छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहत्त्वपूर्ण मुद्दे की चर्चा करना चाहते हैं। महादजी निम्बालकर ने कहा- "शम्भूमहाराज ! रायगढ़ पर साक्षात् स्वर्ग अवतरित हो गया है। आप अब सिंहासनासीन होंगे। आपके ऊपर छत्र-चँवर सुशोभित होंगे। आपके इस आनन्द में हम भी सहभागी हैं, परन्तु...?" "कहिएऽऽ बताइएऽऽ।" "महाराज! आपने अपने प्रासादी को दाहिनी ओर अष्टप्रधानों के महलों की ओर कभी देखा क्या?" "मतलब ?" पिछले दो ढाई महीनों से बालाजी पन्त चिटणीस, अण्णाजी दत्तो, हिरोजी फर्जन्द जैसे बुजुर्ग लोग नजरबन्द हैं। उनके दरवाजों पर कड़ा पहरा है। महाराज ! हम सभी को लगता है कि अपने दीवाली और कर्मचारियों के घर होली का दृश्य देखना हमें अच्छा नहीं लग रहा है।" हरजी राजा महाडिक और येसूबाई ने कहा। शम्भूराजा बड़ी देर तक वैसे ही मौन बने रहे। जैसे किसी पहाड़ और घाटी से बादल आते और जाते रहते हैं वैसे ही उनके चेहरे के भाव बदल रहे थे। थोड़ी देर बाद उनके चेहरे की रेखाएँ ढीली पड़ने लगीं। लम्बी साँस भरते हुए उन्होंने कहा- "देखिए इन कर्मचारियों के लिए मेरा मन आपसे अधिक संवेदनशील है। क्योंकि ये सभी पिताजी के समीपी लोग हैं। उनकी गोद में, उनके कन्धे पर खेलते हुए हम बड़े हुए हैं। हिरोजी फर्जन्द रिश्ते में हमारे चाचा हैं। इन सभी को क्षमा कर देने का विचार आपसे पहले मेरे मस्तिष्क में आया था। परन्तु इसके बाद क्या ये हमारे राज्य के प्रति निष्ठावान बने रहेंगे ?" शम्भूमहाराज का प्रश्न का सुनकर सभी का सिर नीचे झुक गया। राजा ने येसूबाई की ओर देखा। येसूबाई ने सहज भाव से कहा, "महाराज, आप व्यर्थ ही इतनी चिन्ता कर रहे हैं। गुनाह किससे नहीं होता? गलतियाँ कौन नहीं करता ?" येसूबाई के शब्द शम्भूमहाराज के कलेजे में कटार की तरह चुभ गये। परन्तु उन्होंने चेहरे पर यह भाव आने नहीं दिया। रात के भोजन के बाद अम्बिकाबाई पुनः शम्भूराजा के सामने खड़ी हो गयीं। उन्होंने कुछ कहा नहीं किन्तु शम्भूराजा ने उनकी आँखों के प्रश्न को पढ़ लिया। "उचित समय पर उचित निर्णय अवश्य लेंगे।" कहकर शम्भूराजा ने उनसे बिदा ली। वे अपने शयनकक्ष में आये तब फीकी हँसी हँसते हुए येसूबाई ने कहा, "अम्बिकाबाई के प्रस्ताव से स्वामी कितना बेचैन हो रहे हैं? छत्रपति का सम्बन्धी होना कोई गुनाह तो नहीं है न महाराज?" 216 : सम्भाजी