छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 105, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंयुवराज ने अपने हाथ से काढ़े का प्याला येसूबाई के होठों से लगाया। उनके ज्वर का सही कारण युवराज को ज्ञात था। अस्वस्थ येसू के चेहरे पर हल्के हाथ फेरते हुए उन्होंने कहा, "डरो मत! अधिक सोचकर अपनी जान संकट में मत डालो, इतना कष्ट न उठाओ। मान लो कल को हम मुगलों से जाकर मिलें भी तो कौन-सा आसमान टूट पड़ने वाला है? इससे पहले स्वयं पिताजी ने हमारी छोटी उँगलियाँ पकड़कर मुगलों का शामियाना हमें नहीं दिखाया था क्या? दो बार मुगलों की अच्छी भली मनसबदारी की है, हमने।" येसूबाई किसी तरह मुस्कराते हुए बोलीं, "उस समय आपका जाना ससुर जी की राजनीति का एक हिस्सा था।" किन्तु अब भी हमें और कितना शान्त बैठना चाहिए? इन राज्य कर्मचारियों को लगता है कि शम्भू की गर्दन में रीढ़ की हड्डी नहीं है, सीने में आग नहीं है। येसू अब हमें एक ही उपाय सूझता है। अपने अपमान को मिटाने के लिए, बाहर यश कमाकर पिताजी के सामने सिर ऊँचा करके खड़े होने के लिए हम भी थोड़ा खेल खेलें। शम्भुराजा की बातें सुनकर भी येसूबाई का भ्रम दूर नहीं हुआ। इसलिए संभाजी राजा उन्हें समझाते हुए बोले, "फिलहाल तो कुछ समय के लिए हम भी मधुर भाव से शत्रु से मिलेंगे और समय आने पर पेट फाड़कर बाहर निकल आएँगे।" "युवराज, दिलेरखान कोई मछली नहीं पूरा मगरमच्छ है।" "यह बालक भी नासमझ बच्चा नहीं है। यह शिवाजी महाराज का बेटा है, मुगलों का काल बनने वाला है।" युवराज और युवराज्ञी सारी रात जागते रहे। येसूबाई की राय थी कि युवराज को मुगलों के पास जाना ही नहीं चाहिए। येसूबाई का मुरझाया चेहरा, चढ़ता हुआ ज्वर, धीरे से निकलने वाला स्वर आदि शम्भुराजा के सबल पावों में ममता की जंजीर डाल रहे थे। उसे तोड़कर बाहर निकलने के लिए शम्भुराजा छटपटा रहे थे। अन्त में येसूबाई ने अपने मातृत्व, स्त्रीत्व और मैत्रीभाव की शक्ति को एकत्र की। शम्भुराजा का हाथ अपने सीने पर रखते हुए बोलीं, "युवराज! अपनी नित्य सहचरी को एक वचन दोगे?" "बोलो।" "पहले महाराज की आज्ञानुसार सज्जनगढ़ जाएँगे। स्वामी रामदास का कृपाप्रसाद लेकर ही आगे जाएँगे?" "हाँ! दिया वचन।" सम्भाजी :: 103