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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 175, कुल 793 में से

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महाराज को गुड़घी रोग हो गया है।'' ''कुछ लोग दबे स्वर में यह भी कह रहे थे कि सोयराबाई ने महाराज पर विष प्रयोग किया है।'' दूसरे जासूस ने कहा। जासूसों की खबरें संभाजी राजा शान्तिपूर्वक सुन रहे थे। गर्म साँस छोड़ते हुए उन्होंने कवि कलश से कहा, ''कविराज स्वराज्य का चक्र उल्टी-सीधी दिशा में घूम रहा है। तैयार हो जाइए और सावधानी बरतिए ! पिताजी के स्वास्थ्य का ठीक- ठीक समाचार ले आने के लिए जितनी जल्दी सम्भव हो जासूसों को रायगढ़ भेजिए।'' चैती पूनम का दिन था। आठ दिनों तक तीव्र ज्वर से पीड़ित होने के कारण महाराज परलोकवासी हो गये। शिवाजी महाराज के आकस्मिक निधन के कारण रायगढ़ विषाद में डूब गया। बुर्ज झुक गये। दरवाजों की कमानें झुकी हुई दिखने लगीं। गंगा सागर से लेकर काली हौज तक अनेकानेक तालाबों, बावड़ियों और झरनों का पानी फीका लगने लगा। इस वज्राघात से मराठा राज्य की मानो कमर ही टूट गयी। यह भी प्रश्न था कि आसपास के शत्रु आक्रमण कर सकते थे। स्थिति समझ में नहीं आ रही थी। किले पर अष्टप्रधानों में कोई भी अनुभवी बुजुर्ग व्यक्ति मौजूद नहीं था। इसीलिए कान्होंजी भांडवलकर, दादूजी सोमनाथ और महारानी सोयराबाई इस दुखद समाचार को छुपा रहे थे। राजाराम के हाथों किसी प्रकार अन्त्येष्टि कर्म कराया गया। कारवार की ओर युद्ध पर निकले अण्णाजी दत्तो जल्दी ही वापस लौट आये। उनके पीछे ही नासिक त्र्यम्बकेश्वर से पेशवा मोरोपन्त भी वापस आ गये। राज्य रावण का हो या राम का, प्रशासन के अधिकारी इस बात का ध्यान तो रखते ही हैं कि उनका स्थान और अधिकार सुरक्षित बना रहे। यही कारण था कि रायगढ़ के सचिव अण्णाजी दत्तो बहुत बेचैन थे। वे सोचते थे-''यहाँ जो भी होगा देखा जाएगा किन्तु यदि एकबार संभाजी गद्दी पर बैठ गये तो उनके लिए कुछ ठीक न होगा। उनके पक्ष वालों का भी ऐसा ही सोचना था। अण्णाजी की नींद उड़ गयी थी। आज तक उन्होंने संभाजी राजा से द्वेष करने और चार लोगों में उनके सम्बन्ध में अनाप-शनाप बकने का एक भी अवसर खाली नहीं जाने दिया था। अण्णाजी की तानाशाही प्रजा से प्राप्त धन के घोटालों, परस्पर जारी की गयी सनदें, गलत ढंग से संचित किया गया धन आदि की पूरी जानकारी शम्भूराजा को थी। इसीलिए अण्णाजी जब भी सामने पड़ते थे तो शम्भूराजा कहते थे, ''अपश्यतः पश्चातामात्यान्पश्यते-यह देखो पैसा लूटने वाले अमात्य आ गये।'' सम्भाजी 173

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