छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंम डाल दिया। मूल्यवान वस्त्रालंकार भेंटकर उनका बड़ा सम्मान किया। उसी समय शम्भुराजा ने कहा, ‘‘मामाजी, आज के दरबार में एक अन्य बुजुर्ग व्यक्ति का सम्मान होना है। ’’ ‘‘कौन है ?’’ ‘‘मामा साहब, अपने हिरोजी फर्जन्द चाचा। वे आते ही होंगे। ’’ तरुणाई की मस्ती में हमसे कुछ भूलें न हो जाएँ, इसलिए आप जैसे अनुभवी बुजुर्गों की सलाह से ही आगे का रास्ता तय करना है। ऐसा हमने निश्चित किया है। हमारे सलाहकारों में फर्जन्द चाचा भी एक हैं। दरबार का काम-काज चल ही रहा था कि गोवा से पुर्तगालियों के वकील रामजी नाइक ठाकुर दरबार में उपस्थित हुए। उन्होंने पोर्चगीज वाइसराय रातांतियो पाईस द सांदे का पत्र शम्भूमहाराज को दिया। पुर्तगाली वाइसराय ने शिवाजी महाराज के आकस्मिक निधन पर शोक व्यक्त किया था। इसके बाद इच्छा प्रकट की थी कि गोवा के पुर्तगालियों और मराठों में भाईचारा बना रहे। पत्र पढ़ते हुए सागर की नीली-नीली लहरें शम्भुराजा की ओर संकेत करने लगीं। एक ओर गोवा का अधिक वर्षा वाला किनारा, दूसरी ओर टेढ़ी-मेढ़ी खाड़ियों, घने पेड़-पौधों से भरा कोंकण का तट। जिसमें पैरों में चुभने वाले साँपों के जहरीले काँटे। जैसे पैरों में गोखरू अटक जाता है, वैसे ही मूरुड के पास का जंजीरा शम्भुराजा को अस्वस्थ करने लगा। दरबार में हंबीरराव ने स्मरण दिलाया—‘‘महाराज ! आपका यहाँ पन्हाला पर अधिक समय गँवाना उचित नहीं है। शीघ्र से शीघ्र रायगढ़ जाकर वहाँ व्यवस्था देखना उचित होगा। ’’ ‘‘हंबीर मामा ! इतनी उतावली की आवश्यकता नहीं है। यहाँ सेना इकट्ठा करने का काम हो ही रहा है। आप देख ही रहे हैं, फ्रेंच, अंग्रेज, पोर्चगीज आदि देश-विदेश के पत्र यहीं आ रहे हैं। उन्हें भी थोड़ा समय देना चाहिए। ’’ दोपहर में मोरोजी पन्त और अण्णाजी दत्तो को शम्भूमहाराज के सामने प्रस्तुत किया गया। मोरोपन्त की कलाइयाँ सिर्फ डोरी से बँधी थीं किन्तु अण्णाजी दत्तो के हाथों में फौलादी बड़ी-बड़ी बेड़ियाँ पड़ी थीं। मोरोपन्त के चेहरे का रंग उड़ गया था। वे बहुत ही खिन्न और अपराधभाव से पीड़ित दिखाई पड़ रहे थे। शम्भुराजा ने बगल से पहरेदार सिपाही को संकेत से बुलाया। उन्होंने कहा, ‘‘मोरोपन्त की उम्र साठ-सत्तर वर्ष की है। उनकी कलाइयों को बाँधे नहीं। ’’ शम्भुराजा ने अण्णाजी दत्तो की ओर देखा। अण्णाजी ने शर्म से, अपराधभाव से या क्रोध से अपनी आँखें झुकाई नहीं। जंगली जानवर की तरह मगरूरी से खड़े रहे। देर तक न रोक पाने के कारण शम्भुराजा ही बोले— सम्भा 11 195