भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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१६६ चरकसंहिता [ अ० ७ प्रभाहीन नहीं हो सकता । मृत्यु के समीप आने पर प्रभा पर आश्रित छाया मनुष्य के शुभाशुभ को प्रकाशित कर देती है ॥ १४-१७ ॥ कामलाक्ष्णोर्मुखं पूर्णं गण्डयोर्युक्तमासता । संत्रासश्चोष्णगात्रं च यस्य तं परिवर्जयेत् ॥ १८ ॥ उत्थाप्यमानः शयनात्प्रमोहं याति यो नरः। मुहुर्मुहुर्न सप्ताहं स जीवति विकुत्थन ॥ १६ ॥ ( १ ) जिस रोगी की आंखे कामला रोगी के समान पीली, मुख से लार गिरना, गण्डस्थल गालों पर मास की वृद्धि ( गालों पर मास की अधिकता ) हो जिसको देखकर डर लगे, और शरीर में उष्णता हो, ऐसे रोगी को त्याग दे, उसकी चिकित्सा स्वीकार न करे । ( २ ) जो रोगी प्रातःकाल विस्तरे से उठते समय मूर्च्छित हो जाता हो, और बार बार अपना शोखो मारता रहे या निरन्तर गालिया बोले वा बड़बड़ावे वह सात दिन में मर जाता है ॥ १८-१६ ॥ संसृष्टा व्याधयो यस्य प्रतिलोमानुलोमगाः । व्यापन्ना ग्रहणी प्रायः सोऽर्धमास न जीवति ॥ २० ॥ उपरुद्धस्य रोगेण कर्षितस्याल्पमश्नतः । बहुमूत्रपुरीषं स्याद्यस्य तं परिवर्जयेत् ॥ २१ ॥ दुर्बलो बहु भुक्ते यः प्राग्भुक्तादन्नमातुरः । अल्पमूत्रपुरीषश्च यथा प्रेतस्तथैव सः॥ २२॥ इष्टं च गुणसंपन्नमन्नमश्नाति यो नरः । शश्वच्च बलवर्णाभ्यां हीयते न स जीवति ॥ २३ ॥ ( ३ ) जिस रोगी में प्रतिलोमगामी और अनुलोमगामी दोनों प्रकार के रोग मिले हुए हों, और जिस की ग्रहणी दूषित हो, ( अन्नपाक होना बन्द हो जाये ) वह पन्द्रह दिन से अधिक नहीं जीता । (४) रोग से पीडित दुर्बल व्यक्ति तथा थोड़ा खाने पर जिसको मल ओर मूत्र अधिक परिमाण में आये, वह रोगी त्याज्य है । ( ५ ) जो रोगी निर्बल होकर पहिले की अपेक्षा अधिक भोजन करे, जिसको मल और मूत्र कम परिमाण में आता हो, वह प्रेत के समान है । (६) जो रोगी मन चाहा और गुणकारी अन्न को खाये, तो भी, बल और वर्ण निरन्तर क्षीण होता जाये, वह नहीं बचता ॥ २०-२३ ॥ प्रकूजति प्रश्वसिति शिथिलं चातिसार्यते । बलहीनः पिपासार्तः शुष्कास्यो न स जीवति ॥ २४ ॥