भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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अ० ७ ] इन्द्रियस्थानम् १६७ ह्रस्वं च यः प्रश्वसिति व्याविद्धं स्पन्दते च यः । मृतमेव तमात्रेयो व्याचचक्षे पुनर्वसुः ॥ २५ ॥ ऊर्ध्वं च यः प्रश्वसिति श्लेष्मणा चाभिभूयते । हीनवर्णबलाहारो यो नरो न स जीवति ॥ २६ ॥ ( ७ ) जो रोगी कराहै, ऊचा-गहरा सास ले और पतला मल प्रवाहित करे, बल से क्षीण, प्यास से पीड़ित हो, मुख सूखता हो, ऐसा रोगी नहीं बचता । ( ८ ) जिस रोगी का श्वास बहुत अल्प होगया है, और जिसका हृदय कुटिल अनियमित रूप से स्पन्दन ( धड़कन ) करता है, ऐसे रोगी को आत्रेय पुनर्वसु ने मृतक तुल्य ही कहा है । ( ६ ) जो रोगी ऊंचा गहरा श्वास ले जिस में कफ का भी प्रकोप हो और जिसके बल, वर्ण और आहार कम हो गये हों वह मनुष्य नहीं बचता ॥ २६ ॥ ऊर्ध्वाग्रे नयने यस्य मन्ये चानतकम्पने । बलहीनः पिपासातः शुष्कास्यो न स जीवति ॥ २७ ॥ यस्य गण्डावुपचितौ ज्वरकासो च दारुणो । शूली प्रद्वेष्टि चाप्यन्नं तस्मिन् कर्म न सिध्यति ॥ २८ ॥ व्यावृत्तमूर्धाजिह्वास्यो भ्रुवौ यस्य च विच्युते । कण्टकैश्चाचिता जिह्वा यथा प्रेतस्तथैव सः ॥ २६ ॥ ( १० ) जिस रोगी की आंखे ऊपर को चढ़ गईं, मन्या सिरायें निरन्तर कापे, जो बलहीन और पिपासा से पीड़ित हो, जिसका मुख सूखता हो वह रोगी नहीं बचता । ( ११ ) जिस रोगी के गण्डस्थल ऊंचे, मोटे फूले हों, जिसको ज्वर और खांसी विकट हो, सारे पेट में शूल चलते हों, जो अन्न से द्वेष करता हो, ऐसे रोगी में चिकित्सा सफल नहीं होती । ( १२ ) जिस रोगी के मूर्धा ( तालु ) जीभ और मुख फट गये हों, भौंहें टेड़ी पड़ गई हो, जीभ कांटो से भरी हो वह रोगी मृत के समान है ॥२७-२६॥ शेफश्चात्यर्थमुत्सिक्तं निःसृतौ वृषणौ भृशम् । अतश्चैव विपर्यासो विकृत्या प्रेतलक्षणम् ॥ ३० ॥ ( १३ ) जिसका लिंग इन्द्रिय एकदम अन्दर घुस जाये और अण्डकोश बहुत बाहर निकल आये ( बढ़ जाये ), अथवा इसके विपरीत लिंग आगे निकल आये और अण्डकोश अन्दर घुस जाये इस प्रकार के विकार से रोगीको मृत के समान ही जानना चाहिये ॥ ३० ॥