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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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पूछा, "वाह ! वाह ! एकदम बड़े आदमी जैसा बर्ताव करने लगा है। ये सब कहाँ से सीखा बेटेऽऽ ?" "जीजा माता के पास ! और कहाँ ?" महाराज ने निश्चय कर लिया कि चाहे जान भले ही चली जाय किन्तु औरंगजेब के अपमानजनक दरबार का मुँह वे दुबारा नहीं देखेंगे। किन्तु यह भी निश्चित था कि ऐसी अहंकारी भाषा और किसी का ऐसा गुरूर औरंगजेब कभी बर्दाश्त नहीं करेगा। उसके सन्तोष के लिए कुछ तो करना पड़ेगा। इस प्रकार आग्रह करते हुए रामसिंह महाराज के पास बैठे रहे। अन्त में उन दोनों ने एक उपाय ढूँढ़ निकाला। तय हुआ कि शिवाजी महाराज बीमार हो जाने का बहाना करें और उनके स्थान पर छोटे संभाजी राजा औरंगजेब के दरबार में उपस्थित हों। पहले दिन जब संभाजी दरबार में जाने लगे तो शिवाजी ने स्वयं उन्हें तैयार किया। अन्त में उन्होंने उनके गोरे-गोरे मस्तक पर केसर चन्दन का टीका लगाया। संभाजी के गोल-मटोल चेहरे को देखकर महाराज का मन भर आया। उन्होंने बड़ी ममता से संभाजी के गालों पर, पीठ पर हाथ फेरा। शम्भुराजा हँस पड़े। अपने छोटे-से हाथ में महाराज के हाथ को कसने का प्रयास करते हुए संभाजी बोले, "पिताजी, आप इस तरह परेशान मत होइए। जहाँ- जहाँ भी आप उपस्थित नहीं रह सकेंगे, उस जगह को भरने का प्रयास यह शम्भू अवश्य करेगा।" सवेरे ही बड़े महाराज का सन्देश आया। उन्होंने सवेरे ही शम्भुराजा को गढ़ पर महालक्ष्मी के मन्दिर में बुलाया था। उनके आगमन के लिए महापूजा का संकल्प किया गया था। विधिवत पूजा समाप्त होते-होते बहुत समय निकल गया। अन्ततः पिता-पुत्र दोपहर को ही एकान्त में मिल पाये। बड़े महाराज ने हँसते-हँसते कहा, "शम्भुराजा ! मुसलमानों का साथ छोड़ देने पर भी आप स्वराज्य में वापस लौटेंगे इसमें मुझे शक था और इस चिन्ता ने हमें बेचैन कर दिया था। मुझे लगता था कि वहाँ आने में आप संकोच करेंगे। हो सकता था कि किसी दूसरी जगह चले जाते।" "पिताजी, बहुत दुनिया देखी। अँधेरे में रास्ता चलते-चलते अटक गये। किन्तु फिर अपने ही हाथों से अपना फटा हुआ कलेजा जोड़ लिया। सोचा, सूर्यदेव की ओर ही जाना है तो डरना क्यों?" शम्भुराजा ने कहा। "शम्भू, मैं कहता हूँ कि पहले आप कवि हैं, बाद में युवराज।" शिवाजी महाराज ने बड़े प्यार से कहा। संभाजी राजा को शिवाजी महाराज अपनी आँखों में समा लेने का प्रयास कर रहे थे। एकाएक उनकी आँखों से गालों पर मोती झर पड़े थे। भरे गले से वे दुखी सम्भाजी :: 153