छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 173, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रकार यह कहकर तैयार किया कि 'शम्भूराजा आज ही पहुँचने वाले हैं।' तब जाकर कहीं छोटे युवराज विवाह के लिए तैयार हुए। यह कहानी सुनते सुनते शम्भूराजा का कलेजा तिलमिला रहा था। दूसरे दिन शम्भूराजा चन्दन के पीढ़े पर भोजन करने बैठे थे। उनके साथ जोत्याजी कतूरकर और अन्य मित्र भी साथ बैठे थे। इसी समय जनार्दन पन्त सुमन्त के घर से लड्डुओं से भरी टोकरी लेकर आये। येसूबाई ने तत्काल पहचान लिया कि यह रायगढ़ से आयी विवाह से सम्बद्ध भेंट है। उन्होंने आँखों के संकेत से टोकरी अन्दर रखने को कहा। किन्तु जो सेवक टोकरी लेकर आया था, उसकी समझ में कुछ नहीं आया। यह देखकर येसूबाई शीघ्रता से उठीं और टोकरी लेकर अन्दर जाने लगीं। उसी समय शम्भूराजा के कठोर शब्द उनके कानों में पड़े— "येसू क्या छिपा रही हो? क्यों छिपा रही हो? मंगल कार्य की मिठाई कहीं ऐसे छिपा कर रखी जाती है? ले आओ वे लड्डू और पूरी पंक्ति में बाँटो।" शम्भूराजा का वह रुद्रावतार देखकर येसूबाई झटपट लड्डू बाँटने लगीं। शम्भूराजा ने टोकरी से एक लड्डू उठाकर येसूबाई के हाथ में रख दिया। अपने आँसू को छुपाने का प्रयास करते हुए शम्भूराजा ने कहा "जोत्याजी येसूबाई! लड्डू खाओ, खाओ, कड़वे हों या मीठे, खाओ अब भले ही थाली में जहर के लड्डू परोसे तो भी उसे मीठा मानकर खाना होगा। येसू! अब हमारे सामने दूसरा कोई विकल्प रह गया है क्या?"
पाँच
फागुन की अमावस्या तिथि आयी। उस शाम को सूर्य डूबने से पहले ग्रहण ग्रस्त हो गया। पन्हालगढ़ से कुछ उत्साही लोग सूर्य ग्रहण देख रहे थे। शम्भूराजा ने उस ओर दृष्टि दौड़ाई। वे अपने महल के छज्जे पर खड़े थे। उसी समय येसूबाई वहाँ दौड़ती हुई आयीं। पीछे से युवराज का हाथ खींचते हुए कहने लगीं, "अन्दर चलिए। कहते हैं कि ग्रहण के समय सूर्य की ओर देखना अशुभ माना जाता है।" चार दिन बाद एक दिन शम्भूराजा अत्यन्त चिन्तित मुद्रा में महल की ओर लौटे। स्वागत के लिए येसूबाई दरवाजे पर खड़ी थीं। उन्हें देखकर येसूबाई ने चिन्तित स्वर में पूछा, "आज सवारी इतनी गम्भीर क्यों है?"
सम्भाजी 171