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चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

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अंतमें जब संवरू पुछपरसे जाने लगा तो मीमल बोला-मैंने पुल कमजोरोंके लिए बनाया था, वीरोंके लिए नहीं। यदि आपमें बल हो तो उछलकर सोनपीको पारकर जाइये। तभी मुझे विश्वास होगा कि आप अगोरियामें जाकर विवाह करेंगे और लौटकर मेरा सेवा देंगे। इतना सुनना था कि संवरू पुछपरसे उतर गया और पांच कदम पीछे हटकर उसने छलांग मारी और सोनपीको पारकर गया। पार पहुँचकर उसने अपने पैरके अँगूठेसे सारी नावोंको सोनपीमें डूबो दिया। फिर मीमल बोला-मेरी शक्ति देख ली। मीमल हाथ जोड़कर बोला-आपकी शक्ति देख ली। आपने तो मेरी सारी नावोंको ही डुबा दिया। मेरे लिए यही एक सहारा था अब तो मेरे बाल-बच्चे भूखों मरेंगे। मैं आपसे सेवा नहीं चाहता। आप केवल हमारी नावें निकाल दें। यह सुनकर संवरूने अपने अगूंठेके बीचमें नावोंकी रस्सी पकड़कर खींचा और नावें फिर ऊपर आ गयीं। बाराते आगे चली। अगोरियाकी सीमा पर पहुँचकर बारात रुक गयी। संवरू और मिताने बाजा वालोंको ऐसा बाजा बजानेका आदेश दिया कि सारे अगोरियामें खबर हो जाय कि विवाह के लिए बारात सजाकर अहीर आ पहुँचा है। इतना सुनना था कि बाजा वालोंने बाजा बजाना शुरू किया। बाजेकी आवाज जब मरिचा बनमें सुनाई पड़ी तो महराके चरवाहेने जो वहाँ सोलह सौ गायोंको चरा रहा था अपने साथी फुरदसे कहा—अमुक दिन मेरे मालिकके दरवाजे पर बारात आनेवाली थी। गाँवकी सीमा पर बाजेका झंकार हो रहा है। चलो देखा जाय कि बारात मालिकके यहाँ ही आयी है या किसी अन्यके यहाँ। वह बारातके निकट आ पहुँचा और घूम-घूमकर बारात देखने लगा। देखते देखते वह वहाँ पहुँचा जहाँ संवरू मिता और लोरिक बैठे हुए थे। वह उनसे पूछने लगा-बारात कहाँसे आ रही है और विवाह करने कहाँ जायेगी। जब उसे मालूम हुआ कि बारात उसीके मालिकके यहाँ आयी है तो वह आश्चर्यचकित रह गया। वह तत्काल महराके पास पहुँचा। शिवचन्द और महरा दोनों बैठे हुए थे। उनसे बोला-मजरीका तिलक लगाकर जब मामा गौरासे लौटे तो कह रहे थे कि गांवके लोग उनके विरुद्ध हैं उनके साथ बारातमें कोई न आयेगा। कुल तीन ही बाराती आयेंगे। लेकिन बारात तो ऐसी आयी है जिसका बयान नहीं। आपने तो उनके अन्न पानीकी कोई व्यवस्था की ही नहीं है। यह सुनकर पद्मा तो हर्षित हो उठी कि मेरी बेटी मजरीका भाग्य धन्य है। लेकिन महरा मनिवाद सुनकर क्रुद्ध हुआ और शिवचन्द से बोला—हमारे साथ धोखे बाजीकी गयी है। कहा आपसमें केवल तीन ही आदमी आयेंगे और आये हैं इतनी बड़ी सेना लेकर उन्होंने मेरी प्रतिष्ठाका तनिक भी ध्यान नहीं रखा। वह मेरे हितैषी नहीं शत्रु हैं। अब मैं कहाँसे प्रबन्ध करूँ, कैसे इतने लोगोंके लिए खाना जुटाऊँ? उन्होंने जिस तरह हमारे साथ धोखा किया है और उसी तरह हम भी उनके साथ