भारतकोश
छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 153, कुल 793 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 153

जीव ही शिव

एक

कल देर रात शिवाजी महाराज की पालकी पन्हालगढ़ पर आ पहुँची थी। उस समय सिंह द्वार पर तोपें दागी गयी थीं। महाराज का स्वागत किया गया था। उसी भीड़ में सामने की ओर शम्भूमहाराज खड़े थे। शिवाजी महाराज ने उन्हें अपनी बाँहों में भर लिया। वे अपने काँपते हाथों को उनकी पीठ पर फेरने लगे। मन भर आया। उन्हें बहुत सी बातें करनी थीं। किन्तु इस भीड़ के सामने खुलकर बातें करना उचित नहीं था। शम्भूमहाराज को पन्हाना आये एक महीना बीत चुका था। वे प्रायः बाहर नहीं निकलते थे। उनके जैसा सुयोग्य युवराज मुसलमान शत्रुओं से जाकर मिल जाय, इस कल्पना से ही प्रजा को बड़ा दुख हो रहा था। यदि वे सहज रूप में घोड़े पर बाहर निकलते तो भी लोग उन्हें कुछ विचित्र दृष्टि से देखते थे। इसलिए महल के भीतर बैठे रहना ही युवराज को ठीक लगता था। कल रात तक शम्भूमहाराज के मन में भयंकर भ्रम बना हुआ था। वे भीतर ही भीतर बहुत तड़प रहे थे। तोप के सामने जाना उतना भयानक नहीं था जितना स्वराज्य द्रोह जैसा भयानक अपराध करके पिता के सामने जाना। कौन सा मुँह लेकर पिता के सामने जाएँ? किन्तु कल रात को पिता का आलिंगन शम्भू महाराज को बहुत आह्लादकारी और आश्वस्तिकारक प्रतीत हुआ। सुबह संभाजी राजा ने अपने शरीर पर से चादर हटाई। खिड़कियाँ खोल दीं। प्रभात की शीतल हवा अन्दर आकर उनके शरीर का स्पर्श करने लगी। रात समाप्त हो रही थी। मस्तिष्क के गर्भगृह में पवित्रता की घंटियाँ बज रही थीं। युवराज की स्मृति अतीत की ओर मुड़ रही थी। तेरह वर्ष पहले आगरा के वे तूफानी दिन याद आ रहे थे। मराठा साम्राज्य के शिवराय भयंकर जानलेवा संकट में फँस गये थे। उस समय शम्भूमहाराज की उम्र सिर्फ नौ वर्ष थी। उनके चेहरे की शिशुता समाप्त नहीं सम्भाजी :: 151