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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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स्वर में बोले, "तो शम्भूराजा आप अकेले ही वापस आये?" "क्षमा करें पिताजी!" शिवाजी महाराज के प्रश्न पूछने पर संभाजी का हृदय विदीर्ण हो गया। पिता-पुत्र दोनों ही बहुत दुखी हो गये थे। संभाजी बोले, "पिताजी, दुर्गा और राणू दीदी से मैंने साथ निकलने के लिए बहुत आग्रह किया। जी-जान लगाकर प्रार्थना की। किन्तु उन्होंने सुना ही नहीं।" "नहीं, नहीं शम्भू बेटे! उन बेटियों का सोचना ही ठीक था। उनको साथ ले आने की कोशिश में आप स्वयं वहाँ हमेशा के लिए अटक जाते। ठीक है शम्भू बेटे! आज नहीं तो कल, माँ भवानी आपके हाथ में शक्ति देंगी। तब अपने मजबूत हाथों से दोनों को छुड़ाकर ले आना बस।" अपने होनहार पुत्र पर दृष्टि डालते हुए शिवाजी महाराज ने कहा, "शम्भू बेटे कर्नाटक युद्ध पर आपको अपने साथ न ले जाकर मैंने आपके साथ बड़ा अन्याय किया। आप ऐसा ही समझते हैं न?" शम्भूमहाराज कुछ हिचकिचाए अवश्य, किन्तु चुप्पी तोड़कर बोले, "क्यों न समझँ पिताजी! मैं जब केवल नौ वर्ष का था तब भी आपने मुझे दूर रखा। पुरन्दर की सन्धि के अनुसार मिर्जाराजा जयसिंह के पास मुझे गिरवी रखा।" "शम्भू बेटे! वे सभी बातें मुझे स्मरण हैं।" शिवाजी महाराज ने कहा। "और थोड़ी याद दिलाता हूँ, पिताजी।" युवराज आगे कहने लगे, "औरंगजेब के शहजादे, तेज-तर्रार मुअज्जम को फोड़कर पिता औरंगजेब से बगावत कराने का काम आपने मुझे सौंपा था। आपने कहा था कि बगावत के लिए मैं उसे मजबूर करूँ।" उस बात को याद करके शिवाजी मन्द-मन्द मुस्कराये। शिवाजी महाराज की प्रसन्न मुद्रा को देखकर शम्भूराज ने बात को आगे बढ़ाया। "क्यों पिताजी? प्रयत्न करने पर भी मुझे उस कार्य में सफलता नहीं मिली। किन्तु केवल ग्यारह-बारह वर्ष की उस उम्र में आपने जिस युवराज पर, औरंगजेब के शहजादे को बाप से अलग करने का जोखिम भरा दायित्व सौंपा था, वही आपका पुत्र बीस वर्ष की उम्र में अपने पिता की उँगली पकड़कर मुहिम पर जाने के लिए अयोग्य कैसे हो गया?" शिवाजी महाराज का चेहरा खिन्न हो गया। उन्होंने कहा, "शम्भू! कर्नाटक की मुहिम पर साथ न ले जाने की घटना मेरे जीवन के लिए एक कड़ुआ अहसास है। आप जब छत्रपति बनेंगे तभी मेरे दर्द को ठीक-ठीक समझ पाएँगे। कभी-कभी राज्य की, समाज की भलाई के लिए अपने प्रियजनों से जानबूझकर अन्याय करना पड़ता है। क्या उतना भी अधिकार आप पर नहीं था मेरा, शम्भू बेटे?" "परन्तु रायगढ़ में तो हमें सुख से रहने दे सकते थे?" रायगढ़ का नाम सुनते ही शिवाजी महाराज चुप हो गये। एक लम्बी आह 154 सम्भाजी