छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवैसे गोदू का मायका महाड़ के पास एक बहुत पिछड़े हुए गाँव में था, किन्तु गोदू का व्यावहारिक ज्ञान बहुत अच्छा था। उसके मौसा छत्रपति शिवाजी महाराज के अष्ट प्रधान मंडल में सुरनवींस थे। उनका नाम था अण्णाजी दत्तो प्रभुणीकर। प्रभुणीकर रायगढ़ किले के नीचे पाचाड़ गाँव में रहते थे। गोदू अनेक बार अपने मौसा-मौसी के पास पाचाड़ गाँव जाती थी। शिवाजी के राज्य में क्या चल रहा है, किन नयी लड़ाइयों की योजनाएँ बन रही हैं आदि बातें उसके कानों तक आती थीं। छत्रपति शिवराय पर गोदू की अपार भक्ति थी। वह उन्हें अपने प्राणों से भी अधिक महत्त्व देती थी। आसमान के सूर्य, चाँद और शिवाजी महाराज उसे प्राणों से भी अधिक प्रिय थे। कुछ वर्ष पहले गोदू कोंकण के एक छोटे-से गाँव बिरवाड़ी में कुछ दिन रहने के लिए गयी थी। एक शाम को उसके रिश्तेदार के आँगन में कुछ गपशप चल रही थी तभी एक भयानक खबर वहाँ पहुँची। खबर थी कि पूना के समीप कोढाणा किले को जीतते-जीतते सरदार तानाजी भालुसरे युद्ध में शहीद हो गये। शिवाजी ने किला तो जीत लिया था किन्तु सिंह को खो दिया था। यह हृदय विदारक समाचार सुनकर सभी व्यथित हो गये। जैसे-जैसे यह खबर गली-कूचों में फैली चारों ओर दुःख का ज्वार आ गया। घाघरा-चोली पहने गोदू अपने छोटे-छोटे कानों से यह सब सुन रही थी। "बहादुर तानाजी का शव पालकी में रखा गया है। डोली किले के दरवाजे पर आ रही है। डोली स्वयं शिवाजी महाराज ने अपने कन्धे पर उठाई है।" इन समाचारों को सुनते-सुनते ही कुछ नवयुवक उत्साहित होकर खड़े हो गये। उन्होंने डोली के दर्शन का निश्चय किया। फिर क्या था। युवकों की टोली बन्दरों की तरह छलाँग लगाते, पर्वत घाटियों को पार करते, जंगलों को चीरते हुए कोढाणा की ओर बढ़ने लगी। एक घंटे के बाद जंगल से गुजरते बच्चों ने अनुभव किया कि उनके पीछे घास फूस और झाड़ियों के बीच से एक हल्की-सी आवाज आ रही थी। हिरनी की तेजी से कोई उनका पीछा कर रहा है। उनके पीछे-पीछे कोई दौड़ता हुआ आ रहा है। सभी पीछे मुड़कर देखने लगे। सभी ने देखा, आठ साल की गोदू उनके पीछे-पीछे दौड़ती चली आ रही है। इस अविस्मरणीय शव यात्रा की गोदू कभी भी भूलने वाली नहीं थी। तानाजी का गिरना किसी अपराजेय किले के बुर्ज के गिर जाने जैसा था। वस्तुतः तानाजी नाम का शिवाजी महाराज का हाथ गिर गया था। शिवाजी महाराज के तेजस्वी मुखमंडल की कांति पूरी तरह से लुप्त हो गयी थी। चारों ओर सूतक की छाया मँडरा रही थी। जिसे देखना भी मुश्किल हो रहा था। आसपास के गाँवों से लोगों के झुंड के झुंड आकर इकट्ठे हो रहे थे, पालकी रोकी गयी। तानाजी के मुख 12 :: सम्भाजी