान इस तथ्यकी ओर नहीं जा सका है कि सूफी कवियोंने अपनी रचना पद्धति अपभ्रंश काव्योंसे प्राप्त की है और उन्होंने अपने काव्योंका संयोजन कड़वकोंके रूपमें किया है। स्वयंभूने अपने स्वयम्भू छन्दसम्में कड़वककी जो परिभाषा दी है उसके अनुसार प्रत्येक कड़वकके शरीरमें आठ वमक और अन्तमें एक धत्ता होता है जिसे हुवा दुवई अथवा बडनिका कहते हैं। प्रत्येक वमकमें १६-१६ मात्राओंवाले दो पद होते हैं। हेमचन्द्रने अपने छन्दोनुशासनमें इसी तथ्यको तनिक भिन्न ढंगसे कहा है। उनके मतानुसार कड़वकके शरीरमें ४-४ पंक्तियोंके चार रुन्ध अर्थात् पंक्तियाँ होती हैं। सोलह मात्राओं वाले पदोंकी बात केवल सिद्धान्त रूप है; कवियोंने सोलह मात्राओं वाले पदोंके अतिरिक्त पन्द्रह मात्रा वाले पदोंका भी व्यवहार प्रचुर मात्रामें किया है। अतः कड़वकमें प्रयुक्त होने वाले पद साधारणतया तीन रूपमें पाये जाते हैं:— १. पध्दिका—सोलह मात्राओंका पद। इसमें अन्तिम चार मात्राओंका रूप लघु गुरु लघु (जगण) होता है। २. मदनक—सोलह मात्राओंका पद। इसमें चार मात्राएँ गुरु, लघु, लघु (भगण) होती हैं। कहीं-कहीं इसका दो गुरु रूप भी पाये जाते हैं। १. पदमावत, सं०सं०, पृ. २-३९, प्राक्कथन पृ० १२।

१७ ३ पारणक-पन्द्रह मात्राओंका पद । इसमे तीन मात्राएँ लघु होती हैं। कहीं कहीं लघु गुरु रूप भी मिलता है। आठ यमकों वाली बात भी केवल सिद्धान्त रूप है। उपलब्ध अपभ्रंश काव्यों के कड़बकोंमे ६ से लेकर २० २५ यमक तक पाये जाते हैं। ये इस बातके द्योतक हैं कि कवियोंने आठ यमकों वाला नियम कभी भी कठोरताके साथ पालन नहीं किया। घत्ताके द्विपदी, चतुष्पदी अथवा षट्पदी होनेका विधान है पर अधिकांश घत्ता चतुष्पदी ही पाये जाते हैं। घत्ताक प्रत्येक पद सात मात्राओं से लेकर सत्रह मात्राओंके हुआ करते थे। पदोंकी व्यवस्थाके अनुसार घत्ताके तीन रूप कहे गये हैं-(१) समसम (२) अर्धसम और (३) अन्तरसम। समसम घत्तामें चारों पदोंकी मात्राएँ समान होती हैं और मात्राओंकी संख्याके अनुसार सर्वसम घत्ताके नौ रूप कहे गये हैं। अर्धसम घत्तामें प्रथम दो पदोंकी मात्राएँ एक समान और अन्तिम दो पदोंकी मात्राएँ पहले दो पदोंसे भिन्न किन्तु परस्पर समान होती हैं। मात्राओंकी संख्या-गणनाके अनुसार अर्धसम घत्ताके ११ रूप बताये गये हैं। अन्तरसम घत्तामे प्रथम और तृतीय पदोंकी और द्वितीय और चतुर्थ पदोंकी मात्राएँ समान होती थीं और वह प्रघादबद्ध होता था। अन्तरसम घत्ताके भी मात्रा-भेदसे ११ रूप होते थे। इस प्रकार घत्ताके रूपमें १२१ छन्द रूपोंके प्रयोगका विधान अपभ्रंशके पिंगल शास्त्रोंमे पाया जाता है। इन तथ्याको यदि ध्यानमें रखकर चन्दायनेके छन्दोंकी परखकी जाय तो स्पष्ट ज्ञात होगा कि दाऊदने कड़बकका रूप अपनाया है और उसके शरीरमें पाँच यमक रखे हैं और अन्तमें एक घत्ता दिया है। उसके सभी यमक सोलह मात्राओं वाले नहीं हैं कुछ पन्द्रह मात्राओं वाले भी हैं। चन्दायनेमे प्राप्त दोनों प्रकारके यमकोंके कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं :- सोलह मात्राएँ (बदनक) १-कंक पार अस दूँह न आवइ । चाँद सौर मँह भरम दिखावइ ॥-१।३ × × × ओइ बान देखि पाँ कगहि । पाप केत चरनहिं कर नागहिं ॥-२३।४ २-सुन्दर सोंज अरे के हीरा। चहुँ दिशि बैठि विचारथ बीरा ॥-१५।१ पन्द्रह मात्राएँ (पारणक) करै कंक बिसरेकी अर्ना । और कंक पातर कर गुर्ना ॥-२।४ इसी प्रकार दाऊदने घत्ताके भी अनेक रूपोंका प्रयोग अपने काव्यमें किया है। उनके कुछ रूप इस प्रकार हैं :-

१८ १—११ ११ मात्राएँ— सेतु कसीस रोचन भार बांठ चर झांकें । सोवे बेचि घड़ाइ मोंविह मांग भरारें ॥ १३६ (२) ११, १२ मात्राएँ— जे बस लाय समान सरबस बरन के ठेवे । और पाँखि जे मारें हाथन ताँकें को कैवे ॥ १५४ (३) १२ ११ मात्राएँ— सिद्ध पुरुष गुन आगर देखि कुमाने झांकें । कहत सुजत अस आवैं, ह्वैवि फल देजी झांकें ॥ २ (४) १३, ११ मात्राएँ— बरष बरष बोर नौहह, गिलत न भावइ काउ । अन घन पाट पटोर भल, कौतुक भूका राउ ॥ ३१ (५) १६ ११ मात्राएँ— फाँड फिरोबी शाल सुरहुरी दैदै लोग बिसाह । हीर पटोर औ अरु कापड किन पावै सब व्याह ॥ २८ (६) १६ १२ मात्राएँ— गीत बाइ सुर कबित कहामी कथा कहहु गानबहार । मोर मन रँग रँगस सुख राख मूँखसि गर्व गिरहार ॥ ७२ (७) १७ ११ मात्राएँ— तिन संजोग बाजिर सर कोन्हों चौहठ मा परछाइ । राजा हियें व्यय सब बारे, तिक-तिक जरै बुझाइ ॥ ८५ इन व्यवस्थित मात्राओंवाले धत्ताके अतिरिक्त कुछ धत्ता ऐसे भी हैं जिनके चारों चरणोंकी मात्राओंमें भिन्नता है । यथा— ११ १३ १२ ११ मात्राएँ— सहस कराँ सुरजर्क रहे चाँदरा कित छाइ । घोरह कहाँ चाँद कै नई अमावस आइ ॥ १४० इस प्रकार मात्रा भेदसे युक्त धत्ताके अनेक रूप चन्दायणमें देखे जा सकते हैं जिनमें चरणोंकी मात्राओंमें परस्पर कोई साम्य नहीं है; पर उनका उल्लेख यहाँ जान बूझकर नहीं किया जा रहा है । उनपर ग्रन्थकी एक आध अन्य प्रतियोंके प्राप्त होने और उनके तुलनात्मक अध्ययन के पश्चात् ही विचार करना उचित होगा । जो सामग्री उपलब्ध है उससे यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि चन्दायणमें

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१२, ११ मात्रावाले पद्योका जिसे दोहा भी कहा जा सकता है बहुत ही कम प्रयोग हुआ है। उसमें १२, ११ और १६ ११ मात्रावाले पद्य प्रमुख हैं और अधिक मात्रामे मिलते हैं। रचना-व्यवस्था मुसलमान कवियों द्वारा रचित हिन्दी प्रेम-गाथा काव्योंके सम्बन्धमें रामचन्द्र शुक्लने इस बातकी ओर ध्यान आकृष्ट किया है कि इनकी रचना बिल्कुल भारतीय चरितकाव्योंकी सर्ग-बद्ध शैलीपर न होकर फारसी मसनवियोंके ढंगपर हुई है, जिनमें कथा सर्गों या अध्यायोंमें विस्तारके हिसाबसे विभक्त नहीं होती, बराबर चली जाती है, केवल स्थान-स्थानपर घटनाओं या प्रसंगोंका उल्लेख शीर्षक रूपमें रहता है। मसनवीके लिए साहित्यिक नियम तो केवल इतना ही समझा जाता है कि सारा काव्य एक ही मसनवी छन्दमें हो पर परम्परा के अनुसार उसमें कथारम्भके पहले ईश्वर स्तुति पैगम्बरकी वन्दना और उस समयके राजा (शाहेवक्त) की प्रशंसा होनी चाहिए। ये बातें पद्मावत, इन्द्रावत, मिरगावती इत्यादि सबमें पायी जाती है। तुर्की मसनवियोंके सम्बन्धमें गिब्बका कथन है कि मसनवीका आरम्भ अल्लाहकी वन्दनासे होता है। तदनन्तर उसमें रसूलकी वन्दना होती है और उनके मेराजका उल्लेख रहता है। पश्चात् समसामयिक शासक अथवा किसी अन्य महान व्यक्तिकी स्तुति की जाती है। और फिर पुस्तकके लिखनेके कारणपर भी प्रकाश डाला जाता है। लगभग यही बातें पारसी मसनवियोंमें भी पायी जाती हैं। निजामीने अपने लैला मजनूँमें हम्द शीर्षकसे ईश्वरका गुणगान किया है और फिर नातके अन्तर्गत रसूलकी प्रशंसा है और उनके मेराजका उल्लेख है। तदनन्तर कविने पुस्तक लिखनेके कारणपर प्रकाश डाला है और अपने पीरकी चर्चाकी है। अन्तमें अपने पुत्रको नसीहत दी है। खुसरो-शीरींमें भी निजामीने क्रमशः ईश्वरकी प्रशंसा रसूलकी नात शाहेवक्तको दुआ और पुस्तक लिखनेका कारण दिया है। इसी प्रकार अमीर खुसरोने भी खुदाकी तारीफ रसूलकी नात मेराजके बयान शेख निजामुद्दीनके गुणगान शाहेवक्त—अलाउद्दीन खिलजीकी प्रशंसा कर तथा पुस्तक लिखनेका कारण बताकर अपनी पुस्तक मजनूँ-लैलाका आरम्भ किया है। खुसरोके शीरीं फरहादमें भी यही बातें पायी जाती है। जामीने यूसुफ जुलेखा और फैजीने नल-दमनका भी आरम्भ इसी प्रकार किया है। फिरदौसीके शाहनामेंमें भी ये सभी बातें उपलब्ध हैं। मुसलमान कवियों द्वारा रचित हिन्दी प्रेमाख्यानक काव्योंका भी प्रारम्भ उपर्युक्त मसनवियोंके समान ही हुआ है। दाउदने चन्दायनमें ईश्वर और पैगम्बर की वन्दनाकर चार यारोंका उल्लेख किया है, फिर शाहेवक्त—फीरोजशाह तुगलककी प्रशंसाकर अपने गुरुकी वन्दनाकी है और अपने आश्रयदाताका वर्णनकर ग्रन्थ रचनाक

सम्बन्धमें कहा है। कुतुबनकी मिरगावतके जो अंश उपलब्ध हैं, उनसे ज्ञात होता है कि उसका भी प्रारम्भ ईश्वरकी वन्दनासे हुआ है। मंझनने भी मधु-मालतीमें हम्द, नात, रसूलके चार यारों शाहेवक्तकी स्तुति करते हुए काव्यका रचना-काल तथा अपना संक्षिप्त परिचय दिया है। मलिक मुहम्मद जायसी आदि परवर्ती कवियोंने भी इसी परम्पराको ग्रहण किया है। अरबी-फारसीके मसनवियों और हिन्दी प्रेमाख्यानक काव्योंकी ये समानताएँ रामचन्द्र शुक्लके कथनको पुष्ट करती हुई यह कहनेको विवश करती हैं कि मुसल- मान कवियोंने अपने काव्योंमें इस परम्पराको अरबी-फारसी मसनवियोंको देखकर ही अपनाया होगा। पर साथ ही इस बातकी भी उपेक्षा नहीं की जा सकती कि ये बातें केवल अरबी-फारसी मसनवियोंकी परम्परामें सीमित नहीं हैं। भारतीय काव्य-परम्परा भी इन बातोंसे भली प्रकार परिचित रहा है। अरबी-फारसी मसनवियों और हिन्दी प्रेमाख्यानक काव्योंकी लगभग वे सभी बातें जैन अपभ्रंश-काव्यमें पायी जाती हैं। प्रायः सभी जैन अपभ्रंश काव्योंका आरम्भ 'जिन'की वन्दनासे होता है। किसी- किसीम जिन-वन्दनाके बाद सरस्वतीकी भी वन्दना पायी जाती है। तदनन्तर उनमें समकालिक शासकका उल्लेख, कविका आत्म-परिचय और आश्रयदाताकी चर्चा है और रचनाका कारण बताया गया है। उदाहरण स्वरूप पुष्पदन्त कृत महापुराण, स्वयंभू कृत पउमचरित और श्रीधर कृत पासनाहचरिउ देखा जा सकता है। हिन्दी प्रेमाख्यानक काव्योंके सम्बन्धमें फारसी मसनवियोंकी जिस दूसरी विशेषताकी ओर लोगोंका ध्यान गया है, वह है उनमें पायी जानेवाली प्रस्तोरी सूक्तियों। निजामी, अमीर खुसरो, जामी, फैजी सभीने अपनी मसनवियोंमें प्रसङ्ग के अनुकूल शीर्षक दिये हैं। ठीक उसी ढंगके शीर्षक चन्दायमकी सभी फारसी प्रतियोंमें प्रत्येक कड़वकके ऊपर दिये गये हैं और अन्य काव्योंकी प्रतियोंमें भी पाये जाते हैं। अतः इसमें भी इन कवियोंका फारसी मसनवियोंका अनुकरण परिलक्षित होता है। पर इसी ढंगके शीर्षक अपभ्रंश काव्योंमें भी पाये जाते हैं। संस्कृत साहित्य शास्त्रके अनुसार किसी महाकाव्यमें कमसे कम आठ सर्ग होने चाहिए जो न तो बहुत छोटे हों और न बहुत बड़े। इस प्रकारका सर्गबन्ध हिन्दी प्रेमाख्यानक काव्योंमें न होनेसे यह मान लिया गया है कि ये फारसी मसनवियोंके अनुकरणपर रचे गये हैं, जहाँ सर्ग जैसा कोई विभाजन नहीं मिलता। किन्तु इस धारणामें भी कोई विशेष बल नहीं है। यह बात न भूलनी चाहिए कि अपभ्रंशमें सर्गहीन काव्योंकी कमी नहीं है। हिन्दी प्रेमाख्यानक काव्योंका रूप उन काव्योंसे किसी भी रूपमें भिन्न नहीं है। हिन्दी प्रेमाख्यानक काव्योंके कथा-वस्तु सचमुच भारतीय हैं और वे भारतीय कथानक रूढ़ियोंपर ही आधारित हैं। उनमें कहीं भी अरबी या फारसी प्रभाव नहीं मिलता। ऐसी स्थितिमें यह समझना कठिन है कि इन कवियोंने अपने काव्यके बाह्य रूपके लिए भारतीय काव्योंसे इतर कहींसे प्रेरणा प्राप्तकी।