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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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रूप को आप जैसे अभागों ने कभी देखा ही नहीं है। शिवाजी महाराज जब युद्ध के लिए निकलते थे तो दस हजार सैनिकों की टुकड़ी का नेतृत्व शम्भूराजा को सौंपते थे। शम्भूराजा भी ऐसे उपलब्ध अवसरों को गौरवान्वित करते थे। युद्ध क्षेत्र में उनकी उपस्थिति ही दस हजार सैनिकों के बगबर होती है। युद्ध क्षेत्र में जब वे घोड़े को ऐड़ लगाकर जोश में नचाते हैं, तो सामान्य सिपाही के शरीर में ही दस हजार हाथियों का बल पैदा हो जाता है। हाथी-घोड़े जैसे मूक जानवरों को भी बहादुरी के पंख लग जाते हैं। बड़े महाराज गुजर गये इसलिए हमारे शत्रुओं में जोश आ गया है। कल मराठी राज्य के दरवाजे पर औरंगजेब का आसमानी सुल्तानी संकट दस्तक देने लगा तो क्या होगा? ऐसे समय में रायगढ़ के सिंहासन पर ईश्वर की कृपा से प्राप्त शम्भूराजा जैसा वीर सिपाही ही राजा के रूप में चाहिए।" "क्या पागल जैसी बात करते हो, हंबीरराव ?" "अरे आपका भांजा रायगढ़ का राजा..." "छोड़िए अण्णाजी ! भांजा तो क्या, भांजा तो क्या, मेरा अपना बेटा भी होता तो उसे परे हटाकर इस मराठा मावले ने शम्भूराजा को ही सिर झुकाया होता।" इन दोनों को यह अनुमान कतई नहीं था कि हंबीरराव के मुख से शम्भूगजा की प्रशंसा में ऐसा पवाड़ा सुनने को मिलेगा। यही कारण था कि अण्णाजी को कुछ सूझ ही नहीं रहा था। उनका गला सूख गया। उन्होंने लोटे से गटागट पानी पिया। तब कुछ संतुलित हुए। और शान्त स्वर में हंबीरराव से कहा- "अपने दीवानजी को तत्काल मेरे सामने बुलवाइए।" अण्णाजी की इच्छानुसार दीवान रायभान सबनिस डेरे में प्रस्तुत हुए। अण्णाजी ने पुनः बड़ी सूक्ष्मता से हंबीरराव की ओर देखा। पन्त के मस्तिष्क में उठे भीषण तूफान को काबू में रख पाना उनके लिए कठिन हो रहा था। अण्णाजी ने गरजकर कहा-"फौज के दीवान! इस समय कानूनन राजाराम साहब मराठी राज्य के राजा हैं। उनके कानूनी मन्त्री की हैसियत से मैं अण्णाजी पन्त प्रभुणीकर और राज्य के पेशवा मोरोजी पन्त, हम दोनों आपको आदेश देते हैं कि राजद्रोह के अपराध में हंबीरराव मोहिते को हथकड़ी लगाओ। उनकी मुश्कें बाँधकर इसी वक्त खींचते हुए रायगढ़ के बन्दीगृह में ले जाओ।" अण्णाजी ने एक भयानक तोप को पलीता लगाया था। किन्तु वार खाली गया। उनके हुक्म की तामील करने के लिए दीवान अपनी जगह से हिला भी नहीं। इस पर अण्णाजी का चेहरा मिट्टी के बर्तन की तरह काला पड़ गया। अत्यन्त क्रुद्ध होकर मोरोपन्त के साथ वे बाहर निकल गये। उनके साथ रायगढ़ से आयी पाँच हजार की फौज बाहर खड़ी थी। किन्तु इस फौज के चारों ओर हंबीरराव की बीस हजार सेना का सागर फैला हुआ था। फिर भी अपनी सेना की ओर जाते हुए अण्णाजी गरजे- "चलो रे! डेरे में घुसकर हंबीरराव की मुश्कें बाँध लो।" तब तक हंबीरराव 192 :: सम्भाजी