भारतकोश
छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 149, कुल 793 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 149

पहरे पर खड़ा किया था। उसी तालाब के किनारे पाँच साधु स्नान कर रहे थे। उनका मन्त्रपाठ चल रहा था। बीच बीच में वे 'जय शंभोऽऽ' कहकर पुकार रहे थे। पहले तो शम्भूमहाराज का ध्यान उनकी ओर नहीं गया। फिर कानों तक एक आवाज पहुँची—'शंभोऽऽ शिवा का शंभोऽऽ।' शम्भूमहाराज का ध्यान उनकी ओर गया। उन्होंने ध्यान से देखा तो उनके शरीर में बिजली दौड़ गयी। उन पाँच साधुओं में एक थे जोत्याजी और दूसरे रायप्पा। राजा की आँखें चारों ओर घूमीं। पहरेदारों को शक न हो इस दृष्टि से वे धीरे धीरे तैरते हुए आगे को सरकने लगे। साधुओं के पास पहुँचते ही मन्त्रपाठ के बहाने से जोत्याजी ने धीमे स्वर में कहा, "मन्दिर के पीछे हमारे सिर्फ चार घोड़े हैं। पहाड़ी के पीछे जंगल में सिर्फ साठ शृंगारपुरी घुड़सवार हैं। इन्हीं के भरोसे आपको साहस करना है।" शम्भुराजा ने पानी में सूर्य को नमस्कार किया। वे पानी में बार बार डुबकियाँ लेने लगे। पहरे पर खड़े सिपाही उनकी ओर तारीफ की दृष्टि से देखने लगे। बहुत देर तक शम्भूमहाराज पानी से बाहर नहीं आये तब पहरेदार और सिपाही हैरान होने लगे। समीप के मन्दिर के पीछे से कुछ शोरगुल सुनाई पड़ा—'संभा निकल गयाऽऽ. संभा भाग गयाऽऽ, संभा गयाऽऽ।' दिलेरखान की छावनी में हलचल मच गयी। दिलेरखान क्रोध से नाचने लगा। किन्तु उसी समय हुक्म की प्रतीक्षा किये बिना ही बालेखान अपनी पाँच हजार की सेना लेकर जंगल में घुस गया। दिलेरखान क्रोध से आग बरसाने लगा। इसी समय बूढ़ा मुनासिबखान घोड़ा दौड़ाते हुए दिलेरखान के सामने आ गया। उसके चेहरे पर चिन्ता की कोई रेखा नहीं थी। दिलेरखान मुनासिबखान से उखड़कर बोला—"ये क्या हँसी की बात है?" "नहीं तो क्या हुजूर?" मुनासिब ने कहा, "संभा जैसा बेवकूफ लौंडा किसी ने देखा तक न होगा। हुजूर मैंने पूरी जानकारी ले ली है। गिने चुने पाँच साधु उसके साथ हैं। हमारा बालेखान पाँच हजार की फौज लेकर जंगल में घुसा है। भाग भागकर भी वह बेवकूफ संभा कितना भागेगा? पूरा जंगल छान मारता हूँ। एक-दो घंटे में ही उसकी बोटी-बोटी करके रूमाल में बाँधकर ले आता हूँ।" मुनासिबखान का घोड़ा आगे बढ़ा ही था कि दिलेरखान चिल्लाया, "ठहरो मुनासिब मियाँ।" "क्यों? खान साहब?" "संभा को जिन्दा पकड़कर ले आइए। उसे मारना मत। नहीं तो शाहंशाह को यकीन नहीं होगा कि लाश संभा की ही है। आफत आ जाएगी।" सम्भाजी :: 147