छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 196, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंअण्णाजी पन्त और मोरोपन्त की गिरफ्तारी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण थी। स्वराज्य के सेनापति शम्भूराजा से मिलने आ रहे थे। कल सारी सेना महाराज से आकर मिलेगी। इस एक घटना से भीतरी एवं सरहद पार के शत्रुओं को एक जबरदस्त झटका मिलने वाला था। अधिक सोच-विचार किये बिना शम्भूराजा ने येसूबाई को जगा दिया। पैरों को पेट में सिकोड़े भवानीबाई सोई थीं। उन्हें हल्के हाथों से अलग करके येसूबाई उठ गयीं। शम्भूराजा को अचानक देखकर उन्हें कुछ घबराहट हुई। राजा ने सुखद समाचार उन्हें सुनाया। समाचार सुनकर साम्राज्ञी तरोताजा हो गयीं। मन हल्का हो गया। उन्होंने धीरे से पूछा, "कल हंबीरराव राजा से कहाँ मिलेंगे?" "यहाँ, निजी महल में।" "ऐसा कैसे महाराज! हंबीरराव मामा का यथोचित स्वागत करने के लिए कल पन्हाला पर दरबार लगाइए।" "कल्पना तो अच्छी है। किन्तु येसू! अपना सिंहासन तो वहाँ रायगढ़ पर है।" "उसकी चिन्ता महाराज को नहीं करनी है। आपके जैसा बहादुर राजा जहाँ खड़ा हो जाता है, वहीं सिंहासन निर्मित हो जाता है।" रात को ही सभी को खबर भेज दी गयी दूसरे दिन पन्हाला पर एक छोटा- सा दरबार लगाया गया। सेनापति हंबीरराव युवराज के पक्ष में सम्मिलित हो रहे हैं। यह सुनकर चारों ओर आनन्द छा गया। दरबार सभी अधिकारी और कार्यकर्ता हंबीरराव के रास्ते में पलकें बिछाए खड़े रहे। इसी समय लम्बे शरीर वाले हट्टे-कट्टे हंबीरराव ने बड़ी शान से दरबार में प्रवेश किया। उनकी फौजी-पगड़ी में मणियों की माला चमक रही थी। उन्होंने बड़े आदर भाव से संभाजी महाराज को झुककर अभिवादन किया। महाराज भाव-विभोर हो गये। हंबीरराव ने झट से उनकी कलाई पकड़ ली। दोनों एक दूसरे के गले से लिपट गये। शम्भूराजा को भी पक्का विश्वास नहीं था कि राजाराम का पक्ष और अपनी सगी बहन का हठ ठुकराकर हंबीरराव शम्भूराजा से आकर मिलेंगे। अपने आचार- व्यवहार से युवराज और युवराज्ञी को लज्जित किया था। शम्भूराजा ने गद्गद होकर कहा, "मामा साहब आपके आने से हमें बेहद खुशी हुई है। इसके बाद भी मराठी राज्य के सुरक्षा की तलवार आपके ही हाथों में रहेगी।" "शम्भूराजा आप मेरी ओर केवल रिश्तेदारी दृष्टि से ही न देखें। शिवाजी महाराज मुझसे हमेशा कहते थे—'भोजन के आसपास जैसे रंगोली बनाई जाती है उतनी ही सीमा में रिश्तों को मर्यादा रखिए'।" हंबीरराव की आत्मीयता और निष्ठा से शम्भूमहाराज और येसूबाई दोनों अभिभूत हो गये। शम्भूराजा ने अपने गले का रत्नहार निकालकर हंबीरराव के गले 194 :• सम्भाजी