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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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“अण्णाजी ! आप तो दगाबाजों के सुमेरु मणि हैं ? हमारे विरोध में आपके षड्यन्त्र और प्रचार का क्या कारण है ? आपको क्षमा करना या आपको छोड़ देना तो आत्मघात ही होगा।” बन्दी के रूप में जकड़े हुए होने पर भी अण्णाजी दत्तो पीछे हटने को तैयार नहीं थे। वे युवराज के सामने झल्लाते हुए कहने लगे— “शम्भूराजा ! कोई भी विचारवान मनुष्य आप जैसे व्यक्ति से किसी अच्छी बात की अपेक्षा ही क्यों करेगा ? बड़े महाराज चले गये और उनके साथ ही उनका बड़प्पन भी चला गया। उनके साथ सत्व भी गया और तत्व भी। इसके बाद अब गुंडागर्दी के अतिरिक्त मराठी राज्य के भाग्य में हो भी क्या सकेगा ?” “पन्त, राज्य की इतनी चिन्ता क्यों करते हो ? पहले अपने को देखो। ऐसा क्या कारण था कि आपने मेरे विरोध में इतना बवाल किया ?” “कहलवाना चाहते हो ? यदि आपकी शैतानी कम हो गयी हो और थोड़ी भी सभ्यता संस्कृति बची हो तो बता देता हूँ।” “सदाचार की भाषा किसी धोखेबाज लोमड़ी के मुँह से शोभा नहीं देती। बताइए, आपका क्या करें ?” अण्णाजी दत्तो ने गरजते हुए कहा, “पहले हमारे हाथों पैरों में जो भारी भरकम बेड़ियाँ डाली हैं उन्हें निकालो।” “पन्त राजद्रोह के गम्भीर अपराध के लिए यह सादा सा उपहार तो कुछ भी नहीं है।” “संभाजी राजा ! राजद्रोह का अपराध आप ही कर रहे हैं। आज रायगढ़ पर सच्चा राजा कौन है ? उन्हीं के हस्ताक्षर और मुहर वाला आदेश लेकर आये हैं हम। इसलिए इन बेड़ियों में आपको ही जकड़ा जाना चाहिए।” संभाजी राजा ने दीर्घ निःश्वास लेते हुए कहा, “क्या करें रस्सी जल गयी, पर ऐंठन नहीं गयी।” “शम्भूराजा ! आप पापी हैं, दुर्विनीत हैं और बदचलन भी।” शम्भूराजा की ओर हाथ उठा उठाकर जोर जोर से चिल्लाने लगे। येसूबाई के चेहरे पर विषाद का जाल फैल गया। शम्भूराजा ने हंबीरराव की ओर देखा। उसी समय हबीरराव ने पहरेदार से कहा, “ले जाओ यहाँ से इस बुड्ढे को। ले जाकर बन्दी खाने में फेंक दो।” मोरोपन्त उसी समय कच्चे कैदखाने में भेज दिया गया। अण्णाजी दत्तो को अँधेरी काल कोठरी में भेज दिया गया। बहुत देर तक दरबार का कामकाज चलता रहा। हिरोजी का कहीं पता न था। दीवान ने दरबार का समय समाप्त होने का संकेत किया। इसी बीच आठ दस सिपाहियों का जत्था अन्दर आया। सभी शम्भूराजा का अभिवादन करके भयभीत 196 :: सम्भाजी