छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
युवराज ने अपने हाथ से काढ़े का प्याला येसूबाई के होठों से लगाया। उनके ज्वर का सही कारण युवराज को ज्ञात था। अस्वस्थ येसू के चेहरे पर हल्के हाथ फेरते हुए उन्होंने कहा, "डरो मत! अधिक सोचकर अपनी जान संकट में मत डालो, इतना कष्ट न उठाओ। मान लो कल को हम मुगलों से जाकर मिलें भी तो कौन-सा आसमान टूट पड़ने वाला है? इससे पहले स्वयं पिताजी ने हमारी छोटी उँगलियाँ पकड़कर मुगलों का शामियाना हमें नहीं दिखाया था क्या? दो बार मुगलों की अच्छी भली मनसबदारी की है, हमने।" येसूबाई किसी तरह मुस्कराते हुए बोलीं, "उस समय आपका जाना ससुर जी की राजनीति का एक हिस्सा था।" किन्तु अब भी हमें और कितना शान्त बैठना चाहिए? इन राज्य कर्मचारियों को लगता है कि शम्भू की गर्दन में रीढ़ की हड्डी नहीं है, सीने में आग नहीं है। येसू अब हमें एक ही उपाय सूझता है। अपने अपमान को मिटाने के लिए, बाहर यश कमाकर पिताजी के सामने सिर ऊँचा करके खड़े होने के लिए हम भी थोड़ा खेल खेलें। शम्भुराजा की बातें सुनकर भी येसूबाई का भ्रम दूर नहीं हुआ। इसलिए संभाजी राजा उन्हें समझाते हुए बोले, "फिलहाल तो कुछ समय के लिए हम भी मधुर भाव से शत्रु से मिलेंगे और समय आने पर पेट फाड़कर बाहर निकल आएँगे।" "युवराज, दिलेरखान कोई मछली नहीं पूरा मगरमच्छ है।" "यह बालक भी नासमझ बच्चा नहीं है। यह शिवाजी महाराज का बेटा है, मुगलों का काल बनने वाला है।" युवराज और युवराज्ञी सारी रात जागते रहे। येसूबाई की राय थी कि युवराज को मुगलों के पास जाना ही नहीं चाहिए। येसूबाई का मुरझाया चेहरा, चढ़ता हुआ ज्वर, धीरे से निकलने वाला स्वर आदि शम्भुराजा के सबल पावों में ममता की जंजीर डाल रहे थे। उसे तोड़कर बाहर निकलने के लिए शम्भुराजा छटपटा रहे थे। अन्त में येसूबाई ने अपने मातृत्व, स्त्रीत्व और मैत्रीभाव की शक्ति को एकत्र की। शम्भुराजा का हाथ अपने सीने पर रखते हुए बोलीं, "युवराज! अपनी नित्य सहचरी को एक वचन दोगे?" "बोलो।" "पहले महाराज की आज्ञानुसार सज्जनगढ़ जाएँगे। स्वामी रामदास का कृपाप्रसाद लेकर ही आगे जाएँगे?" "हाँ! दिया वचन।" सम्भाजी :: 103
तीन शृंगारपुर के बाहर का शिवमन्दिर प्रातःकाल ही शम्भूराजा के संगी-साथियों से खचाखच भर गया था। आसपास में घने बादल छाये थे। नयी ऊर्जा और नये धैर्य से मार्ग पर निकलना था। शम्भूराजा ने महादेव का अभिषेक आरम्भ किया था। अनेक शास्त्री पंडित बिना कुर्ता पहने शिवालय के गर्भगृह में उपस्थित थे। एक घंटे में अभिषेक पूर्ण हो गया। काले बादल भी छँट गये थे और सफेद बादल बाहर आ गये थे। दीवान सरदार विट्ठलराव मन्दिर से बाहर निकले। अब गर्भगृह में केवल शम्भूराजा और कवि कलश ही खड़े थे। कवि कलश से नहीं रहा गया, उन्होंने कहा, "राजन् आगरा-मथुरा से लेकर आजतक हम आपकी छाया बने रहे हैं। यह मानकर कि आप ही हमारे घर बार और वतन हैं, आपके पीछे-पीछे घूमते रहे हैं।" शम्भूराजा कवि कलश की ओर देखकर मन्द मन्द मुस्कराये। उन्होंने कहा, "मुझे अकेले ही जाने दीजिए। यदि आप हमारे साथ आये तो जानते हैं कि ये जहरीली जुबान वाले राज्याधिकारी चिल्ला-चिल्लाकर क्या कहेंगे? दुष्ट दगाबाज कवि कलश ने ही सारी गड़बड़ी की है। पागल शम्भू को तन्त्र मन्त्र करके मुगलों के झुंड में खींच ले गया।" कलश खिन्नता से हँसे। शम्भूराजा की जुदाई का दुख उनके चेहरे से हट नहीं रहा था! उनका धैर्य बँधाते हुए शम्भूराजा ने कहा, "यदि आप यहाँ रहेंगे तो हमारे जाने के बाद भी शत्रुओं को आपकी दहशत बनी रहेगी। वहाँ मुझ पर कोई विपत्ति आयी तो आपको बुला तो सकेंगे।" "राजन् आपकी जो आज्ञा।" कवि कलश ने कहा, "किन्तु युवराज आपके जाने के बाद भी धूर्त प्रवृत्ति शान्त नहीं रहेगी। महाराज से सीधे शिकायत करके हमें भी निष्कासित करवाने का आग्रह करेंगे। ये लोग कैसी भी शिकायत करते हैं। कहते हैं, हम भैंसे की खाल पर बैठकर साधना करते हैं।" "ऐसे आरोप केवल अधिक चालाक बनने वाले लोग ही कर सकते हैं। भैंस की खाल कितनी मोटी होती है? उसे काटने और बिछाने के लिए कितने लोग लगते हैं? इसका ज्ञान क्या इन महानुभावों को है?" कविराज को धीरज देते हुए शम्भूराजा ने कहा, "आपकी बुद्धिमत्ता और मेरे ऊपर आपकी निष्ठा महाराज को भली-भाँति मालूम है। जैसा हमारे शत्रु कहते हैं वैसे यदि आप होते और पिताजी 104 :: सम्भाजी
को मालूम पड़ता कि उनका पुत्र सचमुच एक ढोंगी तान्त्रिक के जाल में फँस गया है तो आपको कब का निकाल फेंक दिया होता, कविराज। " कवि कलश कुछ अधिक नहीं बोल पाये। शम्भूराजा का हाथ अपने हाथ में लेकर इतना ही कहा, "राजन् अपने आपको सँभालें।" दोपहर के समय काली घटाएँ घिर आयी थीं। श्रृंगारपुर पर उनकी छाया पड़ रही थी। अपने ढाई हजार घुड़सवारों के साथ संभाजी सज्जनगढ़ की ओर निकल रहे थे। उन्हें और राणूबाई तथा दुर्गाबाई को बिदा करने के लिए आधा शहर सीमा के पास जमा हो गया था। बिदाई के समय कवि कलश का गला भर आया था। येसूबाई को लेकर आयी पालकी एक विशाल जामुन के पेड़ के नीचे रुकी थी। येसूबाई का चेहरा सूज गया था। आँखें एकदम उतर आयी थीं। उनका चेहरा आसमान के बादलों की तरह दुख से भर गया था। उनकी आँखों से आँसू बरसने लगे। आँखों का काजल गोरे कपोलों पर उतर आया। शम्भूराजा ने अपने उत्तरीय से उनके आँसू पोंछने का प्रयास किया। येसूबाई और दुर्गाबाई राणूबाई के पास गयीं। राणूबाई ने दुर्गाबाई की पीठ पर हाथ फेरते हुए धीमी आवाज में बोली, "सँभालो।" शम्भूराजा ने राणूबाई से बार- बार आग्रह किया कि वे येसूबाई के साथ रहें। किन्तु राणूबाई ने कहा, "शम्भूराजा मैं आपको सज्जनगढ़ में स्वामी जी के दरवाजे पर पहुँचा दूँगी और वहीं से वाई चली जाऊँगी।" शम्भूराजा को कुछ उदास देखकर, येसूबाई उन्हें सान्त्वना देते हुए बोली— "मुझे विश्वास है युवराज, आपको सज्जनगढ़ पर स्वामी जी मिलेंगे। मन का सारा भ्रम दूर हो जाएगा। ये दिन भी बीत जाएँगे।" "युवराज्ञी अब आप भी श्रृंगारपुर में नहीं रहिए।" "तो फिर?" "शीघ्र ही पन्हाला पहुँचिए।" "पन्हाला? वह क्यों?" येसूबाई ने आश्चर्य से पूछा। "आपको पता नहीं है क्या? हमारे पिताजी बहुत थक गये हैं। बहुत बुड्ढे दिखाई देने लगे हैं। उनके स्वास्थ्य का ध्यान रखने के लिए अपने घर का कोई उनके निकट नहीं होना चाहिए क्या?" संभाजी राजा ने कहा। यह सुनकर येसूबाई की आँखों से आँसू अपने आप सूख गये। पति के ऊपर अभिमान के कारण उनका सिर ऊँचा हो गया। सम्भाजी .: 105
चार अपमान और अवहेलना का अंगार कितना दाहक होता है, इसकी कल्पना कोई भावुक और स्वाभिमानी व्यक्ति ही कर सकता है। संभाजी राजा अपने सैनिकों के साथ सज्जनगढ़ के दरवाजे के पास पहुँचे तो अत्यधिक विचार मंथन के कारण उनका सिर दुखने लगा था। ऐसे सिरदर्द की दवा यही है कि या तो गैंडे की तरह पत्थर पर सिर पटक-पटक कर हमेशा के लिए शान्त हो जाना या तुकाराम अथवा स्वामी रामदास जैसे किसी सन्त के चरणों में मत्था टेककर उनके ज्ञान के कुएँ से अमृत पान करना और उसी आधार पर जीवन की सफलता को ढूँढ़ना। किन्तु आजकल युवराज जहाँ भी जाते थे, दुर्दैव की अघोरी छायाएँ उनका पीछा करती रहती थीं। जिस दिन युवराज सज्जनगढ़ पहुँचे उससे ठीक एक दिन पहले स्वामी जी कोल्हापुर की ओर निकल गये थे और पन्द्रह दिन तक उनके लौटने की सम्भावना नहीं थी। येसूबाई के न रहने पर दुर्गाबाई युवराज की देखभाल कर रहीं थीं। राणूबाई युवराज को यही समझाने का बार-बार प्रयत्न कर रही थीं कि आज नहीं तो कल सारी उलझनें अपने आप सुलझ जाएँगी। इसलिए युवराज को धैर्य नहीं छोड़ना चाहिए। शम्भूराजा भी सज्जनगढ़ पर अपना मन बहलाने का प्रयास कर रहे थे। उन्होंने गढ़ के एक छोर पर स्थित अन्न मारुति के दर्शन किये। अपने पीछे लगे सारे संकट दूर हो जायें इसके लिए वे मारुति और शनिदेव की उपासना कर रहे थे। अनेक बार अपने रक्षकों की एक टुकड़ी लेकर वे बाहर निकलते थे। कभी वे डोरकटी पतंग की भाँति गढ़ के आसपास घूमते थे तो कभी रामगढ़ी के पास जाकर ध्यानस्थ हो जाते थे। आकाश में सफेद बादलों को देखकर उन्हें येसूबाई और कविकलेश की बहुत याद आती थी। एक दिन सन्ध्या काल लिम्ब गाँव का सदानन्द गोसावी दौड़ता हुआ युवराज के पास आया। उसने अपने मठ की बन्द की गयी वृत्ति को फिर से शुरू करने की माँग की। युवराज ने दूसरे दिन उसका निर्णय करने का निश्चय किया। उस रात शम्भूराजा का मन बहुत आश्वस्त और शान्त था। बहुत दिनों के बाद राज्य के कार्यव्यापार में ध्यान देने का उन्हें अवसर मिला था। दुर्गाबाई और राणूबाई के साथ चर्चा करते हुए बड़े महाराज का प्रसंग आ गया। शम्भूराजा की मुखमुद्रा विषादग्रस्त हो गयी। यह देखकर राणूबाई ने पूछा, "शम्भूराजा! कितना गुस्सा करोगे हमारे पिताजी पर?" 106 :: सम्भाजी
"पिताजी को कर्नाटक से आये कितने दिन हो गये? इसका विचार आप लोगों ने किया?" "कितने दिन?" "वे गर्मियों में चैत्र के महीने में स्वराज्य में लौटे। इस बात को एक दो नहीं छः महीने हो गये। आज मेरी उम्र बीस वर्ष है। इतने बड़े और समझदार पुत्र को उसका पिता छः-छः महीने तक नहीं मिल पा रहा है। वे मिलने के लिए सन्देश तक नहीं भेजते। मैंने स्वयं मिलने की इच्छा व्यक्त की तो उसका उत्तर तक नहीं मिलता। राणू दीदी, दुर्गाबाई आप ही बताएँ कि इस संभाजी ने ऐसा कौन सा पाप किया है? सारी दुनिया के लिए नदी की तरह अविरल भाव से प्रवाहित होने वाला आपके शिवाजी महाराज का हृदय अपने स्वयं के बेटे के लिए इतना शुष्क क्यों रहता है? आखिर यह संभाजी कोई भावनाहीन नींव का मौन पत्थर तो नहीं है।" जिस प्रकार आकाश में गर्जन तर्जन के साथ बादल एकत्र होते हैं और तड़पते हुए वर्षा के पानी की मसक खाली करके नष्ट हो जाते हैं, उसी प्रकार शम्भुराजा बहुत देर तक छटपटाते हुए लेटे रहे। दूसरे दिन लिम्ब गाँव के गोसावी के साथ पूरी पूछ ताछ करने के बाद उन्होंने कहा, "आप पर अन्याय हुआ है, यह स्पष्ट दिख रहा है। किन्तु इस सम्बन्ध में सरकारी अधिकारी होने के नाते अण्णाजी दत्तो को ही आदेश देना चाहिए। मैं आज ही उन्हें सन्देश भेज देता हूँ।" सदानन्द गोसावी का चेहरा उतर गया। घुटनों के बल उठते हुए उसने बड़ी व्यग्रता से अभिवादन करते हुए कहा, "युवराज! ऐसा अधूरा न्याय न करें। आप अपनी मुहर लगाकर, कागज़ बनाकर देने की कृपा करें।" "देखो गोसावी, पिताजी के कार्यव्यापार में हम व्यतिक्रम कैसे पैदा कर सकेंगे? सरकारी मुहर लगे कागज आपको अण्णाजी दत्तो के पास से ही मिलेंगे। आप चिन्ता न करें। अण्णाजी दत्तो को हम आज ही सन्देश भेज देते हैं। चार पाँच दिन बाद आप उनसे जाकर मिल लें।" "जैसी आज्ञा।" कहते हुए गोसावी सिर हिलाकर बाहर निकल गये। चार सप्ताह और बीत गये। समर्थ रामदास स्वामी अभी तक गढ़ पर नहीं लौटे। उनके पट्ट शिष्य से और किले के अधिकारी बासुदेव बालकृष्ण तथा कृष्णाजी भास्कर से युवराज बार बार पूछ रहे थे कि स्वामी जी कब आएँगे? उन्हें उत्तर मिलता था कि स्वामीजी कोल्हापुर और बेलगाँव में ही अटके पड़े हैं। परली और सज्जनगढ़ के परिसर में घूम-घूमकर युवराज ऊब गये थे। एक महीने के बाद गोसावी फिर आये। युवराज ने उन्हें देखते ही पूछा, "मिल गये कागज?" सम्भाजी • 107
"कैसे मिलेंगे?" सदानन्द गोसावी संतप्त होकर बोले, "युवराज, आपके आदेशानुसार तीन हफ्ते तक रायगढ़ की बाहरी सीढ़ियाँ बैठे-बैठे घिस गयीं। अण्णाजी और राहुजी की टालने वाली और उपहास करने वाली नजरों को देखते देखते ऊब गया। अन्त में हिम्मत करके अण्णाजी से पूछ लिया—"पन्त सच्चाई क्या है? हमें बता दीजिए।" तब अण्णाजी ने कहा, "हमारा राजा आजकल पन्हालगढ़ पर रहता है, सज्जनगढ़ पर नहीं।" जब दुखी होकर गढ़ से उतरने लगा तो लोगों की चर्चा सुनकर बात समझ में आयी। "कैसी चर्चा ?" "लोग कह रहे थे महाराज की पहले जैसी कृपा आप पर नहीं है। इसलिए आपके द्वारा दिये गए न्याय का कोई अर्थ नहीं है। आपके आदेश का कार्यान्वयन तो दूर आपके द्वारा दिये कागज़ को हाथ लगाने का कष्ट भी अधिकारी नहीं उठाना चाहते।" बात करते-करते सदानन्द गोसावी जलती तीली को घास की गट्टी में फेंककर चले गये और आग भड़कती गयी। शम्भुराजा का चेहरा क्रोध से लाल हो गया। उनकी आँखों में खून उतर आया। कनिष्ठ श्रेणी के कर्मचारियों को शम्भुराजा ने बैठक से बाहर जाने को कहा। किले के अधिकारी वासुदेव बालकृष्ण की ओर अपनी सन्तप्त दृष्टि घुमाई। वासुदेव बालकृष्ण हड़बड़ा गये। उन्होंने युवराज के सामने विनम्रता से हाथ जोड़कर कहा, "महाराज उस गोसावी का कहना बिलकुल झूठ नहीं था। ऊपर से आदेश दिया गया है कि युवराज द्वारा दिये गए आदेशों और निर्णयों को जहाँ तक सम्भव हो टाला जाए।" "लिखित ?" "लिखित नहीं, मौखिक।" "पन्हाला से? पिताजी का आदेश?" "वहाँ से नहीं, रायगढ़ से, राहुजी सोमनाथ और अन्य लोगों से।" "उसके ऊपर आपने क्या निर्णय लिया?" "सरकार हम आपके नौकर हैं। जब रायगढ़ से मौखिक आदेश आया तो उसके स्पष्टीकरण के लिए हमने महाराज के पास पन्हालगढ़ दूत भेजे। किन्तु चार दिन वहाँ रहने के बाद भी दूत को महाराज से कोई स्पष्ट उत्तर नहीं मिला। आप ही बताएँ हम सेवक लोग इसका क्या अर्थ समझें?" शम्भुराजा उदासी से हँसे। कर्मचारियों के सामने वे कुछ बोले नहीं। किन्तु वहाँ उनका रहना अब कठिन हो गया। वे दुर्गाबाई और राणूबाई से बोले, "कर्नाटक से लौटे लगभग आठ महीने बीत गये। पिताजी हमें मिले नहीं। यहाँ सज्जनगढ़ पर 108 :: सम्भाजी
भी हमें आये दो-ढाई महीने हो गये। समर्थ स्वामी का कुछ अता-पता नहीं। मुझसे ऐसा कौन सा पाप हो गया है कि रायगढ़ के स्वामी ने हमें इस प्रकार झटक दिया और सज्जनगढ़ के स्वामी हमें इस प्रकार टाल रहे हैं? युवराज होते हुए भी प्रजा की शिकायत हम सुन नहीं सकते। यदि कोई फैसला दिया तो कर्मचारी सच सुनेंगे नहीं। अपने लोगों को, देश को, अपनी मिट्टी को यदि हम इतने पराये लग रहे हैं तो किसी परकीय देश में चले जाने में कौन सी बुराई होगी?'' ‘‘शम्भुराजा धीरज रखो। संकट टल जाएँगे।’’ राणूबाई ने युवराज को अपनी बाँहों में भर लिया। उन्हें शान्त करने का प्रयास करती रहीं। उसी दोपहर को माहुली के सूबेदार खेलोजी नाइक भणगे युवराज से मिलने आये। खेलोजी बाबा की उम्र सत्तर की ओर झुक रही थी। किन्तु अभी भी वे एक युवक के उत्साह से कार्य करते थे। बड़े महाराज पर उनकी बड़ी निष्ठा थी। शम्भुराजा को वे प्राणों से भी अधिक चाहते थे। खेलोजी बाबा से शम्भुराजा ने कहा, ‘‘कल बड़ा पवित्र दिन है। इसलिए कल हम पवित्र स्नान के लिए आपके माहुली क्षेत्र में आ रहे हैं। मेरे आने की सूचना किसी को भी न दें। कल प्रातः एकदम शान्त चित्त से अपने स्वराज्य में स्नान करने दें।’’ 3 दिसम्बर, 1678 भोर में ही शृंगारपुर की अश्वसेना में से चुने हुए तीन सौ सवारों का दल लेकर संभाजी माहुली क्षेत्र की ओर निकल पड़े। सवेरा होते-होते उनके घोड़े कृष्णा नदी के तट पर पहुँच गये। माहुली गाँव के पास कृष्णा और वेण्णा नदियों का संगम है। सवेरे के ठंडे वातावरण में शम्भुराजा संगम के पास खड़े थे। दोनों नदियां का पानी एक दूसरे की बाँहों में उलझ रहा था। नदी के इस पार हिन्दवी स्वराज्य अर्थात शिवाजी महाराज का प्रदेश था और दूसरी ओर बीजापुर के आदिल शाह का। उनके सतारा क्षेत्र का रहिमतपुर थाना यहाँ से अधिक दूर नहीं था। इन दोनों नदियों के किनारे बहुत पुराने पीपल और बरगद के पेड़ थे। जटाधारी बरगद तपस्या में समाधिस्थ महान सन्तों जैसे दिखाई पड़ते थे। आज पुण्य पर्व था इसलिए बहुत सवेरे से ही वहाँ संगम पर पंडितों, भिक्षुकों, यात्रियों और साधुओं की भीड़ जमा हो गयी थी। युवराज अपने प्रिय हैबती घोड़े से जैसे ही नीचे उतरे, खेलो बाबा की सफेद दाढ़ी-मूँछों में प्यार की मुस्कान बिखर गयी। शिवाजी महाराज के पुत्र का स्वागत करते हुए उनकी बूढ़ी पीठ नम्रता से और भी झुक गयी। संगम पर पूजा-पाठ आरम्भ था। किन्तु संभाजी का ध्यान उस पूजा-अर्चना की ओर रंचमात्र भी नहीं था। वे नदी के पूर्वी छोर की ओर गर्दन घुमाकर बार-बार देख रहे थे। देखते-देखते प्रभात का प्रकाश फैल गया। संगम का हरा परिसर साफ सम्भाजी 109
साफ दिखने लगा। घाट पर पंछियों का कलरव और भावुक भक्तों का शोर बढ़ने लगा। नदी में अनेक स्थानों पर गहरी खाई बन गयी थी। वैसे नदी में कमर के बराबर ही पानी था। अनेक भक्त इस पार से उस पार तक आ जा रहे थे। खेलोजी उनकी ओर बड़ी स्नेहभरी दृष्टि से देख रहे थे। शम्भुराजा ने भी वहीं पर स्नान किया। नदी के उस पार के खेत से अचानक कुछ आवाज आयी। एक हरी झंडी कुछ संकेत करके अदृश्य हो गयी। इस दृश्य से खेलोजी चकित हो उठे। किन्तु वह शत्रु का क्षेत्र था, इसलिए खेलोजी ने अधिक ध्यान नहीं दिया। शम्भुराजा ने शीघ्रता से वस्त्र पहने। सिर पर जरीदार रेशमी टोप रखते ही उनका रूप निखर आया। किसी को भी बन्दी बना लेने वाली उनकी आँखें, जादू का प्रभाव डालने वाला गोरा रंग, शिवाजी महाराज जैसी ही गरुड़ सी नाक। उन्हें देखते हुए खेलोजी को लगा कि स्वयं शिवाजी महाराज ही आ गये हैं। इसी धुन में वे युवराज को देखते रह गये। इसी समय शम्भुराजा ने अपने हैवती घोड़े की लगाम खींचकर उसे संकेत किया। घोड़ा उत्साह से नाच उठा और हिनहिनाया। जिस तरह बाघ अपने अगले पैरों को उठाकर झपट्टा लगाता है, उसी तरह घोड़ा अपने अगले पैरों को उठाकर मस्ती से झूम गया। खेलोजी कुछ क्षण के लिए मुग्ध हो गये। युवराज ने नदी के किनारे से परली की ओर घोड़ा ले जाने के बदले सीधे नदी के पानी में उतार दिया। संभाजी राजा के पीछे उनके समर्थक सैनिकों ने भी अपने घोड़ों को नदी में उतार दिया। सूर्योदय के पूर्व ही नदी के उस पार मुगल सैनिकों की एक कतार बहुत पहले से ही आकर खड़ी हो गयी थी। हरे रंग के कुर्ते सलवार पहने, लम्बी लम्बी दाढ़ी-मूँछ वाले मुगल घुड़सवार शम्भुराजा को मुग्ध भाव से देख रहे थे। युवराज के नदी में उतरते ही मुगल घुड़सवारों ने अपने हरे झंडे और अपनी तलवारों को हवा में लहराया। 'अल्लाहो अकबर' और 'जय जय शम्भुमहाराज' के नारे लगाये। यह अप्रिय और अभद्र दृश्य देखकर खेलोजी का कलेजा काँप उठा। वे भी जो वस्त्र पहने थे उनके साथ ही नदी में छलाँग लगा दी। हाथ में नंगी तलवार लेकर शम्भुराजा का पीछा करते हुए वे चिल्लाये—"छोटे राजा, कहाँ चले?" शम्भुराजा ने शीघ्रता से गर्दन घुमाई और दुखी स्वर में बोले, "खेलोजी, बाबा, अब सब समाप्त हो चुका है। इसके बाद आपके और हमारे रास्ते अलग अलग हैं।" "ऐसे क्या कट्टर शत्रु की तरह बोल रहे हो, युवराज? शिवाजी महाराज का पुत्र और खान की छाया में? पूनम कैसे खड़ी होगी अमावस के साथ?" खेलोजी जी-जान से युवराज को मना रहे थे, "बस युवराज! अब इससे आगे एक कदम भी न बढ़ाओ। चुपचाप वापस आ जाओ।" 110 · सम्भाजी
शम्भूराजा ने पानी में ही घोड़े को घुमाया। उन्होंने आश्चर्य से देखा कि खेलोजी के पीछे तीस चालीस मराठे पानी में उतर चुके थे। वे शम्भूराजा की ओर ही बढ़ रहे थे ! उन्हें युवराज को इस अविचारपूर्ण कार्य से पीछे लौटाना था। युवराज को भय लगा कि ये मराठे उन पर बरसेंगे और उन्हें आगे जाने से रोकेंगे। इसलिए वे म्यान से तलवार खींचकर सावधान हो गये। खेलोजी ने जान की बाजी लगाकर अपने घोड़े को आगे दौड़ाया। युवराज के समीप जाकर ये बूढ़ी हड्डियाँ आँखों में आँसू भरकर बोलीं, "नहीं युवराज ! ऐसी बात मुँह से न निकालो। आपके इस कृत्य से शिवाजी महाराज का कलेजा चूर चूर हो जाएगा।" शम्भूराजा ने घोड़े पर से कृष्णा का पानी हाथ में लिया और गरजती आवाज में बोले, "खेलो बाबा, कृष्णमाता की सौगन्ध खाकर कहता हूँ, उचित समय आने पर आपको मालूम हो जाएगा कि संभाजी कौन है ? और कैसा है ? सह्याद्रि के साथ सारी दुनिया को जीतकर आपके पास प्रणाम करने के लिए आऊँगा।" यकायक कृष्णा नदी में भाग-दौड़ का खेल शुरू हो गया। 'रुकिए रुकिए' कहते हुए मगठे युवराज के पीछे दौड़ पड़े। युवराज का घोड़ा आगे न बढ़े इसलिए घेरा बनाकर पानी में गोल गोल घूमने लगे। यह देखकर कि मराठे युवराज को रोक रहे हैं, मुग़ल सैनिक पानी में कूद पड़े। मराठों के प्रयत्न का वे विरोध करने लगे। खेलोजी बहुत हठी स्वभाव के थे। शम्भूराजा ने देखा कि खेलोजी का घोड़ा उनके घोड़े की पूँछ से भिड़ रहा है। युवराज हड़बड़ा गये। तलवार से खेलोजी का सामना करना आसान था। किन्तु यदि खेलोजी ने 'शम्भू बच्चे शम्भू बच्चे' कहते हुए युवराज को गले से लगा लिया होता तो उनकी ममता के आगे युवराज की तलवार नीचे गिर जाती। उस क्षण को टालने के लिए शम्भूराजा ने सीधे किनारे की ओर अपना घोड़ा दौड़ाया। युवराज के सामने एक खड़ी चट्टान थी। यह चट्टान बहुत ऊँची थी। इसके पार जाने के लिए घोड़े को दाहिनी या बाईं ओर तिरछे होकर ले जाने की आवश्यकता थी। किन्तु उम भागा दौड़ी को टालने की धुन में युवराज ने अपना घोड़ा सीधे सामने की ओर दौड़ाया। किन्तु खड़ी चट्टान का अनुमान लगाकर घोड़ा अपनी जगह पर नाचने और हिनहिनाने लगा। युवराज ने क्रुद्ध होकर जोर से लगाम खींची और एड़ लगाई घोड़े की नाक से खून की धारा बहने लगी। किन्तु अपनी पीठ पर बैठे मालिक की जरूरत घोड़े की समझ में आयी। वह सचेत हो गया और खड़ी चट्टान पर चढ़ने की कोशिश करने लगा। घोड़ा भी समझ गया था कि इस खड़ी चट्टान को पार करना उसके बूते का नहीं था, फिर भी वह यह पागल प्रयत्न कर रहा था। वह बहुत प्रयत्नपूर्वक आगे बढ़ने लगा और इस प्रयत्न में ही नीचे गिर गया। घोड़े के साथ ही युवराज की भी मृत्यु का क्षण आ गया था, किन्तु उन्होंने घोड़े के गिरने के पहले ही छलाँग लगाकर अपने को बचा लिया। सम्भाजी 111
उस कठिन प्रयास में हैबती घोड़े की हड्डियाँ टूट गयी थीं। फेफड़े के फट जाने के कारण वह अन्तिम साँस ले रहा था। उसी समय किनारे पर मुगल सैनिक 'आइए युवराज, जल्द आइए' कहकर पुकार रहे थे। पीछे की ओर खेलोबाबा की बाँहें पकड़कर कुछ मुसलमान सिपाही उन्हें रोक रहे थे। घोड़े का सीना फट जाने से बहुत खून बह रहा था। उसकी नाक से तेज आवाज आ रही थी। पैरों की छटपटाहट में उसकी वेदना की तड़प को युवराज से देखा नहीं गया। किनारे खड़ी मुगल सेना को भूलकर वे पीछे भागे और घोड़े की जीन से बँधी चमड़े की थैली में पानी भरकर घोड़े के मुँह में डालने लगे। देखते देखते घोड़े का शरीर अकड़ गया। उसने हमेशा के लिए अपनी आँखें बन्द कर लीं। युवराज एक बार फिर निश्चय करके किनारे पर खड़ी मुगल सेना की ओर चल पड़े। हरे रंग में सजी मुगल सेना की ओर चलते समय उनका कलेजा फटा जा रहा था। कुछ तो भय भी उन्हें आगे जाने से रोक रहा था। नये रास्ते पर कदम बढ़ाने से पहले यह कैसा अपशकुन हुआ? किन्तु जाएँगे भी कहाँ? पीछे छूट गये स्वराज्य के वे खेत, वे लोग, वे किले, वे महल भी तो उनके कहाँ थे? सामने वाले हरे दृश्य के आगे क्या रखा है? यह भी ठीक ठीक ज्ञात नहीं था। किन्तु क्या वीरता ही मनुष्य का सच्चा आभूषण नहीं है? युवराज सोचते हैं—'अपने दादाजी शाहजी महाराज आदिलशाह के दरबार में नौकरी करते थे। तब पिताजी ने आदिल शाही के विरुद्ध बगावत नहीं की थी क्या? आज स्वराज्य की अविश्वास और अन्याय की खाई में सड़कर मरने की बजाय परदेश में प्रयत्न करेंगे, पराक्रम करेंगे, यश की माला पहनेंगे और फिर से पिताजी का मंगल आशीर्वाद लेने के लिए स्वराज्य में वापस आ जाएँगे। यह सब करने के लिए दिलेरखान नामक सोने की मछली के मुँह में बहादुरी से छलाँग के अतिरिक्त अपने हाथ में बचा ही क्या है?' पाँच सह्याद्रि का बछड़ा मुगलाई के जंगल को रौंदता हुआ तेजी से बढ़ा जा रहा था। उसके साथ चलने वाली मुगल सेना की टुकड़ी हुड़दंग मचाती हुई चल रही थी। यह घटना ही मुगलों के लिए विलक्षण थी। मराठों का युवराज बिना प्रयत्न के ही मुगलों के काँटे में फँस रहा था। इस खबर को सुनते ही दिल्ली के औरंगजेब से लेकर दक्षिण के दिलेरखान तक सभी अमीर उमराव प्रसन्न होने वाले थे। 112 :: सम्भाजी
जैसे-जैसे अपना प्रदेश पीछे छूटने लगा वैसे-वैसे शम्भूराजा के मन में घबराहट होने लगी। जलती हुई आग से बचने के लिए जब कोई आदमी बाहर निकलता है तो भी अंगारों के कण चटककर उसे क्रूरतापूर्वक जलाते हैं। ऐसी ही मानसिक अवस्था शम्भूराजा की हो रही थी। उनके इस कृत्य में बहादुरी से अधिक धोखा था। वाठार गाँव के पास दिलेरखान का सूबेदार एखलासखान और उसका भतीजा गैरत तीन हजार की सेना लेकर खड़े युवराज की राह देख रहे थे। उन दोनों ने युवराज का स्वागत किया। दिलेरखान द्वारा दी गयी हिदायतों के अनुकूल सब कुछ हो रहा था। सालपा घाट पीछे छूट गया। नीरा नदी भी पीछे गयी। कुरकुंभ गाँव के पास सजाये गये शामियाने के पास दिलेरखान पागल की भाँति इधर-उधर घूम रहा था। उसने जान बूझकर युवराज के स्वागत के लिए एखलास को आगे भेजा था। उसका मराठा जाति पर बिलकुल विश्वास नहीं था। उसे शंका थी कि कहीं शिवाजी और संभाजी बाप बेटे ने कोई षड्यन्त्र न रचा हो? इसी आशंका से उसका मन सम्भ्रमित हो रहा था। दिलेरखान बीच बीच में गद्गद होकर हँसता भी था। क्योंकि एक घंटा पहले दो घुड़सवार यह खुशखबरी लेकर शामियाने में पहुँचे थे 'कि शिवाजी का बेटा अपनी सेना में आ गया है।' उन दूतों के इस सन्देश पर दिलेरखान को क्षणभर के लिए विश्वास ही नहीं हुआ। पुरन्दर के जानलेवा घेरे में जब दिलेरखान ने मुरारबाजी देशपांडे की गर्दन काटी थी और खून से लथपथ हाथों को अपने किनखाफी कुर्ते से पोंछा था तब भी उस आसुरी आनन्द में आज जितनी खुशी नहीं मिली थी। अचानक दिलेरखान की दृष्टि दो-तीन कोस के मैदान की ओर गयी। आसमान में धूल के बादल उड़ाते हुए पागल घोड़े मस्ती से दौड़ रहे थे। कुछ समय में ही सेना दिलेरखान की दृष्टि सीमा में आ गयी। उसे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था। उसने अपनी आँखों से आनन्द के आँसू पोंछे। सामने देखता है तो सिर से पाँव तक सजाये गये हाथी हौदे में एखलासखान के साथ संभाजी राजा रोब से बैठे थे। शिवाजी महाराज और संभाजी की मुखाकृति में पर्याप्त समानता थी। दिलेरखान उस हौदे को टकटकी लगाए पागल की तरह देखता रहा। परिचारकों का दल आगे दौड़ा। उन्होंने हाथी से उतरने के लिए सीढ़ी खड़ी की। किन्तु दिलेरखान, स्वयं ही, सीढ़ियों से चढ़कर तेजी से ऊपर गया। "आइए दक्खिन की शान! शेर संभाजी महाराज आइए।" ऐसा कहते हुए उसने वहीं पर संभाजी को बाँहों में भर लिया। हज की यात्रा में जैसे छूटा हुआ कोई छोटा भाई दस-बीस वर्ष बाद वापस आ गया हो। उसके आने की जैसी खुशी होती सम्भाजी :: 113
है। वैसी ही खुशी दिलेरखान को हो रही थी। वह सोच नहीं पा रहा था कि शम्भुराजा को कहाँ रखे और कैसे रखे ? दोपहरी के एकान्त में दोनों की बातें चल रही थीं। यहाँ तक आये हुए मराठों के स्वाभिमानी युवराज को अपनी किसी मूर्खता से नाराज न करके, प्यार का गलीचा फैलाकर अपने क्षेत्र में ले जाने के लिए बहुत सावधानी से कार्य कर रहा था। वह युवराज को उत्तेजित करते हुए बोला, “युवराज, इसके आगे की आपकी जिन्दगी में आनन्द-ही-आनन्द है। शहजादे, अब किसी बात की फिक्र न करना। आपकी नाराजगी और रायगढ़ के बेढंगेपन की पूरी खबर है आपके इस भाईजान को।” शम्भुराजा चुप थे। दिलेरखान ने विश्वास का हाथ आगे बढ़ाते हुए कहा, “लेकिन शहजादे, ममता से अन्धे होकर अपनी सियासती का मजहब भूलने का पाप मत करो। अपनी हुकूमत सँभालने के लिए माँ बाप यार दोस्त मेहमान आदि को अपने कब्जे में रखना पड़ता है। कल आपकी सौतेली माँ सोयरारानी अपने बेटे के लिए ही राज्य माँगने वाली है। उनकी इच्छा के सामने आपके अब्बाजान शिवाजी शरणार्थी बन जाएँगे। अपने पुराणों को पढ़ो, इतिहास को पढ़ो। रावण ने अपने भाई जान के साथ जंग किया, कुश, लव ने राम के साथ, धर्मराज ने अपने मामा शकुनी के साथ—इतना ही नहीं खुद औरंगजेब ने भी अपने बूढ़े बाप के साथ जंग किया था। जंग किये बिना फतेह नहीं फतेह के बिना कीर्ति नहीं।” दिलेरखान को अभी बहुत भाग दौड़ करनी थी। शम्भुराजा को मालूम हुआ कि कुरकुम्भ में उनका जो स्वागत हुआ था उससे कहीं अधिक भव्य और शानदार स्वागत की तैयारी बहादुरगढ़ पर आरम्भ हो गयी थी। बहादुरगढ़ का नाम सुनते ही संभाजी राजा का गला सूख गया। उनके तनाव भरे चेहरे के पीछे क्या कारण था ? यह दिलेरखान की समझ में भी नहीं आ रहा था। मुगलों की फौज आगे बढ़ रही थी। सह्याद्रि की श्रेणियों की कतारें पीछे छूट गयीं। भीमा नदी के किनारे का हरा भरा प्रदेश दिखाई दे रहा था। दक्खिन प्रदेश की जिम्मेदारी औरंगजेब ने इससे पहले अपने दूधभाई बहादुरखान कोकलताश जाफरजंग पर सौंपी थी। उसी ने भीमा नदी के किनारे पेड़गाँव के पास एक बहुत बड़ा किला बनवाया था। बहादुरखान कोकलताश ने अपने ही नाम पर किले का नाम बहादुरगढ़ रखा था। शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक के बाद रायगढ़ के महल में पहली बार बहादुरगढ़ का नाम संभाजी ने सुना था। इस किले पर उत्तम नस्ल वाले एक सौ कीमती अरबी घोड़ों के साथ एक करोड़ रुपये की राशि पहुँचा दी गयी है। यह समाचार सुनकर शिवाजी महाराज सावधान हो गये थे। एक दिन अचानक लिंपण गाँव की पश्चिम दिशा से दो हजार मराठा सैनिकों के बहादुरगढ़ की ओर लुके-छिपे आने की खबर पाकर बहादुर कोकलताश बहुत 114 :: सम्भाजी
प्रसन्न हो गया। उसने पश्चिमी दरवाजे पर पहरेदारों को जानबूझकर असावधान रहने का आदेश दिया और बड़ी चालाकी से दो हजार मराठा सैनिकों को अन्दर ले लिया। किन्तु जब मराठा सैनिकों ने किले में खड़े हजारों सैनिकों को पहरा देते हुए देखा तो वे डर गये। डरी हुई मराठा फौज भैरोबा की ओर से बाहर भागने लगी। बहादुर खान खुशी से पागल हो गया । उसके सभी सैनिक मराठा सैनिकों पर जानलेवा हमला करके पीछा करने लगे। अब बहादुर एकाकी और उदास दिखने लगा था। किले में रहने वाली महिलाओं खानसामों, बच्चों, पानी भरने वालों और मामूली नौकरों चाकरों के अतिरिक्त कोई नहीं रह गया था। यहाँ तक कि किले के बाहर दरवाजों को बन्द करने के लिए भी कोई सैनिक पीछे नहीं छूटा था। इसी समय दूर काष्टी की ओर से घने पेड़ों और नदी नालों में छुपी बैठी सात हजार सैनिकों की खास मराठा फौज सामने आ गयी। किले पर उनका कहीं भी विरोध या प्रतिरोध नहीं हुआ। दो सौ अरबी घोड़ों को लेकर मराठे बड़ी आसानी से निकल गये। जाते जाते जिस प्रकार अपने द्वारा मारे गये हिरन बाघ पीठ पर लादकर ले जाता है उसी प्रकार मराठे एक करोड़ रुपयों का खजाना भी अपने साथ लेते गये। शक्तिमान शिवाजी महाराज ने शक्तिशाली मुगलों को एक बार फिर उनकी औकात बता दी थी। आज शम्भुराजा भयानक दबाव में थे। वे बार-बार सोचते थे—'हम स्वराज्य का नाम रोशन करने के लिए निकले हैं या डुबोने के लिए?' दूरी पर बहादुरगढ़ की आड़ी तिरछी आकृति दिखने लगी। दाहिनी ओर भीमा नदी का विशाल विस्तार दिख रहा था। शम्भुराजा के स्वागत के लिए शहनाई ढोल, तासे आदि मंगलवाद्य बज रहे थे। हाथी के ऊपर हौदे में युवराज के साथ दिलेरखान बैठा था। किले के अन्दर मुगलों ने एक जीती जागती सुन्दर और समृद्ध नगरी बसायी थी। नगर में घरों के शीर्ष पर और बुर्ज के शिखर पर औरंगजेब की हरी झंडियाँ फहरा रही थीं। बहादुरगढ़ का किला मुगलों के अहंकार का प्रतीक था। इसकी पत्थर की दीवारें मजबूत और बुर्ज शानदार थे। यह दक्षिण की मिट्टी को पेड़ की पत्तियों की तरह नगण्य मानता था। इसके पहले बहादुरगढ़ के रहने वालों ने दक्खिन के सरदारों को सिर नीचा किये, हीरे मोती से भरी थालियों को हाथ में लिये दरवाजे के भीतर आते देखा था। अनेक दक्खिनी अमीर उमरावों का स्वागत चाबुक से किया गया था। परन्तु आज पहली बार दक्खिन के एक सुन्दर और रोबीले राजकुमार को हाथी पर बिठाया गया था। उसके लिए शानदार जुलूस निकाला गया था। अलिन्दों पर, छतों पर, और गली गली में एकत्र हुई महिलाओं और बच्चों की भीड़ शिवाजी महाराज के पुत्र को बड़े ध्यान से देख रही थी। आज के जुलूस में उत्साह का जलवा था। बहुत सज-धज थी। किन्तु अकारण ही शम्भुराजा को किसी चीज के जलने की दुर्गन्ध आ रही थी। सम्भाजी :: 115
युवराज का मुँह सूख गया। चमड़े की थैली को मुँह से लगाकर जल्दी जल्दी पानी पीने लगे। किन्तु उनकी प्यास बुझ नहीं रही थी। भीमा नदी के किनारे का वह किला अनुमानतः छः सौ एकड़ जमीन पर फैला हुआ था। भीतरी प्राचीर के अन्दर मुगल नगरी बसी थी। बाहर की प्राचीर पूर्व की ओर लगभग डेढ़ कोस तक फैली थी। उसने भीमा से मिलने वाली छोटी नदी सरस्वती को भी अपने भीतर समेट लिया था। रायगढ़ या राजगढ़ जैसे पहाड़ी किलों में ही युवराज को रहने की आदत थी। जिससे बहादुरगढ़ की आयताकार हवेलियाँ बड़े-बड़े महल ऊँचे ऊँचे मन्दिरों और मस्जिदों की चोटियाँ देखकर शम्भूराजा को बचपन में देखा गया आगरा शहर याद आ रहा था। बहादुरगढ़ पर साठ-सत्तर हजार रैयत और सैनिकों का निवास था। वहाँ पर अरबी, ईरानी, खोजा, मुगल, दक्खिनी मुसलमान मराठा सैनिक, हुकूमत करने वाले उत्तर के मुगल, कुनबी, कारीगर, मिस्त्री पानी भरने वाले विविध जमातों और वर्णों के लोगों की भीड़ जमा थी। किले के बीचोंबीच कुछ ऊँची जगह पर बहादुर खान ने एक चार बरामदे वाला बड़ा महल बनवाया था। उस सागौन और शीशम के महल में दीवारें और पर्दे नहीं थे। इसलिए वहाँ आमसभा में बैठे राज्य कर्मचारियों और प्रजा को भीमा नदी के प्रवाह का दर्शन होता था। दिलेरखान के साथ शम्भूराजा जब उस महल में प्रवेश कर रहे थे तब वहाँ दीवाली जैसी रोशनी की गयी थी। मुहल्लों और गलियों में पटाखे और अनार फूट रहे थे। किनारों पर भव्य दीप ज्योति जल रही थी। जलते दीपों की ज्योति भीमा के शान्त प्रवाह में झिलमिला रही थी। यह सारी रोशनी खिलखिलाकर हँसते हुए बगल के अँधेरे से कह रही थी—“शिवाजी का पुत्र संभाजी मुगलों से मिल.गया।‘’ समारोह में शम्भूराजा की बहादुरी के गीत गाये जा रहे थे। उन्हें महँगे वस्त्र और रत्नमालाएँ अर्पित की जा रही थीं। चारों ओर बैठे दरबारियों और सरदारों पर युवराज की नजर घूम रही थी। इसी बीच शम्भूराजा के ठीक सामने बैठे एक लम्बा पतला उमराव युवगज को टकटकी लगाए देख रहा था। युवराज का ध्यान उसकी ओर आकृष्ट हुआ। उस आदमी की दाढ़ी मुगलों जैसी थी। बहुत दिनों तक पराये प्रदेश में रहने के कारण उसका पहनावा, ठाट-बाट, सिर की पगड़ी आदि पक्के मुसलमान जैसा था किन्तु वह वास्तव में एक मराठा था। शम्भूराजा ने उससे आँख मिलाई तो उसके चेहरे पर घृणा का भाव आ गया और क्रोध से उसने अपनी आँखें दूसरी ओर घुमा लीं! बहुत दिनों के बाद मिलने वाला वह मराठा उमराव बजाजी नाइक का पुत्र महादजी था। इसी के साथ युवराज की बड़ी बहन सखुबाई का विवाह हुआ था। आज शत्रु के शिविर में शिवपुत्र का बड़ा सम्मान हो रहा था। कि शिवाजी महाराज द्वारा बहादुरगढ़ के गाल पर जड़ी गयी दूसरी जोरदार थप्पड़ को बहादुरगढ़ 116 :: सम्भाजी
अभी भूल नहीं पाया था। शिवाजी महाराज जब कर्नाटक की बड़ी लड़ाई के लिए निकल रहे थे तो अपनी अनुपस्थिति में उन्हें आशंका थी कि अनुपस्थिति का लाभ उठाकर दक्षिण में नियुक्त मुगल सूबेदार बहादुरखान जाफरजंग आक्रमण कर सकता था। इसीलिए उन्होंने खान के पास दोस्ती का पैगाम भेजा था। उन्होंने कहा था, “हिन्दवी स्वराज के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण किले बादशाह औरंगजेब को बिना शर्त भेंट करके स्वयं शरणार्थी बन जाएँगे क्योंकि इस उम्र में केवल शान्ति चाहिए।” इस प्रकार का प्रस्ताव लेकर मराठा दूत जब-जब बहादुरखान के पास पहुँचे तो उन्हें बिना सोंठ खाये ही खाँसी चले जाने जैसा समाधान मिला। काबुल, कंधार, अफगानिस्तान के साथ नित्य झगड़े से संत्रस्त औरंगजेब के मन को यह प्रस्ताव बहुत बड़ी विजय जैसा सुखद लगा। प्रसन्नतापूर्ण वातावरण में सारी बातें निश्चित हो गयीं। इस सन्धिपत्र को व्यावहारिक रूप देने के लिए शिवाजी महाराज ने केवल एक शर्त रखी थी। उन्हें सन्धिपत्र पर बादशाह औरंगजेब के हाथ के पंजे का निशान चाहिए था। बहादुर खान ने हँसते-हँसते इस शर्त को स्वीकार कर लिया। पंजे का निशान लेने के लिए कागज दिल्ली रवाना किया गया। कागज लौटने पर ही सब कुछ निश्चित होना था। उस आनन्द की बेहोशी में खान शिवाजी महाराज को उपहार के रूप में देने के लिए एक उत्तम हाथी और एक चन्दन की पालकी तैयार रखी थी। सन्धि की शर्तों और पंजे के निशान आदि एकत्र करने में कुछ महीने बीत गये। इसी बीच शिवाजी महाराज ने कर्नाटक की लड़ाई जीत ली। वहाँ से वापस आने पर खान के दूत जब सन्धिपत्र लेकर शिवाजी महाराज के पास पहुँचे तो शिवाजी महाराज ने सन्धिपत्र को फेंक दिया। बहादुर खान एकबार पुनः धोखा खा गया। औरंगजेब उस पर इतना क्रुद्ध हुआ कि दक्षिण की सूबेदारी उसे खोनी पड़ी। समारोह के बीच ही दिलेरखान ने बगल की ओर उँगली से इशारा किया। उसी ओर एक ऊँचा सजा-सजाया हाथी झूम रहा था। उसी की ओर संकेत करते हुए दिलेरखान ने कहा, “शहजादे, डेढ़-दो वर्ष पहले मराठों को भेंट करने के लिए बहादुर खान साहब ने यही हाथी तैयार कर रखा था। वही हाथी आज हम आप को भेंट करते हैं।” विशिष्ट लोगों की ओर हाथ उठाकर दिलेरखान ने प्रसन्नतापूर्वक कहा, “शम्भूराजा के लिए हमने शाही लिबास सोने और हीरे जवाहरात के गहने मँगवाये हैं। हम चाहते हैं कि यह सारा उपहार हमारी ओर से युवराज के बहनोई महादजी नाइक निम्बालकर उन्हें भेंट करें।” अगल-बगल खचाखच भरी भीड़ ने जोर से तालियाँ बजाकर दिलेरखान के प्रस्ताव का अनुमोदन किया। कुछ असन्तुष्ट और नाखुश चेहरा बनाकर महादजी नाइक उठकर खड़े हो गये। किन्तु उठते-उठते उनकी पीठ में जोर की मोच आ सम्भाजी :: 117
गयी और वे अपना चेहरा टेढ़ा करके अपनी जगह पर बैठ गये। तब दिलेरखान ने स्वयं वस्त्र, उपहार और राजा की पदवी देकर युवराज को सम्मानित किया। समारोह की समाप्ति पर दिलेरखान के साथ अन्य बहुत से लोगों ने युवराज से हाथी पर बैठने का आग्रह किया। किन्तु संभाजी राजा ने यह आग्रह स्वीकार नहीं किया वे अपने हवेली तक पैदल चलकर आये। दिलेरखान ने किले के अन्दर ही युवराज के ठहरने की व्यवस्था की थी। महादजी नाइक का निवास भी बगल के महल में था। अपने बहनोई का हाल-चाल जानने के लिए युवराज स्वयं जाकर उनके सामने खड़े हो गये। सामने बिछौने पर बैठे महादजी अपनी जगह से जग भी नहीं हिले। उन्होंने शम्भुराजा का तनिक भी सम्मान नहीं किया। अन्ततः युवराज ही उनसे बोले, "दाजी, कैसी है आपकी तबीयत?" "ठीक है।" महादजी ने क्रुद्ध स्वर में कहा। "झूठी मोच का बहाना करने से दर्द होगा भी कैसे?" महादजी ने क्रोध से संभाजी राजा की ओर देखा। बगल में थूकते हुए उन्होंने उल्टा प्रश्न किया— "शिवाजी महाराज को छोड़कर तू यहाँ क्यों आया संभा? क्या जरूरत थी यहाँ आने की?" "अपने बहनोई की तरह दूसरे का गुलाम बनने के लिए सोचकर।" "बिला वजह जले पर नमक न छिड़को संभा। मेरे जैसे मराठों की कितनी पीढ़ियाँ दूसरों की गुलाम बनती आयी हैं। किन्तु तुम बाप बेटों ने हिन्दवी स्वराज्य का जो संकल्प लिया है, वह तो पूरा करो।" महादजी के कठोर शब्दों ने युवराज के कलेजे के टुकड़े टुकड़े कर दिये। उनके चेहरे पर से दरबार की कान्ति गायब हो गयी। वैभव से परिपूर्ण उस नगरी में शम्भुराजा असीम उदासी और अकेलेपन का अनुभव करने लगे। दो दिन में ही रहिमतपुर से लम्बी यात्रा करके शाही पालकियाँ बहादुरगढ़ पर आ पहुँचीं। सज्जनगढ़ से निकलते समय युवराज को आशंका थी कि मुगलों के राज्य की ओर जाने में सम्भवतः उनका पीछा किया जाएगा। यह भी सम्भव था कि तलवारें निकलतीं और लड़ाई होती। इसीलिए शम्भुराजा ने दुर्गाबाई को अपने साथ नहीं लिया था। उन्हें समीप के मुगल थाने पर अपने कुछ विश्वस्त साथियों के साथ भेज दिया था। वहाँ के थानेदार ने ही उन्हें सकुशल बहादुरगढ़ पहुँचाया था। किन्तु दुर्गाबाई के साथ राणूबाई को देखकर शम्भुराजा को बहुत आश्चर्य हुआ। उन्होंने चिन्तित होकर पूछा— "यह क्या कर बैठी दीदी? वाई में घर गृहस्थी, बाल-बच्चे, घर-बार, नाते-रिश्ते छोड़कर यहाँ किसलिए आ गयी?" "जाने दो शम्भू! तुम्हें कभी माँ की स्नेह छाया तो मिली नहीं। जीजा माता भी नहीं रहीं। पिताजी ने भी तुम्हारी ओर से मुख मोड़ लिया। तुम्हें माया-ममता देने वाला घर का कोई व्यक्ति तुम्हारे साथ होना चाहिए न?" 118 :: सम्भाजी
दीदी की इस बात को सुनकर युवराज कुछ न कह सके। दिलेरखान ने युवराज के लिए सुन्दर ऊँची हवेली, अच्छे नौकर चाकर और धन सम्पदा की व्यवस्था कर रखी थी। शम्भुराजा की हवेली के पीछे एक नीची दीवारों वाला घर था। पुराने दिखने वाले, पत्थरों से बने मजबूत घर में किसी राजनीतिक कैदी को बन्द करके रखा गया था। अपनी हवेली से कभी रात में तो कभी दिन में शम्भुराजा की नजर उस रहस्यमय घर की ओर पड़ती थी। उस घर के दरवाजे के खुलने की आवाज न तो युवराज ने सुनी और न ही दुर्गाबाई ने। उस राजनीतिक कैदी की अवस्था किसी बड़े पिंजड़े में बन्द पशु जैसी थी। उस कैदी के लिए दिन में दो बार खिड़की से खाना फेंका जाता था। कभी दिन के धुँधले प्रकाश में तो कभी रात में मोमबत्ती के हल्के प्रकाश में उस राजनैतिक कैदी का चेहरा दिख जाता था। लगभग साठ वर्ष का, साधारण कद काठी का, बोलती आँखों वाला वह एक मुसलमान बूढ़ा था। साधारण कैदी की तरह किसी अँधेरी कोठरी में फेंक देने के बदले उसे राजनीतिक कैदी बनाकर उसे इस खास घर में रखा गया था। थोड़े दिनों में शम्भुराजा को सूचना मिली कि उस बन्दी का नाम मियाँखान है और वह अथणी का सूबेदार था। दो महीने बीत गये फिर भी दिलेरखान की आगे की चाल समझ में नहीं आ रही थी। शत्रु के शिविर में शम्भुराजा का दम घुटता था। बहादुरगढ़ की ज़ालिम हवेली में उन्हें किसी प्रकार नींद नहीं आती थी। माता भवानी के नाम का गले में बँधा ताबीज वे बार-बार अपनी आँखों पर रखते थे। अपनी जन्मभूमि की, प्रदेश की, अपने प्रिय पिता की बहुत याद आती थी। उनकी आँखों के सामने येसूबाई की प्रेरक पुतलियाँ बार बार दिखती थीं। युवराज का सन्ताप और मन्त्रस्त भाव की बेचैनी देखकर दुर्गाबाई और गणूबाई की जान और भी संकट में पड़ी थी। वे युवराज से भी अधिक जागरण करती थीं। अपने पति को मानसिक और भावनात्मक शान्ति देने के लिए दुर्गाबाई हर सम्भव प्रयास करती थीं। एक रात एक भयानक स्वप्न ने युवराज के हृदय को विदीर्ण कर दिया। वे अचानक जगे और भयभीत होकर बिस्तर पर बैठ गये। आसपास के नीम के पेड़ हवा से सनसना रहे थे। दुर्गाबाई भी डरकर उठी और युवराज का मुँह देखने लगीं। शम्भुराजा की आँखों के सामने से भीषण सपना हट नहीं रहा था। दिलेरखान द्वारा भेंट किया गया सजा सजाया हाथी पागल हो गया था। उसके खम्भे जैसे पैर शम्भुराजा के शरीर के चिथड़े चिथड़े कर रहे थे। युवराज का पूरा शरीर खून से लथपथ हो गया था। सम्भाजी 119
अजगर की चपेट में एक बहादुरगढ़ की फौलादी प्राचीरों को तोड़कर मराठी ढंग के गहने बेचने के बहाने एक सुनार किले में दाखिल हो गया। वह महाड़ पोलादपुर की ओर का रहने वाला था। वह जबान का मीठा और वार्तालाप में चतुर था। इसी कारण या किसी और कारण से उसने दुर्गाबाई को बहुत से गहने खरीदने के लिए विवश किया। वहीं बरामदे में शम्भुराजा को आते देखकर उस सुनार ने धीरे से लाखों के मूल्य की खबर सुनायी— ‘‘छोटे मालिक आप पर देवी की कृपा हो गयी है। लक्ष्मी घर आयी है। बच्ची और बच्ची की माँ दोनों श्रृंगारपुर में स्वस्थ और सुरक्षित हैं।‘‘ इस खबर को सुनकर शम्भुराजा का हृदय ममता से भर आया। उन्होंने अपने गले का हार निकालकर उस जासूस को भेंट कर दिया। अपनी पहली बच्ची के जन्म के समय मुझे श्रृंगारपुर में उपस्थित रहना चाहिए था। शम्भुराजा सोच रहे थे कि वहाँ यदि होता तो हाथी पर बैठकर जलेबियाँ बाँटता। राजकन्या की प्राप्ति की कल्पना मात्र से उनके रोंगटे खड़े हो गये। अपने महल में से—विशेष रूप से महल की पिछली खिड़की से शम्भुराजा की दृष्टि उस काले रहस्यमय घर की ओर अनेक बार जाती थी। उन्हें वहाँ बीच बीच में मियाँखान दिखाई पड़ जाते थे। अथड़ी के उस आदिलशाही सूबेदार के सम्बन्ध में पर्याप्त जानकारी शम्भुराजा को प्राप्त हो चुकी थी। मियाँखान आदिलशाही की सेवा में होते हुए भी उसकी और उसके परिवार की निष्ठा मुगल बादशाह के प्रति ही थी। मियाँखान दक्षिण की खबरें औरंगजेब तक पहुँचाने और मुगलों के हित की रक्षा करने का कार्य करता था। किन्तु मौके का लाभ उठाकर उसके शत्रुओं ने मियाँखान की शिकायत औरंगजेब से कर दी। आलमगीर स्वभाव से ही शक्की था। उसके लिए इतना मौका काफी था। उसने अथणी के लिए फौज भेजी। सिपाहियों ने मियाँखान को कैद करके बहादुरगढ़ पर खींच कर पहुँचाया। 120 :: सम्भाजी
धीरे-धीरे हर बात शम्भूराजा की समझ में आने लगी। मराठी राज्य का युवराज होने के नाते शम्भूराजा को किले में घूमने की चाहे जितनी छूट रही हो, किन्तु उनके महल के आसपास रात-बिरात धीमे-पाँव से गश्त लगाने वाली टोलियाँ घूमती रहती थीं। युवराज पर हमेशा निगरानी रखी जाती थी। यदि वे कभी भीमा नदी की विशाल धारा के किनारे घूमने जाते तो वहाँ भी उन पर निगाह रखी जाती। एक दिन शम्भूराजा ने इन स्थितियों से ऊबकर दिलेरखान से क्रोध के आवेश में प्रश्न किया- "खान साहब हम आपके मेहमान हैं या कैदी?" दिलेरखान का उनके बारे में क्या विचार है? यह शम्भूराजा की समझ में नहीं आ रहा था। इससे वे बहुत बेचैन हो रहे थे। युवराज के रूप में इतना बड़ा मोहरा हाथ लग जाने की खबर दिलेरखान ने तत्काल दिल्ली भेज दी थी। किन्तु औरंगजेब सहज ही उस पर विश्वास करने वाला नहीं था। उसने अपने विश्वस्त लोगों द्वारा इसकी जाँच कराने का निश्चय किया। उसके लिए यह पता लगाना जरूरी था कि जो युवक शिवाजी का बेटा बनकर मुगल फौज में आया था वह सचमुच शिवाजी का पुत्र था या कोई बनावटी युवराज था। दिल्ली दरबार युवराज के विषय में क्या निर्णय करेगा? यह दिलेरखान के लिए स्पष्ट नहीं था इसलिए दिलेरखान के मन की बात शम्भूराजा को भी स्पष्ट नहीं हो रही थी। शम्भूराजा की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। उन्हें न दिन को चैन था न रात को नींद। एक रात को उन्होंने पिछवाड़े की खिड़की से उस रहस्यमय घर में मोमबत्ती का प्रकाश देखा। खिड़की के पास मियाँखान आकर बैठा था। किसी असह्य दुख से वह व्याकुल हो रहा था। उसकी आँखों से धारासार आँसू बह रहे थे। दुख की तीव्रता के कारण उसकी नाक का अग्रभाग लाल हो गया था। लगता था वह स्वयं पर क्रुद्ध हो रहा है। असहाय होकर खिड़की की सलाखों पर सर पटकता था। दूसरे दिन दुर्गाबाई ने भी वही दृश्य देखा। शम्भूराजा का ध्यान आकर्षित करते हुए वे बोलीं, "पता नहीं किस दुःख से वह बेचारा तड़प रहा है? कल से देख रही हूँ, उसके आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं। अगली रात में भी शम्भूराजा ने वही दृश्य देखा। मियाँखान ऐसे तड़प रहा था जैसे किसी ने छोटी मछली को तपते तवे पर रख दिया हो। उसे देखकर शम्भूराजा ने दुर्गाबाई से कहा, "आप सवेरे भैरोंबाबा का दर्शन करने पिछवाड़े के दरवाजे से ही जाती हो न?" "हाँ, क्यों?" दुर्गाबाई का प्रश्न। "कल सवेग होने से पहले ही दर्शन करने जाओ और जाते-जाते स्वयं ही उसके दुख का कारण पूछ लो। किन्तु यह बात नौकर चाकरों के हाथ नहीं लगनी चाहिए। इसलिए आप स्वयं...।" सम्भाजी :: 121
भोर होने से बहुत पहले ही दुर्गाबाई अपनी दो विश्वस्त दासियों को साथ लेकर महल से बाहर निकलीं। सूरज की पहली किरण निकलने के पहले ही वे भैरोंबाबा का दर्शन करके वापस भी लौट आयीं। सीढ़ियों पर शम्भूराजा उनकी प्रतीक्षा में खड़े थे। दुर्गाबाई वहाँ आयीं और भावुक होकर कहने लगीं— "बेचारा बहुत भला आदमी दिखता है। औरंगजेब द्वारा फँसाये जाने का दुख तो उसे है ही किन्तु इस समय वह एक दूसरी ही घरेलू समस्या से पागल हो रहा है।" "क्या ? हुआ क्या है ?" "उसकी बेगम बच्चों को जन्म देते ही मर गयी। उसने दो बच्चियों को जन्म दिया था। उन बच्चियों को पालने पोसने में मियाँखान ने अपनी उम्र गँवाई। छ महीने पहले बीजापुर के एक जमींदार के दो बेटों के साथ इन जुड़वाँ बहनों का विवाह निश्चित हो चुका है। चार दिनों के बाद विवाह की तिथि है।" "फिर ?" "मियाँखान ने अपने दामादों के लिए दहेज की बहुत बड़ी रकम कबूल की थी। उन बेटियों की माँ नहीं है और बाप ऐन मौके पर कैदखाने में बन्द हो गया। वह महसूस कर रहा है कि घर के नौकर चाकरों से विवाह का कार्य ठीक ठीक नहीं हो पाएगा। शादी टूट भी सकती है। दुर्भाग्य से इसकी गलती लड़कियों के माथे पर ही आएगी। दुनिया समझेगी कि लड़कियों में ही कुछ खोट है। लड़कियों का भविष्य बर्बाद हो जाएगा। यही समस्या इस अभागे बाप को पागल बना रही है।" उसकी दर्दभरी कहानी सुनकर शम्भूराजा का मन पिघल गया। उसी दिन वे हवेली की छत पर से इधर उधर देख रहे थे। वे यह सोचकर अधीर हो रहे थे कि अभी तक अँधेरा होते ही शम्भूराजा की उस हवेली में अनेक हलचलें उग आयीं। उन्होंने रसोईघर में काम करने वाले जैमुद्दीन को बुला लिया। युवराज उस मोटे थुलथुल दाढ़ी वाले बुड्ढे जैमुद्दीन को प्रसन्नतापूर्वक देखते ही रह गये। शम्भूराजा ने रात के अँधेरे में अपने विश्वस्त सहयोगियों के साथ जैमुद्दीन को उस रहस्यमय घर की ओर भेज दिया। स्वयं शम्भूराजा हवेली के दरवाजे पर आकर पटाखे फोड़ने लगे। उनके नौकर-चाकर भी चन्द्र ज्योति और उत्सव का आनन्द लेने लगे। आसपास सभी जगह हलचल मच गयी। शम्भूराजा के कुछ सेवक वहाँ पर एकत्र लोगों को जलेबियाँ बाँटने लगे। हवेली के सामने पटाखों की आतिशबाजी चल रही थी। उसे देखने के लिए आसपास के सभी पहरेदार जमा हो गये। उसी समय पिछवाड़े के 122 सम्भाजी