छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 966, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 966
( १६३ )
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | ख० | मं० | पृ० |
|---|---|---|---|---|
| पृथिवी हिङ्कारोऽन्तरिक्षम् | २ | १७ | १ | १९४ |
| प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत् | २ | २३ | २ | २३० |
| ” ” | ४ | १७ | १ | ४३४ |
| प्रवृत्तोऽश्वतरीरथः | ५ | १३ | २ | ५५० |
| प्रस्तोतर्या देवता | १ | १० | १ | १२८ |
| प्राचीनशाल औपमन्यवः | ५ | ११ | १ | ५३६ |
| प्राण इति होवाच | १ | ११ | ५ | १३३ |
| प्राण एव ब्रह्मणश्चतुर्थः | ३ | १८ | ४ | ३४२ |
| प्राणे तृप्यति चक्षुस्तृप्यति | ५ | १९ | २ | ५६४ |
| प्राणेषु पञ्चविधं परोवरीयः | २ | ७ | १ | १५७ |
| प्राणो वा आशायाः | ७ | १५ | १ | ७६७ |
| प्राणो ह्येवैतानि सर्वाणि | ७ | १५ | ४ | ७७२ |
| प्राप ह्याचार्यकुलम् | ४ | ९ | १ | ३९७ |
| बलं वाव विज्ञानाद्भूयः | ७ | ८ | १ | ७४५ |
| ब्रह्मणः सोम्य ते पादम् | ४ | ६ | ३ | ३९० |
| ” ” | ४ | ७ | ३ | ३९२ |
| ” ” | ४ | ८ | ३ | ३९५ |
| ब्रह्मणश्च ते पादं ब्रवाणीति | ४ | ५ | २ | ३८७ |
| ब्रह्मवादिनो वदन्ति | २ | २४ | १ | २३३ |
| ब्रह्मविदिव वै सोम्य | ४ | ९ | २ | ३९७ |
| भगव इति ह प्रतिशुश्राव | ४ | १४ | २ | ४१७ |
| भगवाँस्त्वेव मे | १ | ११ | ३ | १३२ |
| भवन्ति हास्य पशवः | २ | ६ | २ | १६६ |
| मघवन्मर्त्यं वा इदम् | ८ | १२ | ९०६ | |
| मटचीहतेषु कुरुष्वाटिक्या | १ | १० | १ | १२२ |
| मद्गुष्टे पादं वक्तेति | ४ | ८ | १ | ३९४ |
| मनो ब्रह्मेत्युपासीत | ३ | १८ | १ | ३३८ |
| मनोमयः प्राणशरीरः | ३ | १४ | २ | ३०६ |
| मनो वाव वाचो भूयः | ७ | ३ | १ | ७२४ |
| मनो हिङ्कारो वाक् | २ | ११ | १ | १८७ |
| मनो होच्चक्राम | ५ | १ | ११ | ४५० |
| मानवो ब्रह्मैवैक ऋत्विक् | ४ | १७ | १० | ४४० |