छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 157, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंभरते हुए बोले, "शम्भू बेटे! रायगढ़ अब पहले जैसा नहीं रहा। साधारण लोगों की भूख एकदम छोटी रहती है। किन्तु बड़े स्त्री-पुरुषों की प्यास बहुत बड़ी होती है, उसमें भी राज्यलिप्सा जैसी जहरीली प्यास दूसरी नहीं होती। राज्य की प्यास बुझाने के लिए कभी कभी बच्चे भी अपने बाप का गला घोंट देते हैं। माताएँ भी दुश्मन बन जाती हैं। आजकल रायगढ़ में इस तरह की राज्यलिप्सा की लम्बी जबान निकलने लगी है। ये सारी बातें सोचकर ही मैंने आपको वहाँ न रखने का निर्णय लिया था। दिलेरखान के क़ब्ज़े से शम्भुराजा के छूट जाने की महाराज को बड़ी प्रसन्नता थी। उन्होंने कहा, "आप वापस आ गये और हम भाग्यशाली हो गये। पूरे राज्य को सूर्यग्रहण लग गया था। यह तो अपने स्वराज्य का भाग्य अच्छा था, अन्यथा आपको समाप्त करने के लिए औरंगजेब ने पक्का निश्चय कर लिया था। शम्भुराजा, आपके स्वराज्य में वापस आने का समाचार मुझे जालना के रास्ते में ही मिल गया था। उस आनन्द के नशे में मैंने चार दिन में ही जालना की लड़ाई जीत ली थी। वहाँ बड़ी लूट से लदे हुए हाथी और ऊँट झुक गये थे। किन्तु- " "क्या हुआ, पिताजी ?" "यह केवल ईश्वर की कृपा है कि आज हम आपसे मिल रहे हैं।" कुछ खिन्नता और कुछ भयभीत स्वर में शिवाजी महाराज ने कहा। 'क्यों? रास्ते में आपकी तबीयत खराब हो गयी थी क्या?' शम्भुराजा ने चिन्तित होकर पूछा। "शम्भू बेटे, तबीयत की बात छोड़ो। हम जान बचाकर वापस आ गये हैं। यही क्या कम है?" जब लूट के सामान से लदे जानवरों के साथ हम अपनी सेना लेकर जालना से आ रहे थे, संगमनेर घाट के पास, जंगल के बीच में, रणमस्तखान नाम के मुगल सरदार ने औरंगाबाद से बीस हज़ार की फौज लेकर हमारा रास्ता रोक लिया। चारों ओर से हमें घेरकर संकट में डाल दिया। रायगढ़ का राजदंड हम वहाँ खो देते तो क्या होता? किन्तु ऐन मौके पर हमारे सहायक बने वहाँ के घने जंगल और अपने बहिर्जी नाइक। वह जंगल इतना घना था कि तीन दिनों तक उस जंगल में सूर्य की किरण भी हमारे पास तक नहीं पहुँच पायी।" इस प्रसंग को सुनते सुनते शम्भुमहाराज हक्का बक्का हो गये। बड़े महाराज ने आगे कहा, "कितनी भी वीरता हो, उसका क्या लाभ? दुर्भाग्य से यदि हम मुगलों के हाथ लग गये होते तो हमारी क्या इज्जत रहती ? शम्भू बेटे, मनुष्य चाहे जितना भी बहादुर हो, उसके सभी प्रयासों को भगवान का सहारा होना ही चाहिए।" बड़े महाराज बहुत प्रसन्न दिखाई दे रहे थे। सम्भाजी 155