चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
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पण्डितजी बोले—उस दिन लग्न देखनेमें मुझसे गड़बड़ी हो गयी। आजसे सात दिन तक रात दिन भद्रा है। तब तक आप बारात यहीं ठहराइये। इतना सुनकर सँवरू कहा—दूर देशसे बारात यहाँ आयी है। पासमें जो रसद वगैरह था, सब समाप्त हो गया है। यदि आपलोग ऐसी व्यवस्था कर दें कि हमारी बारात भूखों न मरे तो सात दिन क्या, हम सात महीने ठहर सकते हैं। शिवचन्दने कहा—हम बारातकी सारी व्यवस्था कर देंगे। किन्तु हमारे राज्य का आदेश है कि सब बूढ़ोंको निकाल बाहर किया जाय। आप उन्हें नहीं निकालते तो महराकी बड़ी बेइज्जती होगी। यह सुनकर सँवरू अत्यन्त दुखी हुआ। बोला—हमारी बारातमें सब तो ऐसे ही जवान हैं जिनकी अभी रेल उठ रही है। बूढ़ोंमें अकेले काका ही हैं। उनको हम बारात से अलग कर देंगे। और उसने उन्हें एक टोकरीमें बन्द कर दिया। यह बताकर कि बारातमें कोई बूढ़ा नहीं है शिवचन्द घर वापस आ गये। प्रत्येक आदमीके लिए एक मन चावल एक मन आटा, एक बकरा और एक बोझ उरद और एक मट्टी शराब भिजवाकर उन्हों सँवरूको लिखा—हम जो रसद भिजवा रहे हैं वह केवल चौदह वक्तके लिए है। यह इसीके अन्दर खत्म हो जानी चाहिए। यदि कुछ बच रहा तो आपको सीधे गौराका रास्ता नापना होगा। हम बेटीसे ब्याह नहीं करेंगे। पत्र पढ़कर सँवरू सोचमें पड़ गया। टोकरीमें बन्द काकासे जाकर कहा— महराकी यह शरारत हमसे सही नहीं जाती। रसदका ढेर लगा दिया है और कहता है कि रसद समाप्त नहीं होगी तो हम ब्याह नहीं करेंगे। बताइये कि किस प्रकार रसद समाप्त हो। यह सुनकर काकाने कहा—अहीर के लड़के होकर भी अक्ल नहीं है। सारी बारात छप्पन हजार है। एक बार दस मन आटा सनवा दो और एक-एक लोई देने लगो। कोई कच्चा खायेगा कोई पकाकर खायेगा मालूम भी न पड़ेगा और सभी भूखों रह जायेंगे। इसी प्रकार चावलका भी बँटवाओ। इस प्रकार दिन-रात रसद बँटवाते जाओ। कभी किसीका पेट नहीं भरेगा और रसद भी दस कूलम ही समाप्त हो जायगा। इसी तरह तुम शराबकी मट्ठीकी भी व्यवस्था करो। दस-बीस खस्सी (बकरा) एक साथ कटवाओ टुकड़े टुकड़े सबको बाट दो। कोई कच्चा खायेगा कोई पकाक। इसी प्रकार उरदको भी बाटो। जब सब रसद समाप्त हो जाये तो महराका और रसद भेजनेके लिए फिर भेजो। सँवरूने इसी प्रकार रसद बाटना शुरू किया। इतनेमें महराका दूसरा पत्र आया। सबने उसे पढ़ा और काकाके पास फिर गया और बोला—महरा हमें बेकार परेशान करना चाहता है। इस बार उसने लिख भेजा है कि हमारे पास कोयलेकी रस्सी भेज दो ताकि हम मंडप बांधकर तैयार करें। हमने तो कभी कोयलेकी रस्सी सुनी ही नहीं। सुनकर काकाने कहा—जाओ दस आदमी भेजकर सोनपी नदीके किनारेसे ६४