छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 186, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंगये। युवराज ने उनसे कठोर शब्दों में पूछा, "सच-सच बताइए वहाँ रायगढ़ पर क्या चल रहा है? मुझे बन्दी बनाने के षड्यन्त्र का सूत्रधार कौन है? हमारी पूजनीया माताजी या निष्ठावान अण्णाजी दत्तो?" उसी समय शम्भूराजा को अपने पिताजी का स्मरण हो आया। उन्होंने कातर स्वर में पूछा, "बताइए हमारे पिताजी की कैसी स्थिति है?" युवराज ने प्रश्नों की झड़ी लगा दी। दोनों जासूसों का धैर्य छूट गया। दोनों शक्तिहीन होकर धरती पर गिर पड़े। दोनों बैठ गये। उन्होंने मन में सोचा कि वे स्वराज्य के भावी अधिकारी से एक बुरी खबर छुपाकर भयानक अपराध कर रहे हैं। झूठ बोलने के अपराध का बोध होते ही वे छोटे बच्चों की तरह रोने लगे। शम्भूराजा के पैर पकड़कर दया की भीख माँगने लगे- "सरकार, आप बड़े लोग हैं परन्तु आपके झगड़ों में हम गरीबों की जान आफत में है।" शम्भूराजा ने गश्त लगाने वाले सैनिकों को संकेत किया। वे दौड़ते हुए आए। दोनों जासूसों को वहीं पर कैद कर लिया गया। युवराज जल्दी ही दरबार में आ गये। पन्हाला के किलेदार विट्ठल त्र्यम्बक, हवलदार बहिर्जी नाइक, जनार्दन पन्त सुमन्त जैसे अधिकारियों को तत्काल दरबार में बुला लिया गया। गुप्त पत्र को सबके सामने पढ़ा गया। जासूसों की तलाशी ली गयी। शम्भूराजा ने अनुभव किया कि इस सम्पूर्ण घटना के पीछे कोई बड़ा राजनीतिक षड्यन्त्र है। शम्भूराजा ने जासूस खंडोवा से पूछा, "खंडोवा, अब बिना कोई नाटक रचे, जो है, उसे सच सच बताओ? हमारे पिताजी का स्वास्थ्य कैसा है?" जासूस भय से काँपने लगे। जो खबर उन्होंने अब तक छुपाई थी वह इतनी भयंकर थी कि उसे बताते हुए उनका गला रुँध गया। वे जोर-जोर से रोते हुए कहने लगे, "युवराज ईश्वर ने बड़ा भारी आघात किया है। बड़ा धोखा हो गया है। बड़े महाराज हमें अनाथ छोड़कर चल बसे।" इस भयंकर समाचार से मानो सभी पर आसमान टूट पड़ा। पूरे रजवाड़े में तहलका मच गया। सभी दहाड़ मारकर रोने लगे। विट्ठल त्र्यम्बक जैसे लोग जो षड्यन्त्र में सम्मिलित थे, उन्हें आँसू रोक पाना कठिन हो गया। सेवक, नौकर, दास-दासी सभी दुख के सागर में डूब गये। इस समाचार का शम्भूराजा पर कुछ अलग ही प्रभाव पड़ा। वे न दहाड़ मारकर रोये और न ही क्रुद्ध हुए। परन्तु जैसे अपने स्थान से कोई पाषाण मूर्ति गिर जाय, वैसे ही शम्भू महाराज भी गिर गये। लगा जैसे उनके पैर थे ही नहीं। वे मूर्छित हो गये। उनकी आँखें खुली थीं, कि शरीर में कोई हरकत नहीं थी। सभी लोग घबराहट में इधर उधर भागने लगे। कटा हुआ नींबू और प्याज 184 सम्भाजी