चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
६१६ चरकसंहिता [अ० ८ अनेक वर्ग के साथ मिला कर प्रयोग करे । भिक्षुक के विचरने के समान और किसान के बीज की तरह यह अल्प कथन भी बुद्धिमानों के लिये बड़ा ज्ञानप्रद है, क्योंकि बुद्धिमान् व्यक्ति ऊहापोह (यह इस प्रकार है, यह इस प्रकार नहीं है, इस प्रकार के तर्क) और वितर्क प्रमाण-युक्ति में कुशल होते हैं। मन्द- बुद्धि वाले व्यक्ति को कथनानुसार ही कार्य करना श्रेयस्कर है। क्योंकि इस प्रकार का मन्द बुद्धि वाला भिषक्, उपदेश के न बहुत संक्षिप्त और न बहुत विस्तार होने से, बिना ऊहापोह के भी यथोक्त मार्ग का अनुसरण करता हुआ कार्य में सफलता प्राप्त कर लेता है ॥१४५॥ अतः परमनुवासनद्रव्याण्यनुव्याख्यास्यन्ते—अनुवासनं तु स्नेह एव। स्नेहस्तु द्विविधः—स्थावरो जङ्गमात्मकश्च। तत्र स्थावरात्मकः स्नेहस्तैलमतैलं च। तद् द्वयं तैलमेव कृत्वोपदिश्यते, सर्वतस्तैलप्रा- धान्यात्। जङ्गमात्मकस्तु—वसा, मज्जा, सर्पिरिति ॥ १४६ ॥ तेषां तु तैल-वसा-मज्ज-सर्पिषां तु यथापूर्वं श्रेष्ठं वात-श्लेष्म-विकारे- ष्वनुवासनीयेषु, यथोत्तरं तु पित्तविकारेषु, सर्व एव वा सर्वविकारे- ष्वपि च योगमुपयान्ति संस्कारविशेषादिति ॥ १४७ ॥ इसके आगे अनुवासन द्रव्यों की व्याख्या करेंगे। अनुवासन का अर्थ स्नेह है। स्नेह दो प्रकार का है स्थावर और जंगम। इनमें स्थावर स्नेह दो प्रकार का है। जैसे—तैल (तिलों से उत्पन्न हुआ) और अतैल (तिलों से न उत्पन्न हुआ), इन दोनों को तैल शब्द से ही कह देते हैं, क्योंकि सब तैलों में तिल के तैल की ही प्रधान है। जांगम स्नेह वसा, मज्जा और सर्पि (घी) हैं। तैल, वसा, मज्जा और घी इन में पूर्व की वस्तु उत्तर वस्तु से श्रेष्ठ है अर्थात् घी से मज्जा, मज्जा से वसा और वसा से तैल श्रेष्ठ है। यह नियम वात और कफ के विकारों के लिये है। पित्तजन्य विकारों में उत्तरोत्तर वस्तु (तैल से वसा; वसा से मज्जा और मज्जा से घी) श्रेष्ठ है। अथवा सब ही स्नेह सब रोगों में विशेष संस्कार से (उस उस दोषहर द्रव्य के सहयोग से) उपयुक्त बन जाते हैं ॥ १४६-१४७ ॥ शिरोविरेचनद्रव्याणि पुनरपामार्ग-पिप्पली-मरिच-विडङ्ग-शिग्रुशि- रीष-कुस्तुम्बुरु-पिल्वजाज्यजमोद-वार्ताकी-पृथ्वीकैला-हरेणुका-फला- नि च। सुमुख-सुरस-कुठेरक-गण्डीरक-कालमालक-पर्णास-क्षवक-फणि- ज्झक-हरिद्रा-शृङ्गवेर-मूलक-लशुन-तर्कारी-सर्षप-पत्राणि च, अर्कालर्क- कुष्ठ-नागदन्ती-वचा-भार्गी-श्वेता-ज्योतिष्मती-गवाक्षी-गण्डीर-पुष्पी- वृश्चिकाली-वयस्थातिविषा-मूलानि च, हरिद्रा-शृङ्गवेर-मूलक-लशुन-
अ० ८ ] विमानस्थानम् ६१७
अ० ८ ] विमानस्थानम् ६१७ कन्दाश्च, लोध्र-मदन-सप्तपर्ण-निम्बार्क-पुष्पाणि च, देवदार्वगुरु-सरल- शल्लकी जिङ्गिन्यसन-हिङ्गु-निर्यासाश्च, तेजोवती-वराह्विङ्गुदी-शोभाञ्जन- बृहती-कण्टकारिका-त्वचः । शिरोविरेचन द्रव्य—अपामार्ग, पिप्पली, मरिच, वायविडंग, शोभांजन, सिरस, हरा धनिया, बेलगिरी, अजवायन, काला जीरा, वार्ताकी, बड़ी इलायची, छोटी इलायची, रेणुका इनके फल, सुमुख, सुरस, कुठेरक, गण्डीर, कालमालक, पर्णास, क्षवक, फणिज्जक (तुलसी के भेद ), इलसी, सोंठ, मूली, लहसुन, जय- न्ती और सरसों इनके पत्ते । आक, लाल फूल का आक, कूठ, नागवला, वच, अपामार्ग, मालकंगनी, इन्द्रायण, रामठ, मधूलिका ( सौंफ ), वृश्चिकाली, ब्राह्मी, और अतीस इनके मूल । हल्दी, आर्द्रक, मूली और लहसुन इनके कन्द । लोध, मैनफल, सप्तपर्ण, नीम और आक इनके फूल । देवदारु, अगर, शल्लकी, सरल- वृक्ष, जिगण, असन और हींग इनका गोद, तेजबल, दालचीनी, इंगुदी, शोभां- जन, बड़ी कटेरी और छोटी कटेरी इनकी छाल । इति शिरोविरेचनं सप्तविधं फल-पत्र-मूल-कन्द-पुष्प-निर्यास-त्वगा- श्रयभेदात् । लवण-कटु-तिक्त-कषायाणि चेन्द्रियोपशयानि तथाऽपरा- ण्यनुक्तान्यपि द्रव्याणि यथायोगविहितानि शिरोविरेचनार्थमुपदिश्य- न्त इति ॥ १४८ ॥ शिरोविरेचन ☸ सात प्रकार का है—फल, पत्ते, मूल, कन्द, पुष्प, निर्यास ( गोद ) और त्वचा भेद से । लवण, कटु और तिक्त एवं, कषाय ये रस इन्द्रिय चक्षु आदि को शान्त करने वाले हैं; उपघातक नहीं है । इस प्रकार के अन्य यहां पर न गिने हुए, द्रव्यों का दोष-दूष्य की अपेक्षा से योग के लिये अनुकूल जानकर शिरोविरेचन कार्य में उपयोग कर लेना चाहिये ॥१४८॥ तत्र श्लोकाः—लक्षणाचार्यशिष्याणां परीक्षाकारणं च यत् । अध्येयाध्यापनविधिः संभाषाविधिरेव च ॥ १४६ ॥ षड्भिरूनानि पञ्चाशद्वादमार्गपदानि च । पदानि दश चान्यानि कारणादीनि तत्त्वतः ॥ १५० ॥ संप्रश्नश्च परीक्षादेर्नवको वमनादिषु ! भिषग्जितीये रोगाणां विमाने संप्रदर्शितः ॥ १५१ ॥ बहुविधमिदमुक्तमर्थजातं बहुविधवाक्यविचित्रमर्थकान्तम् । ☸ सुश्रुत में आठ प्रकार के शिरोविरेचन द्रव्य माने हैं । इनमें आठवां 'सार' गिना है ।
बहुविधशुभशब्दसन्धियुक्तं बहुविधवादनिषूदनं परेषां ॥ १५२॥ इमां मतिं बहुविधहेतुसंश्रयां विज्ञङ्गिवान्परमतवादसूदनीम् । न सज्जते परवचनावमर्दनेर्न शक्यते परवचनैश्च मर्दितुम् ॥ १५३॥ दोषादीनां तु भावानां सर्वेषामेव हेतुमत् । मानात्सम्यग्विमानानि निरुक्तानि विभागशः ॥ १५४ ॥ शास्त्र, आचार्य और शिष्य की परीक्षा, परीक्षा का कारण, अध्ययन और अध्यापन विधि, (शिष्य-आचार्य विधि), तद्विद्य संभाषाविधि, चवालीस वाद मार्ग, कारण, करण आदि दस पद, वमन आदि परीक्षार्थ, परीक्षा के प्रकार, तथा नौ प्रश्न इस रोग-भिषग्जितीय अध्याय में भगवान् आत्रेय ने पूर्णरूप से कह दिये हैं । बहुत प्रकार के वाक्यों से विचित्र, अर्थ में सुन्दर, बहुत प्रकार के शुभ शब्दों की संधि-योजना से बनाये, दूसरों के बहुत प्रकार के वाद को हटाने वाले नाना तत्त्व यहां पर भगवान् आत्रेय ने कहे हैं । नाना प्रकार की युक्ति से युक्त, दूसरों के मत को निराकरण करने वाली, यहां पर कही इस बुद्धि को जान कर वैद्य, दूसरों के वचनों का विमर्दन करने में समर्थ होता है । दूसरों के वचनों से पराजित नहीं हो सकता है । इनके ज्ञान से वैद्य सभा में वाक्चातुर्य से दूसरों को परास्त करता है, उनसे पराजित नहीं होता । विमान स्थान की निरुक्ति— दोष आदि सब भावों के युक्तिपूर्वक समस्त मान, एक-एक करके कह दिये हैं । दोष आदि का विशेष रूप से मान अर्थात् ज्ञान 'विमान' है । इस विमान का यहां पर उपदेश किया है, इसलिये इसको विमान-स्थान कहते हैं । इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते विमानस्थाने रोगभिषग्जितीय- विमानं नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ इति विमानस्थानं समाप्तम् । मु०—पं० बैकुंठनाथ भार्गव, आनन्दसागर प्रेस, गायघाट, बनारस ।
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लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी, पुस्तकालय Lal Bahadur Shastri National Academy of Administration Library मसूरी MUSSOORIE अवाप्ति स० Acc. No... ........ ............. कृपया इस पुस्तक को निम्नलिखित दिनांक या उससे पहले वापस कर दें । Please return this book on or before the date last stamped below. दिनांक | उधारकर्ता | दिनांक | उधारकर्ता Date | की संख्या | Date | की संख्या | Borrower s | | Borrower's | No | | No 125794 LBSNAA
खण्ड एक
H 615.536 चरक T T <s>14071</s> खण्ड एक वर्ग न — T Clas । लेखक अग्निवेश Author पुस्तक चरक संहिता । Title H <s>14071</s> 615.536 LIBRARY चरक LAL BAHADUR SHASTRI भाग-1 National Academy of Administration MUSSOORIE Accession No 125794 1 Books are issued for 15 days only but may have to be recalled earlier if urgen- tly required 2 An over due charge of 25 Paise per day per volume will be charged 3 Books may be renewed on request, at the discretion of the Librarian 4 Periodicals Rare and Reference books may not be issued and may be consulted only in the Library 5 Books lost, defaced or injured in any way shall have to be replaced or its double price shall be paid by the borrower Help to keep this book fresh, clean & moving