छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतो जानवरों की भी किसी ने नहीं की होगी।" यह भयंकर समाचार सुनते ही संभाजी राजा की क्रोधाग्नि धधक उठी। उनके सिर के नरम रेशमी बाल खड़े हो गये; हथेलियों की मुट्ठी बँध गयी। वे क्रोध से दाँत पीसने लगे। मन्दिर के बाहर ही युवराज का घोड़ा खड़ा था। वे शीघ्रता से घोड़े के पास पहुँचे और उसकी पीठ पर अपना मर्दाना हाथ रखा। पीठ का आधार देकर वे उछलकर घोड़े की पीठ पर सवार हो गये। किले के पिछवाड़े से पत्थरों और खड्डों के बीच से उन्होंने घोड़े को दौड़ाया। पीछे से दूसरे घुड़सवार जोर जोर से चिल्ला रहे थे—"युवराज रुक जाओ, गड़बड़ मत करो घोड़ा गिर जाएगा, रुक जाओ।" किन्तु युवराज के पागलपन को कोई भी आवाज सुनाई नहीं दे रही थी। देखते देखते खड्डों भरी वह ऊबड़ खाबड़ ढलान घोड़े ने पार कर ली। पसीने से लथपथ घोड़ा दिलेरखान के शामियाने के सामने आकर रुका। शम्भुराजा के उस आश्चर्यजनक रूप को मुगल सरदार देखते ही रह गये। घोड़े के चारों पैर खून से भीग रहे थे, शम्भुराजा की आँखों से लाल अंगारे फूट रहे थे। वे घोड़े पर से छलाँग लगा कर जमीन पर उतरे। जोर की गर्जना के साथ उन्होंने आवाज दी—"कहाँ है वह हरामखोर बुड्ढा दिलेरखान?" दिलेरखान ने जब शम्भुराजा को किले की ढलान से उतरते देखा था तभी आने वाले भयानक संकट की आहट उसे मिल गयी थी। दिलेरखान की छावनी के चारों ओर दो हजार सशस्त्र सैनिकों का घेरा था। खेत के मेड़ में छिपे चूहे की तरह खान अन्दर छुप गया। क्रुद्ध शम्भुराजा का सामना करने की हिम्मत उसमें नहीं थी। "डरपोक बुड्ढेऽऽ बाहर निकल।" शम्भुराजा बहुत देर तक पुकारते रहे। कुछ समय बाद ऊपर की लहरें तो शान्त हो गयीं लेकिन समुद्र का भीतरी हिस्सा अभी अशान्त बना हुआ था। उन्होंने सामने खड़े सैनिकों से दिलेरखान के लिए सन्देश भेजा— "जाओ, कहो अपने बुड्ढे दिलेरखान से कि एक संभाजी मुगलों से आ मिला तो क्या हुआ, शिवाजी महाराज अभी समाप्त नहीं हुए हैं और समाप्त होंगे भी नहीं।" रात में शम्भुराजा को भयंकर बेचैनी रही। कुहनी से कटे हाथ और घुटने से कटे पाँव वाले मराठे सैनिक उनकी आँखों के सामने बार-बार आते थे। जिस क्रोधित और अपमानित नजर से वे शम्भुराजा की ओर देख रहे थे उससे शम्भुराजा उद्विग्न हो गये थे। उनका सिर फटा जा रहा था। उनकी इस बेचैन दशा को देखकर दुर्गाबाई और राणूबाई आधी रात के बाद भी उनके पलँग के पास बैठी रहीं। मस्तिष्क की भयानक पीड़ा शान्त होने का नाम नहीं ले रही थी। शम्भुराजा तेजी से उठे और कोने में पड़ा बाटे का पत्थर हाथ से उठा लिया। राणूबाई को अपने भाई के सम्भाजी :: 133