चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 349, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३३१ दुन्दुभि, वाकार, लोहपृष्ठ, कुलिङ्ग, कबूतर, तोता, चारक, चिरिटा, ककुयष्टिक, सारिका, कलविंक, चटक, अंगारचूड़क ( बुलबुल ), पारावत, पानविक ये सब 'प्रतुद' पक्षी हैं ॥ ५०-५२ ॥ प्रसह्य भक्षयन्तीति प्रसह्यास्तेन संज्ञिताः ॥ ५३ ॥ भूशया बिलवासित्वादानूपाऽनूपसंश्रयात् । जले निवासाज्जलजा जलेचर्याज्जलेचराः ॥ ५४ ॥ स्थलजा जाङ्गलाः प्रोक्ता मृगा जाङ्गलचारिणः । विकीर्य विष्किराश्चैव प्रतुद्य प्रतुदाः स्मृताः ॥ ५५ ॥ योनिरष्टविधा त्वेषां मांसानां परिकीर्तिता । गाय, घोड़ा, बाघ आदि प्राणी भक्ष्य दृष्टि से एकदम जोर से खाने पर गिरते हैं, इसलिये इनको 'प्रसह' कहते हैं । सांप, मेंढक आदि बिल में रहते हैं, इस- लिये इनको 'विलेशय' कहते हैं। हाथी भैंसा आदि प्राणी पानी के आश्रय से रहते हैं, इसलिये इनको 'आनूप' कहते हैं । पानी में रहने से 'जलज', जल में चरने-विचरने से 'जलचर', स्थलभूमि पर चलने वाले जंगल में फिरने वाले पशुओं को 'जांगल' कहते हैं । तीतर आदि पक्षी अपने खाद्य पदार्थ को बिखेर कर खाते हैं, इसलिये 'विष्किर' और तोता आदि पक्षी अपने खाद्य पदार्थ को चोंच से तोड़कर खाते हैं इस लिये 'प्रतुद' कहलाते हैं। इस प्रकार से मांस के आठ उत्पत्तिस्थान हैं ॥ ५३-५५ ॥ प्रसह्या भूशयानूपवारिजा वारिचारिणः ॥ ५६ ॥ गुरूष्ण-स्निग्ध-मधुरा बलोपचयवर्धनाः । वृष्याः परं वातहराः कफपित्ताभिवर्धिनः ॥ ५७ ॥ हिता व्यायामनित्येभ्यो नरा दीप्ताग्नयश्च ये । प्रसह्यानां विशेषेण मांसं मांसाशिनां भिषक ॥ ५८ ॥ जीर्णार्शो-ग्रहणी-दोष-शोषार्तानां प्रयोजयेत् । लावाद्यो वैष्किरो वर्गः प्रतुदा जाङ्गला मृगाः ॥ ५६ ॥ लघवः शीतमधुराः सकषाया हिता नृणाम् । पित्तोत्तरे वातमध्ये सन्निपाते कफानुगे ॥ ६० ॥ विष्किरा वर्तकाद्यास्तु प्रसह्याल्पान्तरा गुणैः । नातिशीतं गुरु-स्निग्धं मांसमाजमदोषलम् ॥ ६१ ॥ शरीर-धातु-सामान्यादनभिष्यन्दि बृंहणम् । ग्राही मधुरशीतत्त्वाद् गुरु बृंहणमाविकम् ॥ ६२ ॥ तौ ह्यजाविके मिश्रगोचरत्वादनिश्छिते ।