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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

अ० ८] विमानस्थानम् ६११

अ० ८] विमानस्थानम् ६११ (सौँफ का भेद), लाल कोकिलाक्ष, श्रावणी (रक्तमुण्डेरी), महाश्रावणी (श्वेतमुण्डेरी), अलंबुषा, सहदेवी, पीतपुष्पा (बला), विश्वदेवा लालफूल- वाली, दण्डोत्पला, शुक्ला, निशोथ, बला, अतिबला, विदारी, क्षीरविदारी, क्षुद्रसहा (ऐन्द्री), लालकुरवक, श्वेत कुरवक, भरासङ्गा, कुजकतरणी, श्वेत कुरवक, ऋष्यगन्धा, असगन्ध, संहवां (जन्तुकारी), गोलरू, बन्दाक, शतावरी, सौँफ, महुए का भेद, मुलहठी, मधूलिका, किसमिस, खजूर, फालसा, कौँच, कमल के बीज, कसेरू, राजकसेरू, पियाल, कतक, गम्भारी, शीतला, नील झिण्टी, ताल और खजूर, मुस्तका, गभा, ईक्षुबालिका, दर्भ, कुश, काश, लाल चावल, गुन्द्रा (शरभेद), इत्कट, शरमूल, राज सरसों, (पीली सरसों) ऋष्यप्रोक्ता वा शतावरी भेद कपिकच्छू (कौंचू), दारदा, (साल) भारद्वाजी (जंगली कपास), जंगली खीरा, शतावरी भेद, (हंसपादिका) हंस के पांव के समान आकार की लता, काकनासा, पेटिका, क्षीरलता, छोटी इलायची, अनन्त मूल, यष्टिमधु का भेद कपोतवल्ली (ब्राह्मी भेद) और सोमलता, गोपवल्ली और मधुवल्ली। एषामेवंविधानामन्येषां च मधुरवर्ग-परिसंख्यातानामौषधद्रव्याणां च्छेद्यानि खण्डशश्छेद्यित्वा भेद्यानि चाणुशो भेदयित्वा प्रक्षाल्य पानी- येन सुप्राक्षालितायां स्थाल्यां समावाप्य पयसाऽर्धोदकेनाभ्यासिच्य साधयेद्दर्ध्या सततमुपघट्टयन, तदुपयुक्तभूयिष्ठेऽम्भसि गतरसेष्वौष- धेषु पयसि चानुपदग्धे स्थालीमपहृत्य सुपरिपूतं पयः सुखोष्णं घृत-तैल- वसा-मज्ज-लवण-फाणितोपहितं बस्तिं वातविकारिणे विधिज्ञो विधि- वद्दद्यात्, शीतं तु मधुसर्पिर्भ्यामुपसंसृज्य पित्तविकारिणे विधिवद्द- द्यादिति मधुरस्कन्धः ॥ १३६ ॥ इन अथवा अन्य इस प्रकार के मधुरवर्ग में पठित औषध द्रव्यों में जो द्रव्य छेदन के योग्य हों, उनके टुकड़े २ करके और जो फोड़ने के योग्य हों, उनको फोड़कर छोटे २ टुकड़े बनाकर पानी से भली प्रकार धोकर थाली में रखना चाहिये। डेग ताम्बा, लोहा या मिट्टी की लेनी चाहिये। डेग को नीचे से लेप देना चाहिये। इस डेग में दूध में आधा पानी मिलाकर डाल देना चाहिये। इस डेग को अग्नि पर रख कर कोमल आंच से धीरे धीरे पकाना चाहिये। पकाते समय कड़छी से निरन्तर चलाते जाना चाहिये। जिस समय पानी लगभग सूख जाये, औषधियों में से रस निकल आये, दूध का जलना आरम्भ न हो, तब डेग को उतार कर वस्त्र से छान लेना चाहिये। फिर इस दूध को कुछ गरम रखकर घी, तेल आदि चर्बी, मज्जा का मेल आदि मिला-कर

६१२ चरकसंहिता [ अ० ८ वातरोगी को विधिपूर्वक आस्थापन नामक बस्ति दे। दूध के ठण्डा होने पर घी या मधु मिला कर पित्त विकार के रोगी को विधिपूर्वक बस्ति दे। यह मधुर- स्कन्ध हुआ ॥ १३६ ॥ आम्राम्रातक-लकुच-करमर्द-वृक्षाम्लाम्लवेतस-कुवल बदर-दाडिम- मातुलुङ्ग-गण्डीरामलक-नन्दीतक-शीतक-तिन्तिडीक-दन्तशठैरावतक- कोषास्र-धन्वनानां फलानि, पत्राणि चाम्रातकाश्मन्तक-चाङ्गेरीणां चतु- र्विधानां चाम्लिकानां द्वयोः कोल्योश्चाम-शुष्कयोर्द्वयोश्चैव शुष्काम्लिक- योर्ग्राम्यारण्ययोः, वासव-द्रव्याणि च सुरा-सौवीर-तुषोदक-मैरेय-मेदक- मदिरा-मधु-सीधु-शुक्त-दधि-दधिमण्डोदश्विद्धान्याम्लादीनि च । अम्‍लद्रव्यस्कन्ध- आम, आमड़ा, बड़हल (डहु), करौंदा, इमली, अम्ल वेतस, कुवल और बदर (बेर के भेद), अनार, बिजौर, गण्डीर (समष्ठिल, काकाम्र) आंवला नन्दीतक (तून), जललोटक (कालमेघ), निम्बु, ऐरावतक (नारंगी), तिन्तिडीक (अमली), कच्चा आम और धन्वन (धामन), दन्तशठ (कैथ) के फल, आम्रातक, अश्मन्तक (कचनार का भेद) और चांगेरी (शाक) इनके पत्ते, चारों प्रकार का इमली, शुष्क आम, दोनों प्रकार के बेर, चार प्रकार की इमली, (ग्राम्य और जंगली शुष्क और आर्द्र भेद से चार प्रकार की) इनके पत्ते, आसव द्रव्य, सुरा, सौवीरक, तुषोदक, मेदक, मदिरा, मधु, सीधु, शुक्त, दही, मस्तु, उदश्वित्, धान्याम्ल आदि । एषामेवंविधानां चान्येषां चाम्ल-वर्गे-परिसंख्यातानामौषधद्रव्याणां छेद्यानि खण्डशश्छेदयित्वा भेद्यानि चाणुशो भेदयित्वा द्रवैः स्थिराण्य- वसिच्य साधयित्वोपसंस्कृत्य यथावत्तैल-वसा-मधु-मज्ज-लवण-फाणि- तोपहितं सुखोष्णं बस्तिं वात-विकारिणे विधिज्ञो विधिवद्दद्यादित्य- म्लस्कन्धः ॥ १३७ ॥ अम्लस्कन्ध में गिने इन और इन के समान अन्य औषध द्रव्यों के टुकड़े करके, छोटा छोटा चूर्ण बना कर सुरा-सौवीर आदि द्रवों से सिंचन करके डेग में रख कर पूर्व की भांति सिद्ध करना चाहिये । सिद्ध होने पर इसमें तेल, वसा, मज्जा, नमक, राब मिलाकर थोड़ी गरम अवस्था में वातरोगी को विधिपूर्वक आस्थापन बस्ति देनी चाहिये । यह अम्लस्कन्ध है ॥१३७॥ सैन्धव-सौवर्चल-कालविङ्ग-पाक्यान्प-कूप्य-बालुकैल-मौलक-सामुद्र- रोमकौद्भिदौषर-पाटेयक-पांशुजानीत्येवंप्रकाराणि चान्यानि लवण-वर्ग- परिसंख्यातानि, एतान्यम्लोपहितान्युष्णोदकोपहितानि वा स्नेहवन्ति सुखोष्णं बस्तिं वात-विकारिणे विधिज्ञो विधिवद्दद्यादिति लवणस्कन्धः ॥

अ० ८ ] विमानस्थानम् ६१३

अ० ८ ] विमानस्थानम् ६१३ लवणस्कन्ध—सैन्धव, सौवर्चल, कालविङ्, पाक्य (पाक द्वारा तैयार किया) कूप्य (कुपी के आकार में बना ), बालुकैल ( रेत में से बना ), मौलक ( मूखों से बना ), सामुद्रिक, रोमक ( साम्भर प्रदेश में उत्पन्न नमक ), औषर ( ऊषर भूमि में उत्पन्न), पांशुज (धूली से उत्पन्न ) पाटेयक (लवण भेद ) इस प्रकार के तथा अन्य लवण वर्ग में गिने हुए अम्लवर्ग से मिश्रित अथवा गरम पानी से मिश्रित घृत तैल आदि स्नेहों से बनी सुखोष्ण बस्ति को बात- रोगी के लिये विधिपूर्वक देना चाहिये । यह लवणस्कन्ध है ॥१३८॥ पिप्पली-पिप्पलीमूल-हस्तिपिप्पली-चव्य-चित्रक-शृङ्गवेर-मरिचाज- मोदार्द्रक-विडङ्ग-कुस्तुम्बुरु-पीलु-तेजोवत्यैला-कुष्ठ-भल्लातकास्थि-हिंगु-कि- लिम-मूलक-सर्षप-लशुन-करञ्ज-शिग्रुक-खरपुष्प-भूस्तृण-सुमुख-सुरस-कुठे- रकार्जक-गण्डीर-कालमालक-पर्णास-क्षवक-फणिज्जक-क्षार-मूत्र-पित्ताना- मेवंविधानां चान्येषां कटुक-वर्ग-परिसंख्यातानामौषधद्रव्याणां छेद्यानि खण्डशश्छेद्यित्वा भेद्यानि चाणुशो भेदयित्वा गोमूत्रेण सह साधयि- त्वोपसंहृत्य यथावन्मधु-तैल-लवणोपहितं सुखोष्णं बस्ति श्लेष्मविका- रिणे विधिज्ञो विधिवद्दद्यादिति कटुकस्कन्धः ॥ १३६ ॥ कटुक स्कन्ध—पिप्पली, पिप्पलीमूल, गजपिप्पली, चविका, चीता, सोंठ, मरिच, अजवायन, आर्द्रक (अदरख), वायविडंग, हरा धनिया, पीलु, तेजवला, इलायची, कूठ, भिलावा, हींग, देवदारु, मूली, सरसों, लहसुन, करंज, शोभाञ्जन, मीठा सहजन, खुरासानी, अजवायन, ( खरपुष्पा, वन तुलसी ), कत्तृण, सुमुख, सुरस, अर्जक, काण्डीर, कालमालक, पर्णास, क्षवक, फणिज्जक, ( ये सब तुलसी के भेद हैं, ) क्षार, मूत्र और पित्त । ये तथा अन्य कटुवर्ग में गिने हुए द्रव्यों को कूट पीस कर गोमूत्र के साथ पका कर, मधु, तेल और लवण से मिश्रित करके सुखोष्ण बस्ति को श्लेष्म रोगी के लिये विधिपूर्वक देना चाहिये । यह कटुकस्कन्ध है । चन्दन-नलद-कृतमाल-नक्तमाल-निम्ब-तुम्बुरुं-कुटज-हरिद्रा-दारुह- रिद्रा-मुस्त-मूर्वाकिरात-तिक्तक-कटुरोहिणी-त्रायमाणा-कारवेल्लिका-करीर- करवीर-केवुक-कठिल्लक-वृष-मण्डूकपर्णी-कर्कोटक-वार्ताकु-कर्कश-काक- गाची-काकोदुम्बरिका-सुषव्यतिविषा-पटोल-कुलक-पाठा-गुडूची वेत्राग्र- वेतस-विकङ्कत-बकुल-सोमवल्क-सप्तपर्ण-सुमनार्कविल्गुज-वचा-तगराग- रु-वालकोशीराणामेवंविधानां चान्येषां तिक्तवर्गपरिसंख्यातानामौषधद्र- व्याणां छेद्यानि खण्डशश्छेद्यित्वा भेद्यानि चाणुशो भेदयित्वा प्रक्षाल्य पानीयेनाभ्यासिच्य साधयित्वोपसंहृत्य यथोक्तमधुतैललवणोपहितं

६१४ चरकसंहिता [ अ० ८ सुखोष्णं बस्तिं श्लेष्मविकारिणे विधिवद्दद्यात् । शीतं तु मधुसर्पिर्भ्यामुपसं- स्कृत्य पित्तविकारिणे विधिज्ञो विधिवद्दद्यादिति तिक्तस्कन्धः ॥१४०॥ तिक्तस्कन्ध- चन्दन, उशीर, कृतमाल, नाटा करञ्ज, निम्ब, तुम्बरु, कूड़ा, हल्दी, दारुहल्दी, मुस्ता, मूर्वा, चिरायता, कुटकी, त्रायमाणा, करीर, करवीर, पत्तूर, कर्कटक ( करेला ), वांशा, मण्डूकपर्णी, कांकरोला, बैंगन, परवल, काको दुम्बर, मकोय, करेला, सुषवी ( जंगली करेला ), अतीस, परवल, कुणक ( पर- वल का भेद ), पाठा, गिलोय, बेंत का अग्रभाग, अम्लवेतस, कुंच, मौलसरी, श्वेत खदिर, सप्तपर्ण, चमेली, आक, बाबची, त्रिफला, तगर, अगरु, उशीर, इन द्रव्यों को वा तिक्त वर्ग में गिने हुए अन्य औषध द्रव्यों को कूट पीस कर पानी से धो कर पानी के साथ पूर्ववत् विधि से पाक करना चाहिये । सिद्ध होने पर इसमें मधु, तेल और नमक मिलाकर हलके गरमबस्ति को विधिपूर्वक श्लेष्म रोगी के लिये देना चाहिये । शीतल होने पर मधु और घी मिला कर पित्त रोगी को देनी चाहिये । यह तिक्तस्कन्ध है ॥ १४० ॥ प्रियङ्गवनन्ताम्रास्थ्यम्बष्ठाकी-कट्वङ्ग-लोध्र- मोचरस-समङ्गा-धातकी पुष्प-पद्म-पद्मकेशर-जम्ब्वाम्रत्वक्प्लक्ष-वटक-पीतनोदुम्बराश्वत्थ-भल्लात- काश्मन्तक-शिरीष-पुष्प-शिंशपा-सोमवल्क-तिन्दुक-पियाल-बदर- खदिर- सप्तपर्णाश्वकर्ण-स्यन्दनार्जुनासनानि मेदैडवालुक-परिपेलव-कदम्ब-श- ल्लकी-जिङ्गिनी-काश-कशेरुक-राजकशेरुक-कट्फल-वंश-पद्मकाशोक-शाल धव-सर्ज-भूर्ज-शण-खरपुष्पा-पुरशमी-माची-कवरक-तुङ्गाजकर्णाश्वकर्ण- स्फूर्जक-विभीतका-कुम्भी-पुष्कर-बीज-बिस-मृणाल-ताल-खर्जूर-तरूणामे- वंविधानां चान्येषां कषायवर्गपरिसंख्यातानामौषधद्रव्याणां छेद्यानि खण्डशश्छेदयित्वा भेद्यानि चाणुशो भेदयित्वा प्रक्षाल्य पानीयेन सह साधयित्वोपसंस्कृत्य यथावन्मधुतैललवणोपहितं सुखोष्णं बस्तिं श्लेष्म- विकारिणे विधिज्ञो विधिवद्दद्यात् । शीतं तु मधुसर्पिर्भ्यामुपसंसृज्य पित्त- विकारिणे विधिज्ञो विधिवद् दद्यादिति कषायस्कन्धः १४१ ॥ कषाय स्कन्ध-फूल प्रियंगु, अनन्तमूल, आम की गुठली, पाठा, श्योनाक, लोध्र, मोचरस, मंजीठ, धाय के फूल, पद्म, कमल का केशर, जामुन, आम, पिल- खन, बड़, कपीतन, गूलर, पीपल, भिलावा, पाषाणभेद, सिरस, शीशम, खैर, तिन्दुक, पियाल, बेर, खैर ( लाल ), सप्तपर्ण, अश्वकर्ण ( पलाश ), तिनिश, अर्जुन, असन, विट्, खदिर, तेजबल, कैवर्त्तमुस्ता, कदम्ब, शल्लकी, जिगण, कास, कसेरु, राजकसेरु, कायफल, बांस, पद्माख, अशोक, साल, धव, सर्जवृक्ष, भोजवल्कल, वृक्ष, तुलसी, शमी, देवदारु, वोरुक, पुंनाग, शाल भेद, वंशा

शाल, तिन्दुक, बहेड़ा, कायफल, कमल गट्टा, बिस, मृणाल, ताड़, खजूर, धीकार इन या कषाय वर्ग में गिने हुए अन्य द्रव्यों को कूट पीस कर पानी से धो कर पानी के साथ पूर्ववत् पकाना चाहिये। सिद्ध होने पर मधु-तेल और लवण मिलाकर विधिपूर्वक श्लेष्मा के रोगी को कवोष्ण बस्ति देनी चाहिये। शीतल होने पर घी और शहद मिला कर पित्तविकार के रोगी को देना चाहिये। यह कषाय स्कन्ध कह दिया ॥१४१॥ तत्र श्लोकाः—षड्वर्गाः परिसंख्याता य एते रसभेदतः । आस्थापनमभिप्रेत्य तान् विद्यात्सार्वयोगिकान् ॥ १४२ ॥ सर्वशो हि प्रणिहिताः सर्वरोगेषु जानता। सर्वान् रोगान्नियच्छन्ति येभ्य आस्थापनं हितम् ॥ १४३ ॥ येषां येषां प्रशान्त्यर्थं ये ये ते परिकीर्तिताः । द्रव्यवर्गा विकाराणां तेषां ते परिकोपनाः ॥ १४४ ॥ इत्येते षडास्थापनस्कन्धा रसतोऽनुविभज्य व्याख्याताः । आस्थापन बस्ति के अभिप्राय से रसों के भेद से जो ये छः वर्ग कहे हैं, इन छः स्कन्धों को आस्थापन बस्ति से अच्छे होने वाले सब रोगों में लागू होने वाले समझने चाहिये। क्योंकि दोष, दूष्य, देश, काल, मात्रा आदि की अपेक्षा करके औषध-उपयोग को जानने वाले वैद्य द्वारा जिन रोगों के लिये आस्थापन विधि हितकारी है, उन रोगों में प्रयुक्त किये हुए यह छः वर्ग सब रोगों का शमन करते हैं। जिन जिन विकारों की शान्ति के लिये जो जो द्रव्यवर्ग नहीं कहे हैं, वे २ उन २ रोगों को कुपित करते हैं, शान्त नहीं करते। इस प्रकार से छः आस्थापन-स्कन्धों को रसों के अनुसार विभाग करके कह दिया ॥१४२-१४४॥ तेभ्यो भिषग्बुद्धिमान् परिसंख्यातमपि यद्यद् द्रव्यमयौगिकं मन्येत तत्तदपकर्षयेत्, यद्यच्चानुक्तमपि यौगिकं वा मन्येत तत्तद् विदध्यात्। वर्गमपि वर्गेणोपसंसृजेदेकमेकेनानेकेन वा युक्तिं प्रमाणीकृत्य । प्रच- रणमिव भिक्षुकस्य बीजमिव कर्षकस्य सूत्रं बुद्धिमतामल्पमप्यनल्पज्ञा- नायतनं भवति । तस्माद् बुद्धिमतामूह्यापोहवितर्काः । मन्दबुद्धेस्तु यथोक्तानुगमनमेव श्रेयः । यथोक्तं हि मार्गमनुगच्छन् भिषक् संसाध- यति वा कार्यमनतिमहत्त्वाद्वा निपातयत्यनतिह्रस्वत्वादुदाहरण- स्येति ॥ १४५ ॥ बुद्धिमान् वैद्य इन वर्गों में गिने हुए जिस द्रव्य को अयौगिक समझे उसको निकाल देवे और न कहे हुए जिस द्रव्य को यौगिक समझे उसको इनमें मिला लेवे। युक्ति के अनुसार दोष-दूष्य की विवेचना करके एक वर्ग को एक, अथवा

६१६ चरकसंहिता [अ० ८ अनेक वर्ग के साथ मिला कर प्रयोग करे । भिक्षुक के विचरने के समान और किसान के बीज की तरह यह अल्प कथन भी बुद्धिमानों के लिये बड़ा ज्ञानप्रद है, क्योंकि बुद्धिमान् व्यक्ति ऊहापोह (यह इस प्रकार है, यह इस प्रकार नहीं है, इस प्रकार के तर्क) और वितर्क प्रमाण-युक्ति में कुशल होते हैं। मन्द- बुद्धि वाले व्यक्ति को कथनानुसार ही कार्य करना श्रेयस्कर है। क्योंकि इस प्रकार का मन्द बुद्धि वाला भिषक्, उपदेश के न बहुत संक्षिप्त और न बहुत विस्तार होने से, बिना ऊहापोह के भी यथोक्त मार्ग का अनुसरण करता हुआ कार्य में सफलता प्राप्त कर लेता है ॥१४५॥ अतः परमनुवासनद्रव्याण्यनुव्याख्यास्यन्ते—अनुवासनं तु स्नेह एव। स्नेहस्तु द्विविधः—स्थावरो जङ्गमात्मकश्च। तत्र स्थावरात्मकः स्नेहस्तैलमतैलं च। तद् द्वयं तैलमेव कृत्वोपदिश्यते, सर्वतस्तैलप्रा- धान्यात्। जङ्गमात्मकस्तु—वसा, मज्जा, सर्पिरिति ॥ १४६ ॥ तेषां तु तैल-वसा-मज्ज-सर्पिषां तु यथापूर्वं श्रेष्ठं वात-श्लेष्म-विकारे- ष्वनुवासनीयेषु, यथोत्तरं तु पित्तविकारेषु, सर्व एव वा सर्वविकारे- ष्वपि च योगमुपयान्ति संस्कारविशेषादिति ॥ १४७ ॥ इसके आगे अनुवासन द्रव्यों की व्याख्या करेंगे। अनुवासन का अर्थ स्नेह है। स्नेह दो प्रकार का है स्थावर और जंगम। इनमें स्थावर स्नेह दो प्रकार का है। जैसे—तैल (तिलों से उत्पन्न हुआ) और अतैल (तिलों से न उत्पन्न हुआ), इन दोनों को तैल शब्द से ही कह देते हैं, क्योंकि सब तैलों में तिल के तैल की ही प्रधान है। जांगम स्नेह वसा, मज्जा और सर्पि (घी) हैं। तैल, वसा, मज्जा और घी इन में पूर्व की वस्तु उत्तर वस्तु से श्रेष्ठ है अर्थात् घी से मज्जा, मज्जा से वसा और वसा से तैल श्रेष्ठ है। यह नियम वात और कफ के विकारों के लिये है। पित्तजन्य विकारों में उत्तरोत्तर वस्तु (तैल से वसा; वसा से मज्जा और मज्जा से घी) श्रेष्ठ है। अथवा सब ही स्नेह सब रोगों में विशेष संस्कार से (उस उस दोषहर द्रव्य के सहयोग से) उपयुक्त बन जाते हैं ॥ १४६-१४७ ॥ शिरोविरेचनद्रव्याणि पुनरपामार्ग-पिप्पली-मरिच-विडङ्ग-शिग्रुशि- रीष-कुस्तुम्बुरु-पिल्वजाज्यजमोद-वार्ताकी-पृथ्वीकैला-हरेणुका-फला- नि च। सुमुख-सुरस-कुठेरक-गण्डीरक-कालमालक-पर्णास-क्षवक-फणि- ज्झक-हरिद्रा-शृङ्गवेर-मूलक-लशुन-तर्कारी-सर्षप-पत्राणि च, अर्कालर्क- कुष्ठ-नागदन्ती-वचा-भार्गी-श्वेता-ज्योतिष्मती-गवाक्षी-गण्डीर-पुष्पी- वृश्चिकाली-वयस्थातिविषा-मूलानि च, हरिद्रा-शृङ्गवेर-मूलक-लशुन-

अ० ८ ] विमानस्थानम् ६१७

अ० ८ ] विमानस्थानम् ६१७ कन्दाश्च, लोध्र-मदन-सप्तपर्ण-निम्बार्क-पुष्पाणि च, देवदार्वगुरु-सरल- शल्लकी जिङ्गिन्यसन-हिङ्गु-निर्यासाश्च, तेजोवती-वराह्विङ्गुदी-शोभाञ्जन- बृहती-कण्टकारिका-त्वचः । शिरोविरेचन द्रव्य—अपामार्ग, पिप्पली, मरिच, वायविडंग, शोभांजन, सिरस, हरा धनिया, बेलगिरी, अजवायन, काला जीरा, वार्ताकी, बड़ी इलायची, छोटी इलायची, रेणुका इनके फल, सुमुख, सुरस, कुठेरक, गण्डीर, कालमालक, पर्णास, क्षवक, फणिज्जक (तुलसी के भेद ), इलसी, सोंठ, मूली, लहसुन, जय- न्ती और सरसों इनके पत्ते । आक, लाल फूल का आक, कूठ, नागवला, वच, अपामार्ग, मालकंगनी, इन्द्रायण, रामठ, मधूलिका ( सौंफ ), वृश्चिकाली, ब्राह्मी, और अतीस इनके मूल । हल्दी, आर्द्रक, मूली और लहसुन इनके कन्द । लोध, मैनफल, सप्तपर्ण, नीम और आक इनके फूल । देवदारु, अगर, शल्लकी, सरल- वृक्ष, जिगण, असन और हींग इनका गोद, तेजबल, दालचीनी, इंगुदी, शोभां- जन, बड़ी कटेरी और छोटी कटेरी इनकी छाल । इति शिरोविरेचनं सप्तविधं फल-पत्र-मूल-कन्द-पुष्प-निर्यास-त्वगा- श्रयभेदात् । लवण-कटु-तिक्त-कषायाणि चेन्द्रियोपशयानि तथाऽपरा- ण्यनुक्तान्यपि द्रव्याणि यथायोगविहितानि शिरोविरेचनार्थमुपदिश्य- न्त इति ॥ १४८ ॥ शिरोविरेचन ☸ सात प्रकार का है—फल, पत्ते, मूल, कन्द, पुष्प, निर्यास ( गोद ) और त्वचा भेद से । लवण, कटु और तिक्त एवं, कषाय ये रस इन्द्रिय चक्षु आदि को शान्त करने वाले हैं; उपघातक नहीं है । इस प्रकार के अन्य यहां पर न गिने हुए, द्रव्यों का दोष-दूष्य की अपेक्षा से योग के लिये अनुकूल जानकर शिरोविरेचन कार्य में उपयोग कर लेना चाहिये ॥१४८॥ तत्र श्लोकाः—लक्षणाचार्यशिष्याणां परीक्षाकारणं च यत् । अध्येयाध्यापनविधिः संभाषाविधिरेव च ॥ १४६ ॥ षड्भिरूनानि पञ्चाशद्वादमार्गपदानि च । पदानि दश चान्यानि कारणादीनि तत्त्वतः ॥ १५० ॥ संप्रश्नश्च परीक्षादेर्नवको वमनादिषु ! भिषग्जितीये रोगाणां विमाने संप्रदर्शितः ॥ १५१ ॥ बहुविधमिदमुक्तमर्थजातं बहुविधवाक्यविचित्रमर्थकान्तम् । ☸ सुश्रुत में आठ प्रकार के शिरोविरेचन द्रव्य माने हैं । इनमें आठवां 'सार' गिना है ।

बहुविधशुभशब्दसन्धियुक्तं बहुविधवादनिषूदनं परेषां ॥ १५२॥ इमां मतिं बहुविधहेतुसंश्रयां विज्ञङ्गिवान्परमतवादसूदनीम् । न सज्जते परवचनावमर्दनेर्न शक्यते परवचनैश्च मर्दितुम् ॥ १५३॥ दोषादीनां तु भावानां सर्वेषामेव हेतुमत् । मानात्सम्यग्विमानानि निरुक्तानि विभागशः ॥ १५४ ॥ शास्त्र, आचार्य और शिष्य की परीक्षा, परीक्षा का कारण, अध्ययन और अध्यापन विधि, (शिष्य-आचार्य विधि), तद्विद्य संभाषाविधि, चवालीस वाद मार्ग, कारण, करण आदि दस पद, वमन आदि परीक्षार्थ, परीक्षा के प्रकार, तथा नौ प्रश्न इस रोग-भिषग्जितीय अध्याय में भगवान् आत्रेय ने पूर्णरूप से कह दिये हैं । बहुत प्रकार के वाक्यों से विचित्र, अर्थ में सुन्दर, बहुत प्रकार के शुभ शब्दों की संधि-योजना से बनाये, दूसरों के बहुत प्रकार के वाद को हटाने वाले नाना तत्त्व यहां पर भगवान् आत्रेय ने कहे हैं । नाना प्रकार की युक्ति से युक्त, दूसरों के मत को निराकरण करने वाली, यहां पर कही इस बुद्धि को जान कर वैद्य, दूसरों के वचनों का विमर्दन करने में समर्थ होता है । दूसरों के वचनों से पराजित नहीं हो सकता है । इनके ज्ञान से वैद्य सभा में वाक्चातुर्य से दूसरों को परास्त करता है, उनसे पराजित नहीं होता । विमान स्थान की निरुक्ति— दोष आदि सब भावों के युक्तिपूर्वक समस्त मान, एक-एक करके कह दिये हैं । दोष आदि का विशेष रूप से मान अर्थात् ज्ञान 'विमान' है । इस विमान का यहां पर उपदेश किया है, इसलिये इसको विमान-स्थान कहते हैं । इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते विमानस्थाने रोगभिषग्जितीय- विमानं नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ इति विमानस्थानं समाप्तम् । मु०—पं० बैकुंठनाथ भार्गव, आनन्दसागर प्रेस, गायघाट, बनारस ।

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लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी, पुस्तकालय Lal Bahadur Shastri National Academy of Administration Library मसूरी MUSSOORIE अवाप्ति स० Acc. No... ........ ............. कृपया इस पुस्तक को निम्नलिखित दिनांक या उससे पहले वापस कर दें । Please return this book on or before the date last stamped below. दिनांक | उधारकर्ता | दिनांक | उधारकर्ता Date | की संख्या | Date | की संख्या | Borrower s | | Borrower's | No | | No 125794 LBSNAA

खण्ड एक

H 615.536 चरक T T <s>14071</s> खण्ड एक वर्ग न — T Clas । लेखक अग्निवेश Author पुस्तक चरक संहिता । Title H <s>14071</s> 615.536 LIBRARY चरक LAL BAHADUR SHASTRI भाग-1 National Academy of Administration MUSSOORIE Accession No 125794 1 Books are issued for 15 days only but may have to be recalled earlier if urgen- tly required 2 An over due charge of 25 Paise per day per volume will be charged 3 Books may be renewed on request, at the discretion of the Librarian 4 Periodicals Rare and Reference books may not be issued and may be consulted only in the Library 5 Books lost, defaced or injured in any way shall have to be replaced or its double price shall be paid by the borrower Help to keep this book fresh, clean & moving