छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबुद्धि तो अवश्य दी है।" इतना कहकर अम्बिकाबाई शीघ्रतापूर्वक वहाँ से निकल गयी। संभाजी ने जल्दी से पूजा समाप्त की फिर अपना वस्त्र धारण करके बाहर आ गये। परिचारक उन्हें मोतियों की माला पहना रहे थे। उनकी कमर में कमरबन्द बाँधा जा रहा था। इसी समय सवेरे-सवेरे मस्तिष्क में विचारों का तूफान उठाने वाली अंबिकाबाई आकर सामने खड़ी हो गयीं। संभाजी के मुख से अनायास ही निकला-"दीदी, मान लीजिए कि कर्नाटक-जिंजी का प्रदेश हमने रघुनाथपन्थ हणमंते से निकाल लिया तो उनकी जगह लेने वाला दूसरा कौन है? इतनी दूर जाकर कार्य भार सँभाल सके, ऐसा कौन है?" दीदी की पलकें एक क्षण के लिए झुकीं दूसरे ही क्षण वे राजा की आँखों में आँखें डालकर बोलीं, "मेरे पति हरजीराजा महाडिक क्या कम योग्य हैं? कम हिम्मत वाले हैं? चाहें तो अपने कलश से विचार-विमर्श कर लीजिए।" शम्भू महाराज स्तब्ध रह गये। अम्बिकाबाई निकल गयीं। शिवाजी महाराज के शब्द उनके कानों में गूँजने लगे। उन्होंने कहा था-"हमारे चारों दामादों में हरजी राजा ही हमें शेर जैसी हिम्मत वाले लगते हैं। सीधे शेर के मुँह में हाथ डाल देने वाला शम्भुराजा के समान केवल हरजीराजा ही साहसी है।" बात समाप्त हो गयी। बाहर बहुत सा कार्य पड़ा था। दरबार में कुछ निर्णय तत्काल लेने थे। सिंहासनारोहण के मुहूर्त के लिए केवल दो दिन शेष थे। अनेक धार्मिक अनुष्ठान आरम्भ हो चुके थे। शम्भूमहाराज जल्दी जल्दी महल से बाहर निकले। दरबार में कवि कलश, प्रह्लाद निराजी तथा अन्य लोग राजा की प्रतीक्षा में बैठे थे। सबसे पहले अष्टांगार में कुछ कोंकणी किसानों का एक समूह महाराज से मिला। इस वर्ष पनवेल, पेण से श्रीबाग, चेऊल से आगे हबसाणा की सीमा तक भयानक अकाल पड़ा हुआ था। श्रावण महीने से ही बरसात का दर्शन तक नहीं हुआ था। शम्भुराजा ने उस क्षेत्र के किसानों के लिए लगान माफी का आदेश जारी किया। साथ ही सरकार की ओर से किसानों को बीज आदि की आपूर्ति का आदेश भी तत्काल दे दिया। कृतज्ञता से शम्भुराजा का अभिवादन करते हुए किसान बाहर निकल गये। "राजन! पिछले चार दिनों से पुर्तगाली टोपीकर आपसे मिलने के लिए काले हौद के समीप वकीली महल में रुका हुआ है।" "ऐसा? कविराज एक साथ अनेक शत्रुओं का सामना करना बुद्धिमानी नहीं है। शत्रु चाहे घर के हों या बाहर के। परिवार के भीतरी कलह के धुएँ से मेरी साँस घुट रही है। इसके साथ ही गोवा के पानी से पुर्तगाली नाम का मगरमच्छ, कोंकण 214 सम्भाजी