भारतकोश
छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 174, कुल 793 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 174

"क्या कहते हैं?" येसूबाई ने साड़ी के पल्लू को अपनी ठुड्डी पर रखते हुए पूछा? "इतना ही नहीं रायगढ़ पर प्रतिदिन कोई-न-कोई नयी घटना घट रही है। पिताजी की बीमारी का सोयराबाई ने बहुत लाभ उठाया है। समझ में नहीं आता कि उनके मस्तिष्क में क्या चल रहा है। उन्होंने रायगढ़ पर अपना शिकंजा कसने की शुरुआत कर दी है।" "ऐसा? क्या कह रहे हैं?" "हाँ! वहाँ पर पूरी तरह भय और आशंका का वातावरण फैल गया है। गढ़ के द्वार तो बन्द रहते ही हैं, अन्य ड्योढ़ियाँ भी शायद ही कभी खोली जाती हों। कड़ी नाकेबन्दी के कारण किले में किसी भी व्यक्ति का प्रवेश सम्भव नहीं है। येसू, अपने रायगढ़ पर कोई विलक्षण राजनीति रंग ले रही है।" युवराज के चेहरे का रंग एकदम उड़ गया था। येसूबाई ने पलक झपकते ही युवराज का भाव पढ़ लिया। उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि यहाँ अधिक समय गँवाने की अपेक्षा यही अच्छा होगा कि वहाँ के लिए निकल पड़ें।" बिना किसी दुविधा में पड़े आगे निर्णय लेना आवश्यक था। युवराज ने कवि कलश के लिए संगमेश्वर की ओर पत्र भेज दिया था। शृंगारपुर की ओर भी घोड़े दौड़ा दिये गये थे। युवराज ने अपने ससुर पिलाजीराव शिर्के को सावधान रहने का संकेत दे दिया था। चैत्र की पूर्णिमा आयी। यह हनुमान जयन्ती का दिन था। युवराज भोर में ही उठे और स्नानादि से निवृत्त होकर हनुमान मन्दिर चले गये। युवराज और युवराज्ञी ने हनुमानजी की महापूजा की। किन्तु आज एक पोरिषा ऊँची हनुमानजी की पाषाण मूर्ति कुछ अलग ही दिखाई दे रही थी। हनुमानजी का सिन्दूर चर्चित मुख बहुत क्रुद्ध दिखाई पड़ रहा था। आज प्रातःकाल से ही येसूबाई का मन बहुत अशान्त था। उन्हें भविष्य का कोई अनिष्ट भयभीत कर रहा था। उनका मन कहीं भी नहीं लग रहा था। दोपहर में उन्होंने घबराये स्वर में युवराज से कहा, "मुझे ससुरजी की बड़ी चिन्ता हो रही है।" "पिताजी की तबीयत की इतनी चिन्ता क्यों कर रही हो? वे तो सिद्ध पुरुष हैं। दीर्घायु होंगे ही और अभी उनकी उम्र ही क्या हुई है? पचास पूरा करने में भी अभी एक महीना बाकी है। मुझसे और तुमसे इस मराठी माटी को उनकी अधिक आवश्यकता है।" सन्ध्या समय कवि कलश युवराज के महल में प्रविष्ट हुए। उनके पीछे ही संभाजी राजा के दो जासूस भी महाड़ और रायगढ़ वाड़ी से लौटकर आये। दोनों जासूस बहुत घबराये हुए दिख रहे थे। जासूसों ने घबराये स्वर में कहा, "हमें तो क्या, किसी को भी रायगढ़ में प्रवेश नहीं मिल रहा है। कुछ लोग कह रहे थे कि 172 :: सम्भाजी