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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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उनके सामने शम्भूराजा और कवि कलश भयंकर दैत्य की तरह खड़े दिखाई पड़े। वे दोनों घबरा गये। उनके पैर काँपने लगे। वे क्या बोले, कुछ समझ में नहीं आ रहा था। तब शम्भूराजा ने ही उनसे पूछा, "कल दोपहर को ही रायगढ़ से निकले हैं न?" "हाँ जी!" खंडोजी ने किसी प्रकार उत्तर दिया। खंडोजी और गणोजी की चोर नजर काँप उठी। खंडोबा ने अपनी कमर में बँधा दुपट्टा खोला। उसमें से निकालकर एक पत्र शम्भूराजा को दिया। शम्भूराजा ने वहीं पर रेशमी गाँठ खोली। खड़े खड़े ही पत्र को पढ़ा। एक कल्पित आह्लाद के अतिरिक्त उसमें कोई और बात नहीं थी। किन्तु उसकी लिखावट हमेशा की तरह बालाजी आवजी चिटणीस के हाथों की नहीं थी। आवजी की लिखावट उनके अक्षर को सभी दरबारी और युवराज अच्छी तरह पहचानते थे। "सरकार हमें जल्दी है, हम निकलते हैं।" ऐसा कहकर दोनो गुप्तचर बाले किले की ओर चलने को हुए। शम्भूराजा को पूरा मामला कुछ विचित्र सा लग रहा था। उन्होंने उन गुप्तचरों को रोका- "अरे! रुको, रुको आपको इतनी भी क्या जल्दी है?" "दिन के उजाले में ही किलेदार को मिलना है।" खंडोजी ने सूचित किया। शम्भूराजा ने अपनी भेदक दृष्टि दोनों पर डाली। उन्हें अँगुलियों के संकेत से अपने पास बुलाया। दोनों जासूस यन्त्रवत् वापस लौटे। भय से काँपते हुए उन्होंने युवराज का पुनः अभिवादन किया और खड़े हो गये। दोनों को पसीना छूट रहा था। शम्भूराजा ने डाँट कर पूछा, "कावले! अपनी कमर में क्या खोंसा हुआ है?" "कुछ नहीं जी! कुछ नहीं। यह तो अपनी प्रतिदिन की डाक है। किलेदार के नाम से भेजी गयी है।" गणोजी बात धैर्यपूर्वक कर रहा था। किन्तु उसके थरथराते पैर उसे धोखा दे रहे थे। संशय अधिक गहराने पर युवराज ने अपने साथियों को संकेत किया। कवि कलश और जोत्याजी ने जासूसों के सारे कागजात हस्तगत कर लिए। उसमें एक पत्र किलेदार विट्ठल त्र्यम्बकजी के नाम था और दूसरा हवलदार बहिर्जी नाइक के नाम। शम्भूराजा की दृष्टि पत्र के गूढ़ शब्दों पर घूमने लगी। "यहाँ स्थिति बहुत चिन्ताजनक है। जैसा बन्दोबस्त होगा वैसी सूचना आपको देते रहेंगे। परन्तु किसी भी स्थिति में शम्भुमहाराज को किले से बाहर न निकलने देना। युवराज को बन्दी बनाकर बड़ी सावधानी से रहिए। यहाँ का कोई समाचार महाराज तक नहीं पहुँचना चाहिए। आगे समय पर यथायोग्य आदेश मिलते रहेंगे।" शम्भूराजा के क्रोध का पारा एकदम चढ़ गया। उनकी सन्तप्त आँखों का सामना करने का साहस जासूसों में नहीं था। घबराहट के कारण वे और भी सहम सम्भाजी : १०३