छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 176, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंशिवाजी महाराज का नारा सर्वकल्याण का था किन्तु उनके कुछ अधिकारियों का झुकाव अपना उल्लू सीधा करने की ओर था। इसीलिए वसूली की पूरी राशि सरकारी खजाने तक नहीं पहुँच पाती थी। यही नहीं, जब फ्रांसीसी, अंग्रेज पुर्तगाली आदि विदेशी अतिथि किले पर आते थे तो दरबारी अधिकारी ललचाये रहते थे कि महाराज के साथ उन्हें भी कुछ उपहार मिल जाय। बीस-बाईस वर्ष के तरुण शम्भूराजा को यह सब असह्य था। वे क्रोध से भन्नाये रहते थे परिणामस्वरूप अधिकारी उनके असन्तुष्ट रहते थे। शिवाजी महाराज के स्वर्गवास के बाद अन्य इष्ट मित्र दरबारी अण्णाजी से दबी जबान में पूछने लगे, “क्यों अण्णाजी अब शम्भूमहाराज गद्दी पर विराजमान होंगे तो आपका क्या होगा?'' अपने भविष्य की चिन्ता ने अण्णाजी को पागल कर दिया था। अण्णाजी अच्छी तरह जानते थे कि अपने बेटे को गद्दी पर बिठाने के लिए सोयराबाई शम्भूराजा का विरोध करेंगी किन्तु केवल बुद्धि और षड्यन्त्र के सहारे राज्य खड़े नहीं होते। राज्य के लिए बाहुबल की आवश्यकता होती है। स्वराज्य के सेनापति हंबीरराव मोहिते का पड़ाव कराड के समीप पड़ा था। अण्णाजी ने उन्हें तत्काल सन्देश भेजा, "आपके भांजे राजाराम साहब को गद्दी पर बिठाने का हमारा पक्का इरादा है। वे आपकी सात पीढ़ियों का उद्धार कर देंगे। किन्तु आपके सहयोग के बिना हम अपने प्रयत्न में सफल नहीं हो सकते।" सुदैव से दो ही दिनों में हंबीरराव का उत्तर आ गया- "मन्त्रीजी! आप स्वयं इतने ज्ञानी और तीव्र बुद्धि वाले हैं। स्वराज्य के किस वृक्ष मे कितने पत्ते हैं, इसका हिसाब किताब आपके पास है। आपके नेतृत्व में ही मेरे भांजे का कल्याण होगा। इस सिपाही को इससे अधिक और क्या चाहिए?'' हंबीरराव की लिखित सम्मति से अण्णाजी कुछ अधिक ही प्रसन्न हो गये। उनके पक्ष को इससे बड़ा बल मिला। किले पर आने के बाद वे सोयराबाई से दो तीन बार मिल चुके थे। अब तो उनकी जेब में हंबीरराव का पत्र भी आ गया था। इसीलिए महारानी सोयराबाई के महल की ओर जाते समय उनके पैरों में विलक्षण तीव्रता आ गयी थी। महाराज की मृत्यु के बाद सप्त महल सूना सूना दिखाई देने लगा था। किन्तु रनिवास के बाहर एक महल के सामने अण्णाजी को अधिक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी। दासी द्वारा सूचित करने पर महारानी सोयराबाई थोड़े ही समय में उपस्थित हो गयीं। पति के स्वर्गवास से उनका मन टूट गया था। किन्तु अपने के भविष्य की चिन्ता में वे व्याकुल हो रही थीं। वर्तमान परिस्थिति से बिना विचलित हुए उन्होंने किले पर और किले के बाहर कड़ा बन्दोबस्त कर रखा था। अण्णाजी को महारानी का जोश, सामर्थ्य और इरादा अच्छी तरह मालूम था। इसलिए उन्हें पूरा विश्वास था 174 :: सम्भाजी