छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 154, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंहुई थी। तब भी अपनी कमर में छोटी-सी तलवार सँभाले हुए दिल्ली के शाहंशाह के दरबार में उपस्थित थे। शिवाजी महाराज के लिए आगरा के उस शाही दरबार में आने की यात्रा बहुत अपमानजनक थी। मराठों के छत्रपति को साधारण पाँच हजारी मनसबदार के खूँटे से बाँधा गया था। उस अपमान से शिवाजी महाराज बहुत क्रुद्ध हुए थे। उन्होंने भरे दरबार में विरोध की फुफकार व्यक्त कर दी थी। किन्तु ऊँचे आसन पर बैठा बादशाह शान्ति से जपमाला के मनके गिन रहा था। अन्त में दरबार समाप्त हुआ। क्रोध से काँपते हुए शिवाजी महाराज रामसिंह के साथ जयपुर महल की ओर आये। भरे दरबार में दिये गये अपमान के जलते दाग से शिवाजी का शरीर अभी भी जल रहा था। उनका दम घुट रहा था। उनके क्रुद्ध चेहरे की ओर संभाजी मासूम आँखों से देखते रह गये थे। शिवाजी ने दरबार में जो विरोध प्रकट किया था, औरंगजेब के दरबारियों ने उस पर पूरा ध्यान दिया था। दरबार ने अनुमान लगा लिया था कि यह अभिमानी मराठा इतने मे ही सन्तुष्ट न होगा, वह कल्पना से परे कुछ असम्भव कदम उठाएगा। यही कारण था कि शिवाजी और संभाजी के जयपुर महल में पहुँचने के साथ ही वहाँ पर पीछे पीछे घुड़सवारों के दल और साँडिनियों के दल भी पहुँच गये। महल का घेराव कर लिया। शिवाजी महाराज ने झरोखे से देखा तो लगा कि महल के चारों ओर मानो अस्त्र-शस्त्रों का जंगल उग आया है। वह समय आपातकाल का था। महाराष्ट्र की धरती आगरा से सैकड़ों कोस की दूरी पर थी। आसपास कोई भी अपना लगा सगा नहीं था। औरंगजेब जैसा उल्टे दिमागवाला असुर सीने पर पाँव रखकर खड़ा था। पलभर को महाराज को लगा जैसे उनकी सारी शक्ति ही समाप्त हो गयी। सब कुछ समाप्त हो गया। पहरे पर लगी मशालें भयवह लगने लगी थीं। दुश्मन के घुड़सवार सैनिक महल को घेर कर ऐसे खड़े थे, जैसे भूतों के समूह ने घेरा डाल रखा हो। बड़े महाराज फूट-फूटकर रो पड़े। उनकी गोरी और लम्बी लम्बी उँगलियों से भी जैसे आँसू टपक रहे थे। इतने में ही एक छोटा सा हाथ उनके लम्बे लम्बे बालों में फिरने लगा। उस कोमल और ममता भरे हाथ के स्पर्श से महाराज का शरीर रोमांचित हो गया। उनके सामने नौ वर्ष के भोले-भाले संभाजी खड़े थे। महाराज ने उन्हें बाँहों में भर लिया। पश्चाताप में जलते हुए शिवाजी महाराज ने कहा, "कलेजा फट रहा है रे बेटाऽऽ। इस दुर्दैवी चक्रव्यूह में से मातृभूमि तक जाने का रास्ता कैसे मिलेगा मुझे और तुमको?" बालराजा कुछ नहीं बोले। उन्होंने सिर्फ महाराज का मुँह अपने गुड्डे की तरह अपने पास लेकर उससे प्यार किया। उनको थपथपाया, उनके ऊपर हाथ फेरा, उन्हें प्यार किया। उस स्थिति में भी महाराज को हँसी आ गयी। उन्होंने संभाजी से 152 :: सम्भाजी